एमपी में अब ठेके पर चलेंगे सरकारी अस्पताल, पहले चरण में 18 अस्पतालों का चयन
मध्य प्रदेश में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों का संचालन अब निजी हाथों में जाएगा। यह राज्य में पहली बार हो रहा है। सरकार ने इसे पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर मंजूरी दी है। रीवा, देवास और गुना के 18 अस्पताल इसमें शामिल हैं। यह योजना पांच साल के लिए लागू की गई है।
डॉक्टरों की भारी कमी क्यों बनी वजह
मध्य प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था लंबे समय से डॉक्टरों और विशेषज्ञों की कमी झेल रही है। कई सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता। इसी समस्या से निपटने के लिए सरकार ने आउटसोर्सिंग का रास्ता चुना है।
लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग ने इसका औपचारिक आदेश जारी किया है। पहले चरण में तीन जिलों को चुना गया है। आगे इस मॉडल को अन्य जिलों में भी बढ़ाया जा सकता है।
निजी एजेंसी को क्या करना होगा
चुनी गई निजी एजेंसी या ट्रस्ट को अस्पताल का पूरा प्रबंधन संभालना होगा। इसमें हाउसकीपिंग और सिक्योरिटी भी शामिल है। एजेंसी को तय मापदंडों के अनुसार डॉक्टर और विशेषज्ञ भी उपलब्ध कराने होंगे। यानी सिर्फ प्रबंधन नहीं, बल्कि मेडिकल स्टाफ की जिम्मेदारी भी निजी हाथों में रहेगी।
जैसा है जहां है की नीति पर ट्रांसफर
अस्पतालों का पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर 'जैसा है, जहां है' की स्थिति में सौंपा जाएगा। इसका मतलब है कि मौजूदा भवन, उपकरण और संसाधन उसी हालत में ट्रांसफर होंगे। हालांकि मरीजों को राहत देने के लिए एक अहम शर्त रखी गई है। सरकारी दवाई, टीके और सर्जरी से जुड़ा सामान राज्य सरकार की नीति के अनुसार ही मिलता रहेगा। ओपीडी और आईपीडी सेवाओं का सामान भी स्वास्थ्य विभाग उपलब्ध कराएगा।
मौजूदा स्टाफ का क्या होगा
अस्पतालों में पहले से तैनात सरकारी डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ के लिए एक खास व्यवस्था बनाई गई है। उन्हें एक बार जिले के दूसरे संस्थान में ट्रांसफर लेने का मौका मिलेगा। जो स्टाफ ट्रांसफर नहीं लेगा, उसका वेतन मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी यानी सीएमएचओ (CMHO – Chief Medical and Health Officer) के जरिए दिया जाएगा। इससे साफ है कि मौजूदा स्टाफ की नौकरी पूरी तरह खत्म नहीं होगी।
कांग्रेस ने जताई सीधी आपत्ति
जुलाई 2026 में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने इस मुद्दे पर बड़ा कदम उठाया। उन्होंने कांग्रेस के आदिवासी विधायकों के साथ राज्यपाल मंगुभाई पटेल और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मुलाकात की।
विधायकों ने सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के साथ-साथ छात्रावासों और आईटीआई (ITI – Industrial Training Institute) को निजी हाथों में सौंपे जाने पर भी आपत्ति दर्ज कराई। कांग्रेस का कहना है कि इससे आम लोगों की सरकारी सुविधाओं तक पहुंच प्रभावित हो सकती है।
आगे क्या हो सकता है
फिलहाल यह योजना पायलट प्रोजेक्ट के स्तर पर है। पांच साल तक इसके नतीजों पर सरकार की नजर रहेगी। अगर मॉडल सफल रहा तो इसे अन्य जिलों में भी लागू किया जा सकता है। वहीं विपक्ष का विरोध आने वाले समय में सियासी मुद्दा बन सकता है।
FAQ
- MP में कौन से जिलों के अस्पताल आउटसोर्स होंगे?
पहले चरण में रीवा, देवास और गुना जिलों के 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र शामिल हैं। यह पायलट प्रोजेक्ट पांच साल के लिए लागू है। - निजी एजेंसी को क्या जिम्मेदारी दी जाएगी?
एजेंसी अस्पताल का प्रबंधन, हाउसकीपिंग और सिक्योरिटी संभालेगी। उसे तय मापदंडों पर डॉक्टर और विशेषज्ञ भी उपलब्ध कराने होंगे। - मौजूदा सरकारी स्टाफ का क्या होगा?
स्टाफ को एक बार दूसरे संस्थान में ट्रांसफर का विकल्प मिलेगा। ट्रांसफर न लेने वालों का वेतन सीएमएचओ के जरिए दिया जाएगा।
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