एमपी में प्रशासनिक लापरवाही, अफसरों को अदालतों की कड़ी फटकार
News in Short :
- प्रशासनिक लापरवाही और संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन।
- कोर्ट के फैसलों का पालन न करने पर अफसरों को फटकार।
- अफसरों की कार्यशैली में कोई बदलाव नहीं आया।
- अदालतों की नाराजगी से अफसरों की निरंकुश कार्यशैली पर सवाल।
- सरकार भी प्रशासनिक फैसलों में बेबस और अफसरों पर नियंत्रण नहीं।
Intro
BHOPAL. मध्य प्रदेश में अदालतें प्रशासनिक लापरवाही, संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन और कोर्ट के फैसलों का पालन न करने पर अफसरों को लगातार फटकार लगा रही हैं। प्रशासनिक निर्णयों में चूक, मनमाने निर्देश और दायित्व निर्वाह में सुस्ती अदालतों की नाराजगी की वजह बन रही है। इसके बाद भी प्रशासनिक अधिकारियों की कार्यशैली में कोई बदलाव नहीं आया है। अदालतों की यही नाराजगी व्यवस्था में बैठे निरंकुश अफसरों की कार्यशैली को भी कटघरे में कर रही है।
News in Detail :
प्रदेश के प्रशासनिक अधिकारी अदालत और सरकार तक की नहीं सुन रहे हैं। इन अफसरों में मुख्य सचिव से लेकर कलेक्टर तक शामिल हैं। ये महज कोरे आरोप नहीं हैं बल्कि इसकी तस्दीक हाल ही में अदालतों की नाराजगी और अफसरों पर की गई तीखी टिप्पणी कर चुकी हैं। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट भी प्रशासनिक लापरवाही, नियमों की अनदेखी और अदालतों की अवमानना पर फटकार लगा चुके हैं। इसके बाद भी अफसरशाही पर कसावट नजर नहीं आ रही है।
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निरंकुश व्यवस्था, बेबस सरकार :
प्रशासनिक फैसलों में अफसरों की टालमटोल, मनमाने निर्देशों और संवैधानिक दायित्वों की अनदेखी के मामलों में सरकार भी बेबस दिख रही है। अधिकारी द्वारा कैसे नियमों की अनदेखी और कोर्ट के आदेशों की अवमानना की जा रही है और कैसे अदालतों की फटकार प्रशासनिक मशीनरी पर सवाल खड़े कर रही हैं इसके कई उदाहरण हैं। ऐसे ही कुछ मामले द सूत्र की पड़ताल में सामने आए हैं।
कोर्ट की नाराजगी के ये हैं प्रमुख मामले
1. मुख्य सचिव से भी नाराजगी
इंदौर हाईकोर्ट शहर में दूषित पानी से मौतों के मामले में प्रशासन की नाकामी पर नाराजगी जता चुका है। मामले में प्रशासनिक लापरवाही मानते हुए कोर्ट ने मुख्य सचिव को तलब भी किया था। मुख्य सचिव ने सुप्रीम कोर्ट में आवारा कुत्तों के नियंत्रण को लेकर जारी किए गए आदेश की अवमानना को लेकर माफी मांग चुके हैं। आवारा कुत्तों पर नियंत्रण पर अदालत के निर्देशों के पालन के लिए हलफनामा दाखिल करने में देरी को लेकर सीएस को सुप्रीम कोर्ट ने तलब किया था। वहीं, ग्वालियर बेंच भी सरकारी जमीनों की सुरक्षा की अनदेखी के मामले में मुख्य सचिव को जवाब पेश करने के लिए तलब कर चुकी है।
