अखाड़े से सत्ता तक: 61 की उम्र में और मजबूत हुई मोहन यादव की पकड़
मध्यप्रदेश की राजनीति में 25 मार्च 2026 खास तारीख है। प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव आज 61 वर्ष के हो गए हैं। यह सिर्फ उनका जन्मदिन नहीं, बल्कि एक ऐसे नेतृत्व की यात्रा का पड़ाव है, जिसने कम समय में अपनी अलग पहचान गढ़ी है।
डॉ. यादव की अगुआई में मध्यप्रदेश ने विकास, सुशासन और जनकल्याण की दिशा में नई लकीर खींचने की कोशिश की है। ऐसी लकीर, जिसमें परंपरा और आधुनिकता दोनों साथ चलते नजर आते हैं।
कुछ लोग सिर्फ पढ़े होते हैं, कुछ वक्त उन्हें गढ़ता है। बहुत कम लोग ऐसे होते हैं, जो पढ़े भी हों और खुद को गढ़ भी लें। डॉ. मोहन यादव उन्हीं शख्सियतों में गिने जा रहे हैं।
एक तरफ वे धर्म, दर्शन, अध्यात्म, योग, रामायण, महाभारत और गीता पर गहरी बात कर सकते हैं, तो दूसरी तरफ अखाड़े में उतरकर ताकत और संतुलन का प्रदर्शन भी कर सकते हैं। यहीसंतुलन उनकी पहचान बनता जा रहा है।
जीवन में ऐसा है संतुलन
उनके व्यक्तित्व की असली झलक कॉलेज के दिनों में ही दिखने लगी थी। छात्र राजनीति के दौर में जहां तीखे तेवर और टकराव आम बात होते हैं, वहां रिश्तों को संभालना आसान नहीं होता। मगर मोहन यादव ने इस कड़वाहट का इलाज अपने अंदाज में खोजा।
होली के दिन अपनी बुलेट पर सवार होकर दोस्तों के साथ सबसे पहले उसी प्रोफेसर के घर पहुंचना, जिनसे कभी बहस या टकराव हुआ हो। रंग लगाना, पैर छूना और फिर मिठास के साथ रिश्तों को फिर से जोड़ लेना, यही उनकी शैली रही। यही संतुलन आज उनके राजनीतिक जीवन में भी दिखता है।
शिक्षा को दी पूरी तवज्जो
राजनीतिक विश्लेषकों के लिए उनका मुख्यमंत्री बनना किसी चौंकाने वाली घटना से कम नहीं था। स्थापित मानकों और परंपराओं के बीच अचानक उभरा यह नाम कई लोगों के लिए अप्रत्याशित था। मगर उनके व्यक्तित्व में जो तत्व हैं....पुरुषार्थ, स्वाभिमान, सार्थक सोच और स्पष्ट संवाद, वही उन्हें इस मुकाम तक लेकर आए हैं।
अगर उनकी शिक्षा की बात करें तो वह भी उतनी ही मजबूत है। B.Sc, LLB, MA, MBA और PhD कर चुके हैं। यह एक लंबी शैक्षणिक यात्रा है, जो यह साबित करती है कि उन्होंने ज्ञान को गंभीरता से लिया।
माधव कॉलेज से पढ़ाई के दौरान 1982 में छात्रसंघ के सह-सचिव बनने से शुरू हुआ उनका सफर 2023 में मुख्यमंत्री पद तक पहुंचा और इस दौरान उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
कार्यशैली में श्रीकृष्ण और विक्रमादित्य की छाप
डॉ.यादव के करीबी मानते हैं कि अगर उनके व्यक्तित्व को समझना है तो भगवान श्री कृष्ण और राजा विक्रमादित्य के दर्शन को समझना होगा। इन दोनों की छाप उनके विचार और कार्यशैली में साफ दिखती है। उज्जैन से उनका गहरा जुड़ाव और विक्रम संवत को लेकर उनका अभियान इसका प्रमाण है।
मुख्यमंत्री बनने के बाद सरकारी कैलेंडर में विक्रम संवत को शामिल करना भी उसी सोच का हिस्सा है। उनकी एक खासियत और है, वे किसी भी बात को आंख मूंदकर स्वीकार नहीं करते। इतिहास हो या कोई विचार, वे उसके प्रमाण तलाशते हैं। इसलिए वे विरासत से विकास की बात दोहराते हैं।
उनकी अध्ययनशीलता का अंदाजा एक घटना से लगाया जाता है। एक आईएएस अधिकारी ने उन्हें महाकाल पर लिखी पुस्तक भेंट की। अगले ही दिन उन्होंने न सिर्फ पुस्तक पढ़ ली, बल्कि उसकी शैली और तथ्यों पर विस्तार से चर्चा कर उस अधिकारी को चौंका दिया।
प्रशासनिक स्तर पर भी उनकी शैली अलग नजर आती है। वे इनपुट जरूर लेते हैं, मगर फैसले अपने विवेक से करते हैं। ब्यूरोक्रेसी को लेकर वे सजग रहते हैं और एक सीमा से ज्यादा किसी को हस्तक्षेप की इजाजत नहीं देते। यही वजह है कि उनकी कार्यशैली में स्पष्टता और नियंत्रण दोनों दिखते हैं।
यह एक अहम पड़ाव...
