अतिथि विद्वानों को 25% आरक्षण सही, चुनौती देने वाली याचिका हाई कोर्ट ने खारिज की

Sourabh Bhatnagar | Aug 24, 2026, 10:20 IST
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हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने अतिथि विद्वानों को दिए गए 25 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण को वैध ठहराया है। शासकीय कॉलेजों में सहायक प्राध्यापक भर्ती से जुड़ी यह याचिका खारिज कर दी गई। कोर्ट ने कहा कि इससे आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा नहीं टूटती।

समझें क्या है पूरा मामला

  1. हाई कोर्ट ने अतिथि विद्वानों को दिया 25% आरक्षण सही ठहराया।
  2. यह आरक्षण सहायक प्राध्यापक भर्ती के 97 पदों में लागू है।
  3. याचिकाकर्ताओं ने कहा आरक्षण से कुल सीमा 67% तक पहुंचती है।
  4. कोर्ट ने इसे क्षैतिज आरक्षण मानते हुए तर्क को खारिज किया।
  5. सरकार ने कहा नीति भर्ती विज्ञापन से पहले ही तय थी।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने अतिथि विद्वानों को दिए गए 25 प्रतिशत आरक्षण को सही ठहराया है। कोर्ट ने इस आरक्षण को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया। यह मामला सरकारी कॉलेजों में सहायक प्राध्यापक भर्ती से जुड़ा था।



इस मामले में न्यायमूर्ति सुबोध अभ्यंकर और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की बेंच ने फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि सरकार ने जो आरक्षण नीति बनाई थी, उसी के आधार पर भर्ती का विज्ञापन जारी किया गया था।



दरअसल, सरकारी कॉलेजों में सहायक प्राध्यापक के 97 पदों पर भर्ती होनी थी। इसमें अतिथि विद्वानों के लिए 25 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान रखा गया था। यह आरक्षण हर वर्ग के अंदर दिया गया था।



कोर्ट ने साफ किया कि यह क्षैतिज आरक्षण (Horizontal Reservation) है। इसका मतलब है कि यह अलग-अलग वर्गों के भीतर लागू होता है। इसलिए इससे आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा का उल्लंघन नहीं होता।



याचिकाकर्ताओं ने सरकार के तीन फैसलों को चुनौती दी थी। इनमें 24 दिसंबर 2024 का आदेश, 30 दिसंबर का भर्ती विज्ञापन और 31 दिसंबर की अधिसूचना शामिल थी।



कोर्ट ने सभी दस्तावेजों और सरकार की नीति को देखने के बाद माना कि आरक्षण का फैसला नियमों के अनुसार है। इसके बाद कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया।



इस फैसले से प्रदेश के कई अतिथि विद्वानों को बड़ी राहत मिली है। अब सहायक प्राध्यापक भर्ती प्रक्रिया में उनके लिए तय आरक्षण व्यवस्था जारी रहेगी।



याचिकाकर्ताओं ने आरक्षण को लेकर क्या तर्क दिए

इस मामले में याचिकाकर्ताओं ने MP High Courtके सामने कई आपत्तियां रखीं। उनका कहना था कि जब भर्ती का विज्ञापन जारी हुआ था, तब नियमों में अतिथि विद्वानों के लिए 25 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान नहीं था।



याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि बाद में किए गए नियम संशोधन को पुराने भर्ती विज्ञापन पर लागू नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि आरक्षण जुड़ने से कुल आरक्षण का प्रतिशत बढ़कर करीब 67 प्रतिशत हो जाता है।



उन्होंने इसे सुप्रीम कोर्ट की तय 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा के खिलाफ बताया। याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि इतना अधिक आरक्षण समान अवसर के अधिकार को प्रभावित करता है।



उनका कहना था कि आरक्षण बढ़ने से सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों के लिए उपलब्ध सीटें कम हो सकती हैं। इससे भर्ती में बराबरी के अवसर प्रभावित होने की आशंका है।



याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से मांग की थी कि इस भर्ती प्रक्रिया पर रोक लगाई जाए और 25 प्रतिशत आरक्षण के फैसले को रद्द किया जाए।



सरकार और पीएससी ने कोर्ट में क्या कहा

इस मामले में सरकार और PSCने हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में भी अपना पक्ष रखा। सरकार ने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ताओं ने पहले भर्ती परीक्षा में हिस्सा लिया था। परीक्षा में सफल नहीं होने के बाद उन्होंने इस प्रक्रिया को चुनौती दी।



सरकार का कहना था कि अतिथि विद्वानों को दिया गया 25 प्रतिशत आरक्षण कोई अलग से आरक्षण नहीं है। यह क्षैतिज आरक्षण है, जो हर वर्ग के अंदर लागू किया जाता है।



सरकार ने कहा कि भर्ती प्रक्रिया शुरू होने के समय ही यह नीति स्पष्ट थी। इसी नीति के आधार पर भर्ती का विज्ञापन जारी किया गया था।



वहीं, पीएससी ने भी कोर्ट में कहा कि पूरी भर्ती प्रक्रिया नियमों के मुताबिक ही कराई गई है। विज्ञापन से लेकर चयन प्रक्रिया तक सभी कदम तय नियमों के अनुसार उठाए गए।



सरकार और पीएससी दोनों ने कोर्ट से याचिका खारिज करने की मांग की। कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों को स्वीकार करते हुए आरक्षण को वैध माना और याचिका खारिज कर दी।



अतिथि विद्वानों के आरक्षण नियमों में कैसे हुए बदलाव

मध्य प्रदेश के अतिथि विद्वान को लेकर सरकार ने समय-समय पर नियमों में बदलाव किए हैं। साल 2022 में अतिथि विद्वानों को उम्र सीमा में राहत दी गई थी। इसमें अधिकतम पांच साल तक की छूट का प्रावधान था।



इसके अलावा अतिथि विद्वानों (अतिथि विद्वान मध्य प्रदेश) को उनके अनुभव के आधार पर बोनस अंक देने की व्यवस्था भी की गई थी। इसमें अधिकतम 20 अंक तक दिए जाने का प्रावधान था।



इसके बाद 31 दिसंबर 2024 को सरकार ने नियमों में बड़ा बदलाव किया। इसी दिन अतिथि विद्वानों के लिए 25 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण लागू किया गया।



इस आरक्षण का लाभ हर अतिथि विद्वान को नहीं मिलेगा। इसके लिए कुछ शर्तें तय की गई हैं। जिन अतिथि विद्वानों ने सरकारी कॉलेज में कम से कम एक पूरा सत्र पढ़ाया है, उन्हें इसके लिए पात्र माना जाएगा।



इसके अलावा साल 2019 की नीति के तहत भी कुछ छूट का प्रावधान रखा गया है। इस नीति में चार अंक हासिल करने वाले अतिथि विद्वानों को पात्रता दी गई थी।



सरकार ने यह आरक्षण स्थायी व्यवस्था के तौर पर लागू नहीं किया है। इसे सिर्फ अगली तीन भर्ती प्रक्रियाओं तक सीमित रखा गया है। इसके बाद सरकार इस व्यवस्था की समीक्षा कर सकती है।



गौरतलब है कि प्रदेश में कई अतिथि विद्वान लंबे समय से नियमित नियुक्ति का इंतजार कर रहे हैं। हाई कोर्ट के इस फैसले से उन्हें भर्ती प्रक्रिया में बड़ी राहत मिली है।



FAQ

  1. प्रश्न 1: एमपी हाई कोर्ट ने अतिथि विद्वानों के आरक्षण पर क्या फैसला दिया?
    उत्तर: हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने अतिथि विद्वानों को दिए गए 25 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण को वैध ठहराया है। कोर्ट ने इसे चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। न्यायमूर्ति सुबोध अभ्यंकर और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की बेंच ने यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने माना कि सरकार का यह निर्णय भर्ती विज्ञापन से पहले ही तय हो चुका था।
  2. प्रश्न 2: अतिथि विद्वानों के लिए 25 प्रतिशत आरक्षण किन्हें और कब तक मिलेगा?
    उत्तर: जिन अतिथि विद्वानों ने कम से कम एक पूरा शैक्षणिक सत्र शासकीय कॉलेज में पढ़ाया है, वे इसके पात्र हैं। साथ ही 2019 की नीति के तहत चार अंक अर्जित करने वाले भी पात्र माने गए हैं। यह आरक्षण 31 दिसंबर 2024 से लागू है और केवल अगली तीन भर्ती प्रक्रियाओं तक सीमित रहेगा।

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