मीनाक्षी नटराजन केस: नामांकन फार्म भरने से शुरू हुईं ये तीन गलतियां करती गई कांग्रेस

Sanjay Gupta | Jun 12, 2026, 15:29 IST
meenakshi natarajan
राज्यसभा में कांग्रेस की प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन की याचिका सुप्रीम कोर्ट में भी खारिज हो गई है। अब उनके पास चुनाव याचिका दायर करने के सिवा कोई विकल्प नहीं बचा है। इस पूरे मामले में कांग्रेस के बड़े-बड़े नेताओं की गलतियां भारी पड़ गई हैं।

राज्यसभा की तीनों सीट अब बीजेपी के पाले में चली गई है। मप्र में कांग्रेस को जोरदार झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मीनाक्षी नटराजन की याचिका खारिज कर दी है। इस संवेदनशील मामले में कांग्रेस के बड़े दिग्गज नेताओं और उनकी रणनीतिक खामियां खुलकर सामने आ गई हैं।



अब निशाने पर मप्र के प्रभारी हरीश चौधरी, प्रदेशाध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार सभी आएंगे। सवाल तो यह भी उठ रहे हैं कि क्या वाकई यह रणनीतिक चूक थी या कोई और वजह रही।



पहली चूक- नामांकन फार्म में एक लाइन भरना

सबसे बड़ी चूक नामांकन फार्म भरने में हुई। इसमें नियम के तहत शपथपत्र के कॉलम पांच में भरना होता है कि क्या कोई क्रिमिनल केस चार्ज फ्रेम हुए या नहीं। इसकी जानकारी नहीं दी गई। कांग्रेस अब कह रही है कि केस ही नहीं था।



इस पर इंदौर के पूर्व एएजी और महापौर पुष्यमित्र भार्गव कहते हैं कि



इस मामले में द सूत्र ने नामांकन फार्म भरने वाले कांग्रेस के अधिवक्ता जेपी धनोपिया से भी बात की थी।



दूसरी चूक- चुनाव आयोग क्यों गए, वहां अधिकार ही नहीं

कांग्रेस से एक और बड़ी चूक यह हुई कि पार्टी सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने की बजाय पहले चुनाव आयोग के पास चली गई। चुनाव आयोग ने एक दिन का वक्त लिया, अगले दिन मिला और बात सुनी।



लेकिन कांग्रेस के बड़े नेता और काबिल वकील यह बुनियादी बात भूल गए कि चुनाव आयोग के पास रिटर्निंग ऑफिसर के फैसले के खिलाफ अपील सुनने का कोई अधिकार ही नहीं है। यानी चुनाव आयोग चाहकर भी इस मामले में कुछ नहीं कर सकता था।



तो फिर सवाल यह उठता है कि कांग्रेस दिल्ली में चुनाव आयोग के दफ्तर गई ही क्यों? वहां बाहर बैठना, भजन गाना, पूरा नाटक हुआ... लेकिन किसी ने यह नहीं सोचा कि कानूनी नियमों के हिसाब से यह रास्ता था ही गलत।



तीसरी चूक- सुप्रीम कोर्ट में जाने में देरी

जब चुनाव आयोग से कोई फैसला नहीं आया, तब कांग्रेस ने महसूस किया कि अब सुप्रीम कोर्ट जाना होगा। लेकिन तब तक दो कीमती दिन बर्बाद हो चुके थे। याचिका गुरुवार 11 जून की सुबह लगी और सुनवाई शुक्रवार 12 जून को हुई।



जबकि होना यह चाहिए था कि जिस दिन यानी 9 जून मंगलवार को नामांकन रद्द हुआ, उसी दिन सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना था। क्योंकि समय बहुत कम था।



दरअसल गुरुवार 11 जून को शाम चार बजे नाम वापसी की आखिरी तारीख थी। उसके बाद तो निर्विरोध जीत घोषित होनी ही थी। और एक बार निर्विरोध जीत हो जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट भी नियमों के तहत कुछ नहीं कर सकता था।



यानी कांग्रेस के हाथ में वक्त था, रास्ता भी था, लेकिन चुनाव आयोग के चक्कर में दोनों गंवा दिए। अब बचा है तो बस इलेक्शन पिटीशन का रास्ता।



यह बात तो खुद पूर्व सीएम दिग्वजिय सिंह भी गुरुवार को बयान में बोल चुके हैं कि-



खेल क्यों, मंत्री बोल रहे दस्तावेज कांग्रेस से आए

इस मामले में खेल होने की बात तो खुद मंत्री कैलाश विजवर्गीय कह रहे हैं। वह सीधे बोल चुके हैं कि मीनाक्षी के कागज कहां से आए और किसने भेजे।



बता दें कि उन्होंने कहा था कि ये कागज तेलंगाना से ही मिले हैं जहां कांग्रेस की ही सरकार है।बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल भी इसी ओर इशारा कर चुके हैं। वहीं सीएम डॉ. मोहन यादव कांग्रेस को आत्ममंथन की नसीहत दे चुके हैं।साथ ही वह तो नामांकन और बीजेपी के तीसरे प्रत्याशी के आने से पहले ही इंदौर में कह चुके थे कि तीसरी सीट जाएगी कहां। यानी बीजेपी पहले से ही कमर कसी हुई थी। वहीं कांग्रेस नेता मैदान पर ही नहीं थे।



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