MP के जंगलों में 1000 साल पुराने पदचिन्हों की खोज,'नागरी लिपि' में लिखा शिलालेख भी मिला

Sanjay Dhiman | May 17, 2026, 17:37 IST
Photograph: (the sootr)
मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के जामगढ़ गांव के पास के जंगलों में, पुरातत्वविदों को चट्टानों पर उकेरे गए 1000 साल पुराने प्राचीन पदचिन्ह मिले हैं। ये खोज ऐतिहासिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण मानी जा रही है और इसका संबंध जैन धर्म से होने की संभावना है।

समझें क्या है मामला

  • रायसेन जंगलों में 1000 साल पुराने पत्थरों पर उकेरे पदचिन्ह मिले।
  • शिलालेख से पता चलता है कि यह 10वीं-11वीं शताब्दी, परमार काल का है।
  • पदचिह्न जैन मुनि और धार्मिक शिक्षा केंद्र से जुड़े हो सकते हैं।
  • INTACH टीम ने फील्ड सर्वे कर स्थल की सुरक्षा और अध्ययन की सिफारिश की।
  • खोज से मध्य प्रदेश के प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास पर नई रोशनी पड़ी।

MP के जंगलों में प्राचीन पदचिन्हों की खोज

मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के जामगढ़ गांव के जंगलों में पुरातत्वविदों को एक महत्वपूर्ण सफलता मिली है। यहां के पथरीले रास्तों पर करीब 800 मीटर क्षेत्र में पत्थरों पर उकेरे गए प्राचीन पदचिन्ह पाए गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ये कदम किसी महान संत या जैन मुनि के हो सकते हैं, जिन्होंने लगभग 1000 साल पहले इस क्षेत्र से यात्रा की थी।



शिलालेख और नागरी लिपि की जानकारी

साथ ही, इस स्थल पर एक शिलालेख भी मिला है, जिसमें प्रारंभिक नागरी लिपि में कुछ शब्द उकेरे गए हैं। इतिहासकारों का अनुमान है कि यह शिलालेख 10वीं से 11वीं शताब्दी का हो सकता है, यानी परमार काल के दौरान बना। इसमें "सिद्ध", "पद", "पंडित" और "कृत" जैसे शब्द लिखे गए हैं, जो उस समय के धार्मिक और शैक्षिक संदर्भों से जुड़े हैं।



INTACH की टीम ने की खोज

यह खोज इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (INTACH), भोपाल चैप्टर की पुरातत्वविद नैन्सी शर्मा और उनके सहयोगी मिलनाथ पेटेले द्वारा की गई। उन्होंने बताया कि स्थानीय ग्रामीणों की जानकारी के आधार पर यह फील्ड सर्वे आयोजित किया गया। हालांकि समय के साथ कुछ पदचिह्न धुंधले हो गए हैं, फिर भी अधिकांश सुरक्षित हैं।



ऐतिहासिक महत्व और जैन कनेक्शन

एम.एम. उपाध्याय, INTACH मध्य प्रदेश के संयोजक के अनुसार, पदचिन्ह और शिलालेख से यह संकेत मिलता है कि यह स्थल जैन मुनियों और संतों के साथ जुड़ा हुआ था। एएसआई (Archaeological Survey of India) के पूर्व निदेशक रवि शंकर ने इस लिपि को परमार राजवंश के समय की आरंभिक नागरी लिपि के रूप में मान्यता दी है।



विशेषज्ञों का मानना है कि इस काल में मध्य प्रदेश में कई जैन मंदिर और शिक्षा केंद्र बने थे। इन पदचिह्नों के माध्यम से यह इतिहास स्पष्ट होता है कि यह क्षेत्र जैन समुदाय के धार्मिक और शैक्षिक गतिविधियों का हिस्सा रहा होगा।



संरक्षण और भविष्य की योजना

स्थानीय प्रशासन और पुरातत्व विभाग ने इस स्थल को सुरक्षित क्षेत्र घोषित करने की पहल की है। पुरातत्वविदों का कहना है कि इन पदचिह्नों और शिलालेखों का अध्ययन करके इस क्षेत्र के धार्मिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक इतिहास को और गहराई से समझा जा सकता है।



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