मैटरनिटी लीव पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: महिला अतिथि विद्वानों को 26 सप्ताह का सवेतन अवकाश, वेतन रोकना असंवैधानिक
News in Short
- मध्य प्रदेश हाईकोर्टने प्रिंसिपल का संशोधित आदेश किया निरस्त
- महिला अतिथि विद्वान को मिलेगा 26 सप्ताह का सवेतन मातृत्व अवकाश
- “80 दिन काम” की शर्त सरकारी संस्थानों पर लागू नहीं: कोर्ट
- आदेश को कोर्ट ने बताया “घोर असंवैधानिक”
- संविधान के अनुच्छेद 38, 39 और 39A का दिया हवाला
News in detail
मध्यप्रदेश में मैटरनिटी लीव (Maternity Leave) को लेकर एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सामने आया है। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि मातृत्व अवकाश महिला का मौलिक अधिकार है और इसे किसी भी प्रशासनिक आदेश के माध्यम से सीमित या समाप्त नहीं किया जा सकता।
क्या है पूरा मामला
कटनी के गवर्नमेंट तिलक पीजी कॉलेज में कार्यरत महिला अतिथि विद्वान प्रीति साकेत को 5 अप्रैल 2023 को तत्कालीन प्रिंसिपल द्वारा 6 महीने का मातृत्व अवकाश (मैटरनिटी लीव) दिया गया था। साथ ही इस अवधि में मानदेय (वेतन) देने का भी आदेश हुआ था। बाद में नए प्रिंसिपल ने 16 जून 2023 को आदेश में संशोधन करते हुए इस अवकाश को “अवैतनिक” कर दिया। यानी महिला को छुट्टी तो मिलेगी, लेकिन वेतन नहीं दिया जाएगा। यही विवाद कोर्ट तक पहुंचा।
महिला अतिथि विद्वान ने ली हाईकोर्ट की शरण
इस फैसले को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ताओं ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। उन्होंने तर्क दिया कि यह आदेश कानून और संविधान दोनों के खिलाफ है।साथ ही यह भी आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्ता अनुसूचित जाति से होने के कारण उसके साथ भेदभाव किया गया, जबकि अन्य महिलाओं को ऐसे मामलों में लाभ दिया गया था।
प्रिंसिपल का असंवैधानिक आदेश निरस्त
मामले की सुनवाई जस्टिस विशाल धगट की बेंच ने की। कोर्ट ने प्रिंसिपल के संशोधित आदेश को “घोर असंवैधानिक” बताते हुए पूरी तरह निरस्त कर दिया। कोर्ट ने कहा कि मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 और संविधान की मूल भावना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मातृत्व अवकाश महिला का अधिकार है, कोई दया नहीं।
80 दिन काम की शर्त पर बड़ा फैसला
कोर्ट ने एक अहम व्याख्या करते हुए कहा कि मातृत्व अवकाश पाने के लिए 12 महीनों में 80 दिन काम करने की शर्त सरकारी संस्थानों में लागू नहीं होगी। इस फैसले से हजारों महिला अतिथि विद्वानों और अस्थायी कर्मचारियों को सीधा लाभ मिलेगा, जो अब तक इस शर्त के कारण वंचित रह जाती थीं।
संविधान का हवाला देकर दिया फैसला
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में संविधान के अनुच्छेद 38, 39 और 39A का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य का कर्तव्य है कि वह महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य की रक्षा करे। कोर्ट ने कहा कि भारत एक समाजवादी और कल्याणकारी राज्य है, जहां ऐसी नीतियां बननी चाहिए जो महिलाओं को सुरक्षा और सम्मान दें।
याचिकाकर्ता को क्या मिला फायदा
कोर्ट ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता को 26 सप्ताह का सवेतन मातृत्व अवकाश दिया जाए, जैसा कि मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 की धारा 5(1) में प्रावधान है। इसके साथ ही पहले दिया गया लाभ बहाल करने का निर्देश भी दिया गया, जिससे महिला को पूरा वेतन मिल सके। इस आदेश का लाभ वह सभी महिला कर्मचारी उठा सकेंगे जिन्हें गलत नियमों की व्याख्या के चलते पेड मातृत्व अवकाश से वंचित किया जाता था।
क्यों अहम है यह फैसला
यह फैसला सिर्फ एक महिला तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे प्रदेश की हजारों महिला कर्मचारियों के लिए राहत लेकर आया है। इस आदेश के आधार पर ही सभी महिला कर्मचारियों को राहत मिल सकेगी। अब सरकारी संस्थानों में कार्यरत महिलाएं बिना किसी शर्त के अपने मातृत्व अधिकारों का लाभ ले सकेंगी और यही इस फैसले की सबसे बड़ी ताकत है।
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