“नारी शक्ति पर सियासत: विधानसभा में ‘आरक्षण’ बहाना, असली खेल टालमटोल का?”
मध्य प्रदेश विधानसभा में सोमवार को महिला आरक्षण को लेकर जमकर हंगामा हुआ। एक तरफ भाजपा पर कानून लागू करने में देरी के आरोप लगे, तो दूसरी ओर कांग्रेस की मंशा भी सवालों में घिर गई। मुद्दा साफ है—महिलाओं को अधिकार कब मिलेगा और क्या दोनों पार्टियां इसे सिर्फ राजनीतिक हथियार बना रही हैं?
क्या है पूरा मामला?
नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 को लेकर सदन में चर्चा के दौरान विपक्ष ने सरकार को घेरा। कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा जानबूझकर इसे लागू करने में देरी कर रही है।
लेकिन दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस खुद भी इस मुद्दे पर ठोस रोडमैप देने से बचती दिखी। यानी सवाल दोनों तरफ है—इरादा कितना साफ है?
मुख्य आरोप-प्रत्यारोप
कांग्रेस का आरोप: भाजपा सरकार महिला आरक्षण को परिसीमन और जनगणना के नाम पर 2028-29 तक टालना चाहती है।
भाजपा की स्थिति: नियम और प्रक्रिया का हवाला देकर तत्काल लागू करने से बचाव।
कांग्रेस की मांग: मौजूदा सीटों के आधार पर तुरंत आरक्षण लागू किया जाए।
बड़ा सवाल: अगर 2023 में कानून पास हुआ, तो अब तक लागू क्यों नहीं?
कांग्रेस के हमले, लेकिन खुद पर भी सवाल
नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने साफ कहा कि भाजपा महिलाओं को तत्काल लाभ नहीं देना चाहती। वहीं, कांग्रेस विधायकों ने भी सरकार पर महिलाओं को “गुमराह” करने का आरोप लगाया। लेकिन यहां एक विरोधाभास भी दिखा। कांग्रेस ने समर्थन तो दिया, पर अब तक अपने स्तर पर कोई ठोस दबाव या वैकल्पिक मॉडल सामने नहीं रख सकी।
जमीनी मुद्दे भी उठे, लेकिन समाधान गायब
कांग्रेस विधायक सोहनलाल वाल्मीकि ने सामूहिक विवाह योजना में आ रही दिक्कतों और गरीब लड़कियों की परेशानियों का मुद्दा उठाया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि महिला सम्मान की बात करने वाली सरकार के कुछ मंत्री ही विवादित बयान देते रहे हैं। हालांकि इन मुद्दों पर ठोस समाधान या टाइमलाइन किसी भी पक्ष से स्पष्ट नहीं आई।
महिला कांग्रेस की एंट्री: सड़क से सदन तक दबाव
प्रदेश अध्यक्ष रीना बोरासी ने विधानसभा पहुंचकर कानून को तुरंत लागू करने की मांग की। उनका कहना था कि अगर समय पर लागू होता, तो 2024 चुनाव में ज्यादा महिलाएं संसद तक पहुंच सकती थीं। लेकिन यह सवाल यहां भी बना रहा—क्या यह मांग वास्तविक है या सिर्फ राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति?
सदन में प्रक्रिया का ‘पेंच’, या बहाना?
अशासकीय संकल्प पर चर्चा को नियमों के आधार पर खारिज कर दिया गया। विधानसभा अध्यक्ष ने साफ कहा कि जब शासकीय संकल्प पर चर्चा हो रही हो, तब अन्य प्रस्ताव नहीं लिए जा सकते। विपक्ष ने इसे महिलाओं के हितों के खिलाफ बताते हुए वॉकआउट किया।
महिला आरक्षण जैसे अहम मुद्दे पर भी अगर राजनीति ही हावी रहे, तो असली नुकसान किसका होगा? भाजपा पर देरी के आरोप हैं, तो कांग्रेस पर मुद्दे को सिर्फ विरोध तक सीमित रखने का आरोप। यानी दोनों ही दलों के बीच “नारी शक्ति” कहीं सियासी रणनीति में फंसी नजर आ रही है।
महिला आरक्षण अब सिर्फ कानून नहीं, बल्कि राजनीतिक परीक्षा बन चुका है। लेकिन जब तक नीयत साफ और समयसीमा तय नहीं होगी, तब तक “नारी शक्ति” सिर्फ भाषणों में ही मजबूत दिखेगी, जमीन पर नहीं।
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