इंदिरा साहनी केस बना सबसे बड़ा सवाल! MP में 27% OBC आरक्षण पर हाईकोर्ट में गरमाई बहस
news in short
- जबलपुर हाईकोर्ट में 27% ओबीसी आरक्षण पर अंतिम सुनवाई शुरू
- वरिष्ठ अधिवक्ता अमन लेखी ने इंदिरा साहनी फैसले का हवाला दिया
- कोर्ट में कहा गया कि MP में कुल आरक्षण 73% पहुंच चुका है
- सरकार ने हजारों पन्नों की रिपोर्ट और पिछड़ा वर्ग आयोग के दस्तावेज पहले ही कर चुकी है जमा
- गुरुवार को फिर होगी सुनवाई, पहले सामान्य वर्ग, फिर सरकार रखेगी पक्ष
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मध्यप्रदेश में 27% ओबीसी आरक्षण को लेकर जबलपुर हाईकोर्ट में अंतिम सुनवाई शुरू हो चुकी है। बुधवार 13 मई को हुई सुनवाई में सामान्य वर्ग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अमन लेखी ने इंदिरा साहनी केस का हवाला देते हुए 50% आरक्षण सीमा पार होने को असंवैधानिक बताया और इसे समानता के अधिकार का हनन भी बताया गया।
News in detail
हाईकोर्ट में शुरू हुई OBC आरक्षण पर निर्णायक बहस
मध्यप्रदेश में लंबे समय से विवादों में चल रहे 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण मामले में अब जबलपुर हाईकोर्ट में अंतिम सुनवाई शुरू हो चुकी है। लगातार कई बार टलने के बाद बुधवार 13 मई को चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच में इस मामले पर विस्तृत सुनवाई हुई। कोर्ट ने पहले ही तय किया था कि सबसे पहले आरक्षण का विरोध कर रहे पक्ष को अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाएगा।
इंदिरा साहनी केस पर टिकी बहस
सुनवाई के दौरान सामान्य वर्ग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अमन लेखी ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया। मुख्य तौर पर सुप्रीम कोर्ट के चर्चित इंदिरा साहनी मामले का हवाला देते हुए कहा कि संविधान के तहत आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 फीसदी तय की गई है। उन्होंने दलील दी कि मध्यप्रदेश में वर्तमान व्यवस्था के अनुसार कुल आरक्षण 73 फीसदी तक पहुंच रहा है, जो सुप्रीम कोर्ट के फैसले और समानता के अधिकार के खिलाफ है। लगभग डेढ़ घंटे तक चली बहस में इंदिरा साहनी फैसले की व्याख्या और उसकी संवैधानिक सीमाओं पर विस्तार से चर्चा हुई।
आखिर क्या है इंदिरा साहनी मामला?
साल 1992 में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने इंदिरा साहनी मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा था कि सामान्य परिस्थितियों में आरक्षण 50 फीसदी से अधिक नहीं होना चाहिए। हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा था कि विशेष और असाधारण परिस्थितियों में इस सीमा को पार किया जा सकता है। इसी अपवाद का उदाहरण आज आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी EWS को दिए गए 10 फीसदी आरक्षण के रूप में देखा जाता है। अब सवाल यही है कि क्या मध्यप्रदेश सरकार ओबीसी आरक्षण को भी “विशेष परिस्थिति” साबित कर पाएगी।
मध्यप्रदेश में कैसे पहुंचा आरक्षण 73 फीसदी?
राज्य सरकार की वर्तमान आरक्षण व्यवस्था के अनुसार अनुसूचित जनजाति (ST) को 20 फीसदी, अनुसूचित जाति (SC) को 16 फीसदी, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को 27 फीसदी और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) को 10 फीसदी आरक्षण दिया गया है। इस तरह कुल आरक्षण 73 फीसदी तक पहुंच जाता है और केवल 27 फीसदी सीटें अनारक्षित वर्ग के लिए बचती हैं। इसी आंकड़े को आधार बनाकर अनारक्षित वर्ग अदालत में इसे असंवैधानिक बता रहा है।
सरकार ने कोर्ट में सबमिट किए हैं हजारों पन्नों के दस्तावेज
मध्य प्रदेश सरकार इस मामले में अपना जवाब कोर्ट में पहले ही सबमिट कर चुकी है। मध्यप्रदेश सरकार ने 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण को सही ठहराने के लिए कोर्ट में हजारों पन्नों के दस्तावेज जमा किए थे। इनमें राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की कई रिपोर्टें शामिल हैं। सरकार ने 1983 की रामजी महाजन रिपोर्ट से लेकर 1996-97, 2000-01, 2007-08 और 2022 में गौरीशंकर बिसेन आयोग की रिपोर्ट तक कोर्ट में प्रस्तुत की है। इसके अलावा काका कालेलकर आयोग और बीपी मंडल आयोग की रिपोर्टों का भी हवाला दिया गया है।
सरकार का दावा- MP ओबीसी बाहुल्य राज्य
सरकार की ओर से पहले दिए गए लिखित जवाब में दावा किया गया है कि मध्यप्रदेश में ओबीसी आबादी बड़ी संख्या में मौजूद है और उनकी सामाजिक व शैक्षणिक स्थिति अभी भी कमजोर है। रिपोर्टों में दावा किया गया कि प्रदेश के 38 जिलों में ओबीसी आबादी 35 फीसदी से अधिक है, जबकि केवल दो जिलों में यह संख्या 14 फीसदी से कम है। सरकार का कहना है कि प्रदेश की सामाजिक संरचना को देखते हुए 27 फीसदी आरक्षण पूरी तरह न्यायसंगत और आवश्यक है।
गुरुवार को फिर होगी अहम सुनवाई
इस मामले की सुनवाई अब गुरुवार 14 मई को दोपहर 3 बजे फिर होगी। वरिष्ठ अधिवक्ता अमन लेखी को अपना पक्ष पूरा करने के लिए करीब 45 मिनट और दिए गए हैं। इसके बाद राज्य सरकार और ओबीसी आरक्षण के समर्थन में नियुक्त अधिवक्ताओं को अदालत में अपनी दलीलें रखने का मौका मिलेगा। अब पूरे प्रदेश की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या हाईकोर्ट इंदिरा साहनी फैसले की 50 फीसदी सीमा को सर्वोपरि मानता है या फिर मध्यप्रदेश की सामाजिक परिस्थितियों को “विशेष परिस्थिति” मानकर अलग दृष्टिकोण अपनाता है।
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