MP में 489 शराब दुकानें निगम से चलाने की तैयारी, मॉडल देखने CG जाएंगे दो अफसर
News In Short
- मध्यप्रदेश में नीलामी से बची 489 शराब दुकानें अब निगम मॉडल पर चलाई जा सकती हैं।
- सरकार पर राजस्व का 3500 करोड़ रुपए बकाया है।
- छत्तीसगढ़ (CG) मॉडल समझने के लिए दो आबकारी अफसर भेजे जाएंगे।
- कैबिनेट कमेटी ने 30 प्रतिशत से कम ऑफर भी स्वीकार करने पर सहमति दी है।
- अफसर 6 से 9 अप्रैल के बीच अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपेंगे।
News In Detail
489 दुकानें नीलामी में नहीं बिकीं
मध्यप्रदेश में आबकारी विभाग की नीलामी प्रक्रिया एक बड़े संकट में है। 12 राउंड की टेंडरिंग के बाद भी 489 शराब दुकानें बिना बिके बची हुई हैं। इन दुकानों से सरकार को अब तक करीब 19 हजार 952 करोड़ रुपए के राजस्व का लक्ष्य था, लेकिन तीन हजार करोड़ रुपए से ज्यादा की रकम अभी भी जुटानी बाकी है।
शनिवार, 04 अप्रैल को आयोजित 13वें राउंड की ई-टेंडरिंग (e-tendering) में भी 20 से 40 प्रतिशत तक ऑफर रिजर्व प्राइस से नीचे आए। इससे पहले के 12 राउंड में कुल 28 ऑफर आए और 176 करोड़ रुपए का लक्ष्य तय हुआ था।
30% से नीचे ऑफर भी लेंगे, कैबिनेट कमेटी राजी
शुक्रवार देर शाम शराब दुकानों की नीलामी के लिए बनी कैबिनेट कमेटी की बैठक हुई। इसमें आबकारी अधिकारियों ने 30 प्रतिशत से नीचे आए ऑफर स्वीकार करने पर सहमति जताई। कमेटी के सदस्य और मंत्री उदय प्रताप सिंह ने कहा कि ऐसा कानूनी रूप से ठीक नहीं होगा। उन्होंने कहा कि बची हुई 489 दुकानों को निगम बनाकर चलाया जा सकता है।
इसी के बाद शनिवार को आबकारी विभाग ने दो अधिकारियों को छत्तीसगढ़ भेजने का फैसला किया है। यह अधिकारी वहां पहले से चल रहे निगम मॉडल को समझेंगे।
छग मॉडल क्या है, दो अफसर क्यों जा रहे
छत्तीसगढ़ में शराब दुकानें सरकारी निगम के जरिए चलाई जाती हैं। इस मॉडल में दुकानें किसी निजी ठेकेदार को नहीं दी जातीं बल्कि सरकार खुद इन्हें संचालित करती है। मध्यप्रदेश अब यही फॉर्मूला अपनाने पर विचार कर रहा है।
प्रभारी उपायुक्त आलोक कुमार खरे और सहायक आबकारी आयुक्त सत्यनारायण दुबे को यह काम सौंपा गया है। ये दोनों अफसर 6 से 9 अप्रैल के बीच अपनी रिपोर्ट देंगे। इस रिपोर्ट के आधार पर आगे का फैसला होगा।
बाजार में देसी शराब और बियर की किल्लत
इस पूरे संकट का सीधा असर आम उपभोक्ताओं पर भी पड़ रहा है। एक अप्रैल से लागू नई आबकारी नीति के बाद प्रदेश की 40 प्रतिशत दुकानों पर स्टॉक न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया है।
अधिकांश दुकानों पर देसी शराब और बियर की सप्लाई प्रभावित हुई है। स्टॉक खत्म हो जाने के बाद बची हुई शराब ऊंची कीमत पर बिक रही है। नई नीति के तहत 3553 दुकानों के लिए ई-टेंडर और ई-ऑक्शन (e-auction) प्रक्रिया शुरू की गई। इसमें दुकानें छोटे समूहों में बांटकर कई पुराने ठेकेदारों को पीछे हटना पड़ा।
डिस्ट्रीब्यूटर और सप्लाई चेन भी प्रभावित
प्रदेश में सप्लाई का बड़ा हिस्सा एक डिस्ट्रीब्यूटर समूह के पास था। हाईकोर्ट द्वारा लाइसेंस निलंबन बरकरार रखे जाने के बाद सप्लाई चेन प्रभावित हुई है। वैकल्पिक कंपनियों से सप्लाई शुरू होने में समय लग रहा है, जिससे शॉर्टेज बनी हुई है।
नए टेकेदारों को डिपो से माल उठाने और दुकानों तक पहुंचाने में भी दिक्कत आ रही है। इससे उपभोक्ताओं को मनचाहा ब्रांड नहीं मिल पा रहा और विदेशी ब्रांड का आवक भी कम हुई है।
सरकार के राजस्व को हर दिन नुकसान
यह पूरा मामला सिर्फ शराब की बिक्री का नहीं है। सरकार को इससे हर दिन राजस्व का नुकसान हो रहा है। नई नीति में रिजर्व प्राइज बढ़ाने के बावजूद सप्लाई न होने से सरकार की कमाई घट रही है।
कैबिनेट कमेटी की बैठक के बाद यह साफ हो गया है कि सरकार को जल्द कोई बड़ा फैसला करना होगा। निगम मॉडल की रिपोर्ट आने के बाद ही तय होगा कि 489 दुकानों का भविष्य क्या होगा।
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