जिस X-फेक्टर ने कभी चंबल में डाकू पैदा किए, वही अब खस्ता गजक बना रहा
मुरैना और ग्वालियर का नाम अब सिर्फ डकैतों या सिंधिया राजघराने के लिए नहीं, बल्कि अपनी खस्ता और स्वादिष्ट गजक के लिए मशहूर है। सर्दियों में इस गजक की मांग देश-विदेश तक होती है। मुरैना की गजक, जो तिल और गुड़ से बनती है, अपने खस्तापन के कारण अलग पहचान रखती है। आज हम इस गजक के खस्तापन का राज खोलेंगे और बताएंगे उस X-फेक्टर के बारे में जिसने कभी चंबल को डाकू दिए आज वही स्वादिस्ट गजब के लिए भी जिम्मेदार है…
गुड़ ने बदली चंबल की तस्वीर
खस्तापन का रहस्य
किसी जमान में डाकुओं की समस्या का सबसे बड़ा कारण चंबल नदी के पानी को माना जाता था। कहा जाता था कि चंबल का पानी है खराब है, जिसके कारण लोगों के मन में हिंसा और बदले की भावना इस कदर घर कर जाती है कि वे बंदूक उठाकर चंबल के बीहड़ों में उतर जाते हैं। आज मुरैना-ग्वालियर की गजक का खस्तापन उसी चंबल नदी के मीठे पानी और उच्च गुणवत्ता वाले तिल की वजह से है। तिल का अनुपात जितना अधिक होता है, गजक उतनी ही खस्ता बनती है। यही कारण है कि उत्तर भारत की अन्य गजक की तुलना में मुरैना की गजक अधिक पसंद की जाती है।
गजक का कारोबार और रोजगार
मुरैना और ग्वालियर में लगभग 350-400 गजक कारोबारी हैं, जो सालाना ₹150-200 करोड़ का व्यापार करते हैं। यह उद्योग करीब 5-6 हजार लोगों को रोजगार देता है। हालांकि तिल की बढ़ती कीमतों के कारण गजक के दाम भी बढ़ गए हैं। इस साल खस्ता गजक ₹350-₹400 प्रति किलो तक बिक रही है।
FAQ
- 1. मुरैना की गजक इतनी मशहूर क्यों है?
यह अपने खस्तापन और चंबल नदी के मीठे पानी की वजह से खास है। - 2. गजक का खस्तापन कैसे बढ़ता है?
अच्छी गुणवत्ता वाले तिल और सही मात्रा के कारण गजक खस्ता बनती है। - 3. गजक की पैकिंग में कब बदलाव आया?
1970 के दशक में गजक को पॉलीथीन और डिब्बों में पैक करना शुरू हुआ। - 4. मुरैना गजक उद्योग से कितने लोग जुड़े हैं?
यह उद्योग लगभग 5-6 हजार लोगों को रोजगार देता है। - 5. गजक की मौजूदा कीमत क्या है?
अच्छी गुणवत्ता वाली खस्ता गजक ₹350-₹400 प्रति किलो बिक रही है।
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