कांग्रेस में पदों की छंटनी का प्लान, 253 से 125 चेहरों तक सिमटेगा संगठन..?
समझें क्या है पूरा मामला
- 53 की टीम अब करीब 125 तक सिमट सकती है
- निष्क्रिय चेहरों की छुट्टी का संकेत
- दोहरी जिम्मेदारी वाले नेताओं पर फैसला
- गुट से ज्यादा काम को महत्व देने की तैयारी
- नई टीम का लक्ष्य सीधे मिशन 2028
मध्यप्रदेश कांग्रेस में अगला बड़ा बदलाव पद बांटने का नहीं, पद घटाने का हो सकता है। पार्टी संगठन को छोटा और ज्यादा जवाबदेह बनाने की तैयारी में है। सूत्रों के मुताबिक मौजूदा करीब 253 पदाधिकारियों वाली प्रदेश कार्यकारिणी को लगभग आधा कर करीब 125 तक लाने पर मंथन चल रहा है। नई टीम में किस नेता का किस गुट से रिश्ता है, इससे ज्यादा उसकी जमीनी सक्रियता और संगठन को समय देने की क्षमता देखे जाने की तैयारी है।
कांग्रेस में अब ‘कितने नेता’ नहीं, ‘कितना काम’
मध्यप्रदेश कांग्रेस की नई कार्यकारिणी को लेकर सबसे बड़ा बदलाव संख्या का नहीं, फॉर्मूले का दिखाई दे रहा है। पार्टी के भीतर चल रही कवायद में संकेत है कि अब प्रदेश संगठन को राजनीतिक संतुलन साधने के लिए लंबा-चौड़ा रखने के बजाय काम करने वाली टीम बनाने पर जोर होगा। यानी पद पाने की राजनीति से ज्यादा पद निभाने की क्षमता कसौटी बन सकती है।
253 से 125 का सफर क्यों?
2023 के विधानसभा चुनाव में हार के बाद कांग्रेस ने संगठन में बदलाव शुरू किया था। जीतू पटवारी को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली और इसके बाद नई कार्यकारिणी में अलग-अलग वरिष्ठ नेताओं के प्रभाव वाले चेहरों को जगह देने की कोशिश हुई।
संगठन में संतुलन साधने की कवायद के बीच सचिव और सह सचिव जैसे पद बढ़ते गए। करीब 150 सदस्यों से शुरू हुई टीम आगे चलकर करीब 253 पदाधिकारियों तक पहुंच गई।
अब पार्टी के भीतर सवाल यही उठ रहा है कि इतनी बड़ी टीम के बावजूद अगर जमीनी गतिविधियों में अपेक्षित तेजी नहीं आई, तो संख्या बढ़ाने का फायदा क्या मिला?
नई टीम में टिकट के दावेदारों की भूमिका बदलेगी?
सूत्रों के अनुसार नई व्यवस्था में ऐसे नेताओं को संगठन में प्राथमिकता देने की कोशिश होगी, जो खुद चुनाव लड़ने की तैयारी के बजाय संगठन को मजबूत करने और चुनाव लड़ाने में समय दे सकें।
इसका असर उन नेताओं पर पड़ सकता है जो वरिष्ठ नेताओं के करीबी माने जाते हैं और खुद आगामी चुनावों में टिकट की तैयारी कर रहे हैं। ऐसे चेहरों को संगठन की जिम्मेदारी देने के बजाय चुनावी मैदान में उतारने की रणनीति भी अपनाई जा सकती है।
दोहरी जिम्मेदारी पर भी चलेगी कैंची
नई टीम में प्रदेश पदाधिकारी और जिला अध्यक्ष जैसी दोहरी भूमिकाओं को लेकर भी बदलाव की संभावना है। कांग्रेस के भीतर माना जा रहा है कि एक नेता को कई जिम्मेदारियां देने से दोनों स्तरों का संगठन प्रभावित हो सकता है। इसलिए नई व्यवस्था में जिम्मेदारी बांटने पर जोर दिया जा सकता है।
मकसद साफ है कि प्रदेश का काम प्रदेश स्तर का नेता संभाले और जिले की कमान पूरी तरह जिला संगठन को मिले।
दिल्ली की समीक्षा के बाद फॉर्मूला बदला
कांग्रेस के राष्ट्रीय संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल की मध्यप्रदेश संगठन को लेकर समीक्षा के बाद नई संरचना पर काम तेज होने की बात सामने आ रही है। विभागों और प्रकोष्ठों के पुनर्गठन के साथ प्रदेश कार्यकारिणी को भी नए सिरे से तैयार करने की तैयारी है।
इस बार संकेत यह है कि बड़ा नाम या किसी खेमे की सिफारिश अकेला आधार नहीं होगी। सक्रियता और संगठन को समय देने की क्षमता को ज्यादा महत्व मिल सकता है।
मिशन 2028 की पहली बड़ी संगठनात्मक परीक्षा
नई कार्यकारिणी को सिर्फ फेरबदल मानना कांग्रेस के लिए तस्वीर को छोटा करके देखना होगा। यही टीम 2028 के विधानसभा चुनाव और उसके बाद 2029 के लोकसभा चुनाव की तैयारियों में अहम भूमिका निभाएगी। युवा चेहरों को जगह देने के साथ अनुभवी नेताओं को जिम्मेदारी देने का संतुलन भी चुनौती होगा।
प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के अनुसार नई टीम में युवा ऊर्जा और अनुभव का मिश्रण होगा और सभी को ‘टीम कांग्रेस’ के रूप में मिशन 2028 पर काम करना होगा।
सबसे बड़ा टेस्ट: गुट बनाम ग्राउंड
नई कार्यकारिणी अगर करीब 253 से घटकर 125 के आसपास आती है, तो लगभग आधे पदों पर कैंची चल सकती है। यहीं से कांग्रेस के भीतर असली परीक्षा शुरू होगी। किसे जगह मिलती है, किसे बाहर किया जाता है और किन चेहरों को सिर्फ पद नहीं बल्कि काम की जिम्मेदारी दी जाती है, यह नई टीम की दिशा तय करेगा।
यानी मध्यप्रदेश कांग्रेस में इस बार फेरबदल का सवाल सिर्फ नई सूची का नहीं है। यह तय करेगा कि 2028 की लड़ाई कांग्रेस पुराने गुटीय समीकरणों से लड़ेगी या कम चेहरों वाली ज्यादा जवाबदेह ‘टीम कांग्रेस’ के साथ।
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