उनके कार्यकाल के सवा दो साल अब एक अहम मोड़ पर पहुंच चुके हैं। 13 दिसंबर 2023 को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद 25 मार्च 2026 का यह जन्मदिन उनके कार्यकाल का आधा पड़ाव है। इस दौरान उन्होंने न सिर्फ राजनीतिक अटकलों को पीछे छोड़ा, बल्कि अपनी मजबूत होती बॉडी लैंग्वेज और केंद्रीय नेतृत्व के साथ सहज रिश्तों से अपनी पकड़ भी मजबूत की।
मोहन यादव का “विजन 2047” सिर्फ एक दस्तावेज नहीं, बल्कि एक व्यापक सोच है। इसमें आर्थिक आत्मनिर्भरता से लेकर सांस्कृतिक संरक्षण और आधुनिक तकनीक तक सब कुछ शामिल है। प्रदेश की 14-15 प्रतिशत विकास दर को बनाए रखते हुए बजट को अगले पांच वर्षों में दोगुना करने का लक्ष्य रखा गया है।
तकनीक को नई दिशा देने की कोशिश
तकनीक के क्षेत्र में भी उन्होंने नई दिशा दी है। 23 जनवरी 2026 को स्पेस टेक नीति-2026 की घोषणा करते हुए उन्होंने मध्यप्रदेश को देश का नया स्पेस टेक हब बनाने की बात कही।
15 जनवरी 2026 को भोपाल में आयोजित एआई इम्पैक्ट सम्मेलन ने यह साफ कर दिया कि सरकार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को शासन, कृषि, स्वास्थ्य और उद्योग में लागू करने के लिए गंभीर है। नरेंद्र मोदी द्वारा उद्घाटित एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में भी मध्यप्रदेश की सक्रिय भागीदारी इसी दिशा का संकेत है।
धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को भी समान प्राथमिकता दी जा रही है। कृष्ण पाथेय, राम वन गमन पथ और उज्जैन में सिंहस्थ की तैयारियां इसके उदाहरण हैं। आने वाले सिंहस्थ में एआई के उपयोग की योजना इस बात को और मजबूत करती है कि परंपरा और तकनीक का संगम उनकी नीति का मूल है।
आर्थिक मोर्चे पर पूरी तैयारी
आर्थिक मोर्चे पर एमएसएमई, उद्योग, कृषि और निवेश को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। क्षेत्रीय इंडस्ट्री कॉन्क्लेव के जरिए विकास को बड़े शहरों से बाहर ले जाने की कोशिश की जा रही है। ग्रामीण बस सेवा, कृषि कैबिनेट और बिग डेटा के उपयोग जैसी पहलें जमीनी बदलाव की दिशा में उठाए गए कदम हैं।
सामाजिक योजनाओं में भी उनका फोकस स्पष्ट है। लाड़ली बहना योजना के जरिए महिलाओं को सशक्त बनाने का प्रयास हो या ‘धरती आबा योजना’ के माध्यम से जनजातीय वर्ग के उत्थान की दिशा में काम...इन पहलों ने सरकार की प्राथमिकताओं को स्पष्ट किया है।
नक्सलियों का किया खात्मा
सुरक्षा के मोर्चे पर भी एक बड़ी उपलब्धि सामने आई है, जब 11 दिसंबर 2025 को उन्होंने राज्य से नक्सलवाद के खात्मे का ऐलान करते हुए “लाल सलाम को आखिरी सलाम” कहा।
केंद्र सरकार की तय समयसीमा से पहले यह लक्ष्य हासिल करना एक बड़ी उपलब्धि माना गया। यही नहीं भोपाल गैस त्रासदी के 40 साल बाद जहरीले कचरे का सुरक्षित निपटान भी उनके कार्यकाल की एक बड़ी उपलब्धि है।