एमपी कैडर के दो रिटायर्ड अफसरों ने जातीय राजनीति पर उठाए सवाल
News in Short
- मनोज श्रीवास्तव और राजीव शर्मा ने आरक्षण और जातीय राजनीति पर सवाल उठाए।
- श्रीवास्तव ने जातीय आधार पर आत्महत्याओं के आंकड़े न देने पर तंज किया।
- राजीव शर्मा ने आरक्षण के विभाजन पर कटाक्ष किया और समाज की समरसता की बात की।
- राजीव ने लिखा कि ब्रिटिश दुष्टता का जाल अब और मजबूत है, लेकिन हमें समरसता की ओर बढ़ना चाहिए।
- श्रीवास्तव ने डेटा के आधार पर छात्रों की आत्महत्याओं की बढ़ती संख्या पर सवाल उठाए।
News in Detail
एमपी कैडर के दो रिटायर्ड अफसरों ने आरक्षण को लेकर बढ़ती जातीय लड़ाई पर तंज कसा। पूर्व अपर मुख्य सचिव मनोज श्रीवास्तव ने आत्महत्या की घटनाओं में जाति के आधार पर राजनीति करने वालों को घेरा। सचिव स्तर के पूर्व आईएएस राजीव शर्मा ने आरक्षण के तहत कमजोर वर्ग को बढ़ावा देने और सामान्य वर्ग की अनदेखी पर सवाल उठाए। मनोज श्रीवास्तव ने फेसबुक पर लिखा कि लोग हर बात में जाति देखते हैं, लेकिन विद्यार्थियों की आत्महत्या के आंकड़ों का जातीय विवरण क्यों नहीं दिया गया।
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आरक्षण पर कटाक्ष
एमपी कैडर के आईएएस अधिकारी राजीव शर्मा ने आरक्षण पर कटाक्ष किया। उन्होंने फेसबुक वॉल पर लिखा कि 15 अगस्त 1947 तक हम भारतीय थे। इसके बाद हम अनुसूचित जाति और जनजाति में बंट गए। विभाजन बढ़ते गए, हम अगड़े और पिछड़े हो गए। अब अति पिछड़े और आर्थिक पिछड़े वर्गों की पहचान की गई। जनजातियों में भी अति पिछड़ी जनजाति अलग की गई। अब सभी वर्ग दुखी हैं।
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क्या बोले राजीव शर्मा
राजीव शर्मा ने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा, दर्द बढ़ता गया, जैसे-जैसे दवा की। हम सवर्ण हुए, अवर्ण हुए। अगड़े हुए, पिछड़े हुए। दौड़ होनी थी, हम लुड़कने लगे। कोई न कोई पीछे छूटेगा। उन्होंने उदाहरण दिया कि पांच अंगुलियों में एक बड़ी, दो मध्यम और एक छोटी होती है। शर्मा ने लिखा, कमजोर बच्चा ज्यादा लाड़ का हकदार है। लेकिन स्वस्थ बच्चे को पीटने से वह मजबूत नहीं होगा। उन्होंने कहा, राजनीति का गणित अलग है, समाज समरसता के बिना नहीं चल सकता।
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ब्रिटिश दुष्टता का जाल अब और मजबूत
रिटायर्ड आईएएस राजीव शर्मा ने लिखा, ब्रिटिश दुष्टता का जाल अब और मजबूत है। लेकिन हमें विदेशियों से उतनी घृणा नहीं, जितनी अपने भाइयों से है। समता और न्याय से भारत आगे बढ़ा है। यह बढ़त सभी वर्गों के प्रयासों से संभव हुई है।" उन्होंने कहा, अभी भी लंबा रास्ता बाकी है। आइए, समरसता की ओर बढ़ें।
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किसानों से ज्यादा विद्यार्थी कर रहे आत्महत्या
मनोज श्रीवास्तव ने लिखा है कि यह पता चलना चाहिए कि क्या हो रहा है। 2013 से तुलना करने पर, विद्यार्थियों की आत्महत्याओं में 65% वृद्धि हुई है। NCRB (नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो) के नए डेटा के अनुसार, छात्रों की आत्महत्याएं किसानों की तुलना में अधिक हैं। 13,892 के मुकाबले 10,786 किसानों ने आत्महत्या की, जिनमें कृषि मजदूर भी शामिल हैं। श्रीवास्तव ने सवाल उठाया कि वे कौन से लोग हैं, जिनके लिए एक वर्ग-विशेष के विद्यार्थी की जान महत्वपूर्ण है और दूसरे वर्ग के विद्यार्थी की जान बस व्यर्थ है?