महाकाल मंदिर प्रोजेक्ट में नियमों की अनदेखी, सरकारी खाते के बजाय पर्सनल अकाउंट में भेजे करोड़ों
5 प्वाइंट में समझें पूरा मामला...
- महाकाल मंदिर विस्तार प्रोजेक्ट के लिए लोगों की जमीनों का अधिग्रहण किया गया था।
- सरकार से मिले 97 करोड़ रुपए के मुआवजे को अफसरों ने अधिकारियों के खातों में डाल दिया।
- नियमों के मुताबिक इस रकम को जिला स्तर के सरकारी पीडी अकाउंट में जमा किया जाना जरूरी था।
- स्टेट फाइनेंस इंटेलिजेंस सेल ने इस लेनदेन को संदिग्ध माना है।
- इस लापरवाही की वजह से तीन साल बाद भी करीब 20 करोड़ रुपए का मुआवजा नहीं बंट पाया है।
क्या है पूरा मामला और कहां हुई गड़बड़ी?
उज्जैन महाकाल मंदिर के विस्तार और बड़ा गणेश मंदिर के रास्ते व चौड़ीकरण के अन्य कामों के लिए 2021 से 2023 के बीच कई जमीनें खरीदी गई थीं। इस पर सरकार ने मालिकों को मुआवजे के तौर पर 97 करोड़ रुपए दिए।
असल में ये पैसा सीधे जिला के सरकारी पीडी (पर्सनल डिपॉजिट) अकाउंट में जाना चाहिए था, ताकि सरकार को साफ पता रहे कि पैसा कब और किसको जा रहा है। लेकिन अफसरों ने इसे नियम के अनुसार नहीं रखा।
अफसरों के नाम पर खुले खातों में गया पैसा
अफसरों ने शासन के नियमों को दरकिनार किया। इस भारी-भरकम रकम को नगर निगम आयुक्त और भू-अर्जन अधिकारी के नाम पर खुले बैंक खातों में जमा करा दिया गया।
इसके बाद इन्हीं खातों से लोगों को मुआवजा भी बांटना शुरू कर दिया गया। इस कदम से एमपी सरकार की सीधी निगरानी खत्म हो गई। साथ ही पैसों को ट्रैक करना मुश्किल हो गया।
इसमें सबसे बड़ा मामला तकिया मस्जिद क्षेत्र का है। यहां अकेले 66 करोड़ रुपए का जमीन अधिग्रहण किया गया था।
रकम का पूरा ब्यौरा ऐसे समझें
| विवरण | राशि |
| सरकार से मिली कुल मुआवजा राशि | 97 करोड़ रुपए |
| तकिया मस्जिद क्षेत्र का सबसे बड़ा अधिग्रहण | 66 करोड़ रुपए |
| 3 साल बाद भी बची हुई मुआवजा राशि (जो अब तक नहीं बंटी) | 20 करोड़ रुपए |
स्टेट फाइनेंस इंटेलिजेंस सेल ने पकड़ी गड़बड़ी
अब इस पूरे मामले में स्टेट फाइनेंस इंटेलिजेंस सेल की एंट्री हुई है। सेल ने इस पूरे लेनदेन को संदिग्ध माना है और गड़बड़ी को पकड़ लिया है।
इसके बाद कोष एवं लेख आयुक्त ने राजस्व विभाग के प्रमुख सचिव को एक कड़ा पत्र लिखा है। साथ ही इस मामले की जांच करने को कहा है।
जांच में इन मुख्य सवालों के जवाब ढूंढे जाएंगे
- क्या नगर निगम और भू-अर्जन अधिकारी के निजी खातों में सरकारी पैसा जमा करने के लिए वित्त विभाग से मंजूरी ली गई थी?
- बिना मंजूरी के इन सरकारी खातों का संचालन और ट्रांजेक्शन कैसे होता रहा?
- इन खातों में जो रकम बची है, उसे दोबारा भू-अर्जन के सरकारी पीडी अकाउंट में कब तक जमा कराया जाएगा?
इस लापरवाही का नतीजा यह हुआ है कि पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं। साथ ही आज 3 साल बाद भी कई परिवारों का लगभग 20 करोड़ रुपए का मुआवजा अटका हुआ है।
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