कॉलेज किराए पर और टीचर गायब, क्या हैप्पीनेस सेल से लौटेगी छात्रों की मुस्कान?
भोपाल: मध्य प्रदेश के सरकारी कॉलेजों में अब खुशी की क्लास लगेगी। सरकार हर कैंपस में हैप्पीनेस सेल बनाने जा रही है। इसका मकसद छात्रों का मानसिक तनाव कम करना है। हालांकि, यह योजना शुरू होते ही विवादों में घिर गई है।
कॉलेजों में बुनियादी सुविधाओं का भारी अकाल पड़ा है। छात्र और शिक्षक इस योजना को कागजी बता रहे हैं। जर्जर इमारतों में खुशी ढूंढना अब एक बड़ी चुनौती है। ढूंढ़ना
क्या है हैप्पीनेस सेल का पूरा खाका?
मध्य प्रदेश सरकार के उच्च शिक्षा विभाग का मानना है कि आज के दौर में छात्र पढ़ाई और करियर को लेकर काफी दबाव में रहते हैं। इस तनाव को दूर करने के लिए कॉलेजों में विशेष काउंसलिंग यूनिट बनाई जाएंगी। इन केंद्रों पर छात्रों को योगा, ग्रुप डिस्कशन और पेशेवर परामर्श जैसी सुविधाएं दी जाएंगी।
राज्य आनंद संस्थान के निदेशक प्रवीण गंगराड़े के अनुसार, इस पहल का उद्देश्य एक ऐसी पीढ़ी तैयार करना है जो चुनौतियों के बीच भी मुस्कुराना जानती हो। सरकार इसे इमोशनल मजबूती की दिशा में एक बड़ा कदम मान रही है।
विरोध क्यों हो रहा है?
इस योजना के विरोध का सबसे बड़ा कारण कॉलेजों की दयनीय स्थिति है। आंकड़ों पर नजर डालें तो राज्य के कुल 550 सरकारी कॉलेजों में से 127 कॉलेज आज भी किराए की इमारतों में चल रहे हैं। इनमें से कई कॉलेजों के पास अपनी जमीन तक नहीं है।
छात्रों का सवाल है कि जिस कॉलेज के पास खुद की छत नहीं है, वहां हैप्पीनेस सेल के लिए जगह कहां से आएगी? टूटे-फूटे हॉल और टीन के शेड में पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए खुशी शब्द बेमानी साबित हो रहा है।
एक नजर में मुख्य आंकड़े
| विवरण (Description) | वर्तमान स्थिति (Current Status) |
| कुल सरकारी कॉलेज | 550 |
| किराए की बिल्डिंग में कॉलेज | 127 |
| शिक्षकों के रिक्त पद (Vacancies) | 40% (लगभग) |
| छात्र-शिक्षक अनुपात (Student-Teacher Ratio) | 50:1 |
| UGC का निर्धारित मानक (Standard) | 20:1 |
| बुनियादी सुविधाओं का अभाव | लैब, लाइब्रेरी और बिजली |
शिक्षकों की कमी गंभीर समस्या
सिर्फ इमारतें ही नहीं, बल्कि शिक्षकों की कमी भी एक गंभीर समस्या बनी हुई है। राज्यभर के सरकारी कॉलेजों में शिक्षकों के लगभग 40 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियमों के मुताबिक, 20 छात्रों पर एक शिक्षक होना अनिवार्य है।
लेकिन मध्य प्रदेश के कई कॉलेजों में यह अनुपात 50:1 का है। यानी एक शिक्षक पर 50 छात्रों की जिम्मेदारी है। शिक्षकों का कहना है कि जब स्टाफ ही पूरा नहीं है, तो वे छात्रों को समय कैसे देंगे और उनकी काउंसलिंग कैसे करेंगे?
जमीन पर इन सबका उल्टा
कॉलेज कैंपस से आ रही प्रतिक्रियाएं सरकार को आईना दिखा रही हैं। एक छात्रा, प्रिया शुक्ला का कहना है कि जब कॉलेज में न लाइब्रेरी है और न ही लैब, तो वहां मानसिक स्वास्थ्य (आनंद विभाग) की बात करना केवल दिखावा है।
वहीं, छात्र संगठनों का आरोप है कि सरकार को फैंसी सेल बनाने के बजाय वह बजट क्लासरूम, डेस्क और बिजली जैसी जरूरी चीजों पर खर्च करना चाहिए। शिक्षकों का मानना है कि पढ़ाई का अच्छा माहौल ही छात्रों का तनाव कम करने का सबसे बड़ा जरिया होता है।
सरकार बचाव में क्या कह रही
बढ़ते विरोध के बीच सरकारी अधिकारियों ने अपना पक्ष रखा है। उनका कहना है कि बुनियादी ढांचे में सुधार एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। सरकार स्टेप बाय स्टेप तरीके से कॉलेजों की स्थिति सुधारने पर काम कर रही है।
अधिकारियों का तर्क है कि सुविधाओं के इंतजार में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी नहीं की जा सकती। इसलिए इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ-साथ हैप्पीनेस सेल पर भी काम जारी रहेगा। अब देखना यह होगा कि क्या ये सेल वास्तव में छात्रों के चेहरों पर मुस्कान ला पाएंगे या फिर यह योजना फाइलों तक ही सीमित रह जाएगी।
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