एमपी में 40 हजार से ज्यादा लोग सिकल सेल से पीड़ित, अब तक 1.33 करोड़ लोगों की जांच
मध्य प्रदेश में सिकल सेल एनीमिया की जांच का बड़ा काम हुआ है। राज्य में अब तक 1.33 करोड़ से ज्यादा लोगों की जांच हो चुकी है। इस जांच में 40,741 लोग बीमारी से पीड़ित मिले हैं। देश भर के कुल मरीजों में से 60% अकेले ओडिशा और मध्य प्रदेश में हैं। सरकार अब जनजातीय इलाकों में मुफ्त इलाज और डिजिटल ट्रैकिंग कर रही है।
ओडिशा-एमपी में सबसे ज्यादा मरीज
राज्यसभा में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने यह आंकड़े पेश किए हैं। देश भर में चिह्नित सिकल सेल मरीजों का बड़ा हिस्सा सिर्फ दो राज्यों में है। यह हिस्सा करीब 59.28% है।
मध्य प्रदेश में अब तक 1,33,69,993 लोगों की जांच हुई है। इनमें से 40,741 लोग बीमारी से पीड़ित पाए गए। वहीं 2,45,024 लोग 'वाहक' के रूप में सामने आए हैं।
राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन (NSCAEM – National Sickle Cell Anaemia Elimination Mission) के तहत यह जांच अभियान चल रहा है। मध्य प्रदेश सरकार इसे एक बड़ी उपलब्धि मान रही है।
7.27 करोड़ लोगों की जांच
देश के 17 प्रमुख जनजातीय बहुल राज्यों में यह अभियान चल रहा है। अब तक 7.27 करोड़ से ज्यादा लोगों की जांच हो चुकी है।
इस जांच में 20,47,145 लोग 'वाहक' पाए गए हैं। वहीं 2,49,167 लोग बीमारी से पीड़ित मिले हैं। पूरे मिशन की निगरानी राष्ट्रीय सिकल सेल पोर्टल से हो रही है।
राज्यवार आंकड़े
सबसे ज्यादा मरीज ओडिशा में मिले हैं। वहां 1,06,969 लोग सिकल सेल से पीड़ित हैं।
मध्य प्रदेश दूसरे नंबर पर है, जहां 40,741 मरीज मिले। गुजरात में 30,548 और महाराष्ट्र में 30,017 मरीज पाए गए हैं।
जांच के मामले में छत्तीसगढ़ सबसे आगे रहा। वहां 1.78 करोड़ से ज्यादा लोगों की जांच हुई। इसमें 28,384 लोग बीमारी से पीड़ित मिले।
एमपी में फ्री इलाज की सुविधा
सरकार आयुष्मान आरोग्य मंदिर (AAM – Ayushman Arogya Mandir), प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC – Primary Health Centre) और जिला अस्पतालों में मुफ्त जांच कर रही है। यह सुविधा 0 से 40 साल के लोगों के लिए है।
मरीजों को हाइड्रोक्सीयूरिया दवा और फॉलिक एसिड मुफ्त दिया जा रहा है। इस दवा को राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची में शामिल किया गया है। इससे यह दवा निचले स्तर के अस्पतालों तक भी पहुंच रही है।
वाहक किसे कहते हैं?
वाहक वह व्यक्ति होता है जिसे एक माता-पिता से सिकल सेल का दोषपूर्ण जीन मिलता है। दूसरे माता-पिता से उसे सामान्य जीन मिलता है।
ऐसे लोगों में बीमारी के लक्षण नहीं दिखते। वे सामान्य और स्वस्थ जीवन जीते हैं। उन्हें किसी खास इलाज की जरूरत नहीं होती।
हालांकि वे खुद बीमार नहीं होते। लेकिन वे यह दोषपूर्ण जीन अपने बच्चों में दे सकते हैं। इसी वजह से उन्हें 'वाहक' कहा जाता है।
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