MP बार काउंसिल सचिव की नियुक्ति पर सवाल, बिना रिजल्ट घोषित हुए बन गए सचिव
News In Short
- गीता शुक्ला की नियुक्ति रद्द होने के बाद नई भर्ती विवादों में घिर गई है।
- आशीष आनंद पांडे की नियुक्ति पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
- 28 अप्रैल 2026 को हाईकोर्ट में सुनवाई होना संभावित है।
- बिना रिजल्ट घोषित किए ही नियुक्ति होने का आरोप लगा है।
- नई निष्पक्ष परीक्षा कराने की मांग की गई है।
News In Detail
हाईकोर्ट के आदेश के बाद नियुक्ति फिर भी विवाद
मध्य प्रदेश स्टेट बार काउंसिल में पूर्व सचिव गीता शुक्ला की नियुक्ति को अवैध ठहराते हुए हाईकोर्ट ने उन्हें उनके मूल पद (LDC) पर वापस भेजने का आदेश दिया था। कोर्ट ने परिषद को निर्देश दिया था कि निर्धारित प्रक्रिया के तहत दो महीने के भीतर सीधे भर्ती के माध्यम से नए सचिव की नियुक्ति की जाए।
इसी आदेश के पालन में जनवरी 2026 में नई भर्ती प्रक्रिया शुरू की गई। इसके बाद जिस नए सचिव की नियुक्ति हुई अब वही प्रक्रिया गंभीर आरोपों के घेरे में आ गई है।
सचिव पद के उम्मीदवार अधिवक्ता ने दायर की याचिका
याचिकाकर्ता अतुल सिंह भारद्वाज की ओर से अधिवक्ता नितिन प्रजापति और अधिवक्ता ठाडेश्वर गोले ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। इस मामले की सुनवाई जबलपुर हाईकोर्ट में 28 अप्रैल को होना संभावित है।
जहां दोनों अधिवक्ता भर्ती प्रक्रिया में हुई कथित अनियमितताओं, पारदर्शिता की कमी और नियमों के उल्लंघन को विस्तार से प्रस्तुत करेंगे। आरोप हैं कि चयन प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं थी। साथ ही इसमें पूर्वाग्रह या मनमानी की संभावना रही है।
बिना सिलेबस के परीक्षा, पारदर्शिता पर सवाल
याचिका में यह आरोप लगाया गया है कि भर्ती प्रक्रिया की शुरुआत से ही पारदर्शिता का अभाव रहा था। अभ्यर्थियों द्वारा परीक्षा से पहले सिलेबस मांगा गया, लेकिन परिषद की ओर से कोई जानकारी नहीं दी गई थी।
इसके बावजूद 15 मार्च 2026 को लिखित परीक्षा आयोजित कर दी गई। बिना सिलेबस के परीक्षा आयोजित होना प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करता है। साथ ही अभ्यर्थियों के साथ समान अवसर के सिद्धांत का उल्लंघन माना जा रहा है।
रिजल्ट घोषित नहीं, सीधे इंटरव्यू और नियुक्ति
इस पूरे मामले का सबसे गंभीर आरोप यह है कि लिखित परीक्षा के बाद परिषद ने कोई परिणाम या मेरिट लिस्ट सार्वजनिक नहीं की गई। इसके बजाय सभी अभ्यर्थियों को सीधे 24 मार्च को इंटरव्यू के लिए बुलाया गया।
इसके बाद 09 अप्रैल 2026 को बिना किसी आधिकारिक चयन सूची या सार्वजनिक सूचना के आशीष आनंद पांडे को सचिव पद पर नियुक्त कर दिया गया था। इससे पूरी चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
नियमों की अनदेखी और कोरम पर विवाद
याचिका में एडवोकेट एक्ट 1961 के प्रावधानों के उल्लंघन का भी आरोप लगाया गया है। नियमों के अनुसार सचिव की नियुक्ति बार काउंसिल की सामूहिक स्वीकृति से होनी चाहिए, लेकिन आरोप है कि यह निर्णय केवल अध्यक्ष स्तर पर लिया गया था।
इसके अलावा जिस बैठक में नियुक्ति को मंजूरी दी गई उसमें आवश्यक कोरम पूरा नहीं था और कुछ सदस्यों ने इसका विरोध भी किया था। इससे पूरी प्रक्रिया की वैधता पर सवाल खड़े हो गए हैं।
निष्पक्ष जांच की मांग, फैसले पर नजर
याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट से मांग की है कि पूरी भर्ती प्रक्रिया को रद्द कर स्वतंत्र निगरानी में नई परीक्षा आयोजित कराई जाए। उनका कहना है कि जब तक चयन प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और नियमों के अनुरूप नहीं होगी, तब तक योग्य उम्मीदवारों के साथ न्याय संभव नहीं है।
अब 28 अप्रैल की सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी हैं, जहां इस पूरे विवाद पर अहम न्यायिक निर्णय सामने आ सकता है
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