एमपी के जंगलों में अब गूंजेगी शेर की दहाड़, भोपाल वन विहार प्रबंधन की तैयारी

Sanjay Dhiman | Aug 10, 2026, 18:31 IST
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एमपी में कूनो चीता प्रोजेक्ट की सफलता के बाद अब एशियाई सिंहों को जंगल में बसाने की तैयारी है। नवंबर-दिसंबर में गुजरात से शुद्ध नस्ल का जोड़ा लाया जाएगा।

मध्य प्रदेश के जंगलों को एक नई पहचान मिलने वाली है। कूनो अभयारण्य में चीता प्रोजेक्ट की सफलता के बाद अब वन विभाग एशियाई सिंहों पर काम कर रहा है। कोशिश है कि प्रदेश के जंगलों में सिंहों को दोबारा बसाया जाए। इसके लिए प्राकृतिक परिस्थितियां तैयार की जा रही हैं। इस प्रक्रिया को री-वाइल्डिंग कहते हैं।



इतिहास में कभी थे यहां सिंह

एक समय था जब विंध्य, बुंदेलखंड और मध्य भारत के जंगलों में एशियाई सिंह स्वतंत्र रूप से घूमते थे। धीरे-धीरे शिकार बढ़ता गया। जंगल भी तेजी से कटते गए। इन दोनों वजहों से सिंहों की संख्या घटती चली गई। 19वीं शताब्दी के अंत तक ये जंगल लगभग सिंह-विहीन हो चुके थे।



गुजरात से आएगा नया जोड़ा

अब वन विहार प्रबंधन इस दिशा में ठोस कदम उठा रहा है। इस साल नवंबर-दिसंबर में गुजरात से शुद्ध नस्ल के एशियाई सिंहों का एक जोड़ा लाया जाएगा। योजना है कि इनसे जन्मे शावकों को धीरे-धीरे जंगल में छोड़ा जाए। यह पूरी प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से चलेगी।



फिलहाल प्रदेश में सिंहों की मौजूदगी कुछ इस तरह है। वन विहार भोपाल में 5 सिंह हैं। ग्वालियर जू में भी 5 सिंह मौजूद हैं। सबसे ज्यादा 12 सिंह इंदौर जू में हैं।



पुराना प्रयास क्यों नहीं हो सका सफल

वन विहार के डायरेक्टर विजय कुमार ने इस बारे में अहम जानकारी दी। उनके मुताबिक वर्तमान में मौजूद 5 सिंहों में ब्रीडिंग संभव नहीं है। इसकी वजह इनका जीन पूल और संरक्षण से जुड़े कारण हैं। सत्या और गंगा नाम के सिंहों से प्रजनन कराने की कोशिश हुई थी, लेकिन यह प्रयास सफल नहीं हो सका।



दिसंबर 2024 में जूनागढ़ से एक नया जोड़ा लाया गया था। लेकिन जांच में नर सिंह में कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV – Canine Distemper Virus) पाया गया। यह एक संक्रामक वायरस है जो जानवरों को गंभीर रूप से बीमार कर सकता है। इसके बाद तुरंत ब्रीडिंग रोकने के निर्देश दे दिए गए।



इंदौर जू में सिंहों की बड़ी संख्या

इंदौर चिड़ियाघर के प्रभारी उत्तम सिंह ने भी अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि यहां अभी 12 सिंह मौजूद हैं। बिलासपुर से लाए गए एक जोड़े से पहले 15 शावकों का जन्म हुआ था। इसके बाद हरियाणा के भिवानी से लाए गए सिंहों से 6 और शावक पैदा हुए।



इस सफल प्रजनन के बाद कुल 21 सिंहों को दूसरे चिड़ियाघरों में भेजा गया। यह दिखाता है कि सही परिस्थितियों में सिंहों का प्रजनन सफलतापूर्वक हो सकता है।



नई पीढ़ी तैयार करने पर जोर

प्रधान मुख्य वन संरक्षक शुभरंजन सेन ने इस पूरी योजना का मकसद साफ किया। उनके अनुसार एशियाई सिंहों के संरक्षण और री-वाइल्डिंग पर काम चल रहा है। शुद्ध आनुवंशिक गुणों वाले सिंहों से प्रजनन कराया जाएगा। इसका उद्देश्य एक स्वस्थ और मजबूत नई पीढ़ी तैयार करना है।



यह पूरी योजना सिर्फ चिड़ियाघरों तक सीमित नहीं है। असली मकसद है सिंहों को उनके प्राकृतिक आवास में दोबारा बसाना। अगर यह प्रयास सफल रहता है, तो मध्य प्रदेश के जंगलों की पहचान एक बार फिर बदल सकती है।



FAQ

  1. एमपी में सिंहों की री-वाइल्डिंग योजना क्या है?
    यह योजना है सिंहों को दोबारा उनके प्राकृतिक जंगलों में बसाने की। इसके लिए गुजरात से शुद्ध नस्ल के सिंह लाए जाएंगे। इनसे जन्मे शावकों को धीरे-धीरे जंगल में छोड़ा जाएगा।
  2. वन विहार में सिंहों की ब्रीडिंग क्यों रोकी गई थी?
    जूनागढ़ से लाए गए नर सिंह में कैनाइन डिस्टेंपर वायरस मिला था। यह एक संक्रामक बीमारी है। सुरक्षा कारणों से ब्रीडिंग रोकने का निर्देश दिया गया।
  3. प्रदेश के किन शहरों में एशियाई सिंह मौजूद हैं?
    फिलहाल भोपाल के वन विहार में 5, ग्वालियर जू में 5 और इंदौर जू में 12 सिंह हैं। इंदौर में सबसे ज्यादा सिंह मौजूद हैं।

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