MPमें नियमितीकरण की लड़ाई, कभी जेल भरो आंदोलन, कभी लाठीचार्ज, फिर भी क्यों नहीं निकला समाधान?

Atul Dwivedi | Nov 05, 2026, 18:54 IST
संविदा कर्मचारी, अतिथि शिक्षक, स्वास्थ्यकर्मी और सफाईकर्मी नियमितीकरण की मांग को लेकर समय-समय पर आंदोलन करते रहे हैं।
Contractual employees, guest teachers, healthcare workers, and sanitation workers have, from time to time, engaged in protests demanding regularization.
मध्यप्रदेश में सरकारें बदलीं, मुख्यमंत्री बदले, कर्मचारियों को आश्वासन मिले और नीतियों में बदलाव के ऐलान भी हुए। लेकिन एक मांग ऐसी है, जो पिछले कई दशकों से खत्म होने का नाम नहीं ले रही। यह मांग है नियमितीकरण की। कभी संविदा कर्मचारी इसके लिए सड़