2. शाजापुर कलेक्टर को बार- बार फटकार
शाजापुर कलेक्टर ऋजु बाफना को हाईकोर्ट कई मामलों में फटकार लगा चुका है। पहला मामला कलेक्ट्रेट में पदस्थ कर्मचारी जयंत बघेरवाल की दो वेतनवृद्धि रोकने और गुलाना अटैच किए जाने से जुड़ा है। कर्मचारी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। जस्टिस जयकुमार पिल्लई ने कलेक्टर ऋजु बाफना पर टिप्पणी कर कहा था कि कलेक्टर को कानून की जानकारी नहीं है वे कुछ भी आदेश पारित कर देती हैं। 16 मार्च 2026 को हाईकोर्ट ने आबकारी अधिकारी विनय रंगशाही के मामले में भी कलेक्टर बाफना को कड़ी फटकार लग चुकी है।
3. छिंदवाड़ा कलेक्टर का आदेश रद्द
जबलपुर हाईकोर्ट ने अवैध खनन के केस में छिंदवाड़ा कलेक्टर की कार्रवाई पर नाराजगी जताकर उनका आदेश रद्द कर दिया। जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिविजन बेंच ने कलेक्टर पर 50 हजार का जुर्माना भी लगाया गया है। छिंदवाड़ा के चौरई में खनिज अमले ने ट्रक को रोककर अवैध खनन परिवहन का केस दर्ज किया था। कलेक्टर ने मामले में ट्रक ड्राइवर से विस्तृत पूछताछ और वाहन मालिक के सत्यापन के बिना ही ट्रक को राजसात करने की कार्रवाई कर आदेश जारी किया था। हाईकोर्ट ने इस कार्रवाई को “लापरवाही और यांत्रिक” माना है। डिवीजन बेंच ने कहा था कि केवल अधीनस्थ अधिकारी की रिपोर्ट पर आंख मूंदकर फैसला लेना न्यायिक प्रक्रिया का उल्लंघन है।
4. ग्वालियर एसएसपी पर तीखी टिप्पणी
हैबियस कार्पस की सुनवाई के दौरान ग्वालियर हाईकोर्ट आईपीएस अफसर धर्मवीर सिंह की कार्यशैली पर तल्खी दिखा चुका है। ग्वालियर के मुरार निवासी योगेश गोयल का विवाह आगरा की निशा राठौर से हुआ था। निशा परिवार से अलग रहने की जिद करती रही और मई 2025 में बिना बताए बच्चे को लेकर आगरा चली गई थी। उसने बच्चे वापस लेने के लिए 50 लाख रुपए की मांग की और योगेश को गिरफ्तार करा दिया था। योगेश को पेश कराने के लिए ही हैबियस कार्पस लगाई गई थी। एसएसपी द्वारा वाहवाही लूटने पर हाईकोर्ट ने टिप्पणी कर कहा था एसएसपी ताल ठोंककर कहते हैो कि वह स्वयं कॉर्पस को बरामद कर पेश करते हैं, जबकि हकीकत यह है कि कॉर्पस तो स्वयं थाने पहुंच जाता है।
5. हेल्थ अफसरों को सुनाई सजा
इंदौर हाईकोर्ट द्वारा स्वास्थ्य विभाग के पूर्व पीएस, हेल्थ कमिश्नर सहित चार अधिकारियों को दो माह की सजा सुनाई जा चुकी है। दरअसल, साल 2002 से 2016 के बीच नियुक्त स्वास्थ्यकर्मियों की याचिका 22 बार लिस्टेड होने और कोर्ट के आदेश पर विभाग द्वारा कार्रवाई नहीं की गई थी। जिस पर अवमानना याचिका पेश की गई थी। कोर्ट ने जिम्मेदारी तय कर तत्कालीन पीएस मो. सुलेमान, हेल्थ कमिश्नर तरुण राठी, क्षेत्रीय संचालक डीके तिवारी और सीएमएचओ गोविंद चौहान को दो माह के साधारण कारावास से दंडित किया है। हांलाकि सजा को तीन सप्ताह के लिए रोका गया है।
6. शिक्षक के निलंबन की कार्रवाई पर रोक
सोशल मीडिया पर वायरल गैस सिलेंडर की किल्लत पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मिमिक्री के वीडियो को आधार बनाकर शिक्षक के निलंबन को ग्वालियर हाईकोर्ट बेंच ने गलत बताया है। विधायक प्रीतम लोधी की शिकायत पर जिला शिक्षा अधिकारी विवेक श्रीवास्तव ने प्राथमिक शिक्षक साकेत पुरोहित को निलंबित कर दिया था। हाईकोर्ट पहुंची याचिका पर सुनवाई कर जस्टिस आशीष श्रोती ने डीईओ की कार्रवाई को सस्पेंशन सिंड्रोम बताया था। हाईकोर्ट बेंच ने टिप्पणी कर कहा था कि अधिकारियों को सुनिश्चित करना चाहिए कि वे किसी के दबाव के काम करने की जगह तथ्यों और नियमों के आधार पर निर्णय लें। जनप्रतिनिधि की शिकाय पर दबाव में निलंबन गलत है।
7. रायसेन कलेक्टर के खिलाफ वारंट
अदालतों के आदेशों पर अफसरशाही की बेरुखी का ऐसा ही मामला रायसेन कलेक्टर से भी जुड़ा है। रेवेन्यू बोर्ड के आदेश का पालन न करने पर जबलपुर हाईकोर्ट ने व्यक्तिगत हाजिर होकर कलेक्टर से जवाब तलब किया था। कलेक्टर अरुण कुमार विश्वकर्मा ने जवाब तो पहुंचाया, लेकिन खुद नहीं पहुंचे। इस पर हाईकोर्ट ने कलेक्टर के प्रशासनिक आचरण पर कड़ी टिप्पणी की थी। वहीं, इस नाफरमानी से नाराज होकर कलेक्टर को कोर्ट में हाजिर होने के लिए 25 हजार रुपए का वारंट जारी कर डीजीपी को तामीली का आदेश दिया था। आईएएस अफसर के आचरण पर कोर्ट की टिप्पणी भी प्रदेश की प्रशासनिक मशीनरी की कार्यशैली का खुलासा करती है।
8. जीएडी पीएस सेलवेंद्रन को फटकार
ग्वालियर हाईकोर्ट बेंच सामान्य प्रशासन विभाग के प्रमुख सचिव एम. सेलवेंद्रम की कार्यशैली पर एतराज जता चुकी है। एक प्रकरण में विभागीय अधिकारी अशोक चौहान पर विभागीय जांच के बाद पेश की गई चार्जशीट को बदला गया था। पीएस के आदेश पर हुई इस कार्रवाई के खिलाफ मामला हाईकोर्ट पहुंचा था। जहां सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट बेंच ने कड़ी फटकार लगाते हुए टिप्पणी की थी। हाईकोर्ट ने कहा था- प्रमुख सचिव या तो कानून से अनभिज्ञ हैं या बेईमान इरादे से अदालत के साथ धोखाधड़ी की कोशिश कर रहे हैं। कोर्ट की नाराजगी के बाद पीएस को कोर्ट के निर्णयों की जानकारी न होने की स्वीकारोक्ति के साथ माफी मांगनी पड़ी थी।
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जिम्मेदारी तय करे सरकार, तभी होगा सुधार
सरकार को प्रशासनिक अधिकारियों की कार्यशैली में सुधार के लिए कठोर कदम उठाने की जरूरत है। अधिकारियों पर जवाबदेही तय कर उन्हें कोर्ट के आदेशों का पालन सुनिश्चित करना चाहिए। इसके लिए सख्त निगरानी, पारदर्शिता और बेहतर प्रशिक्षण की जरूरत है ताकि न्यायिक आदेशों का उल्लंघन रोका जा सके। जिम्मेदारी तय करने के लिए अधिकारियों को अनुशासनित करना जरूरी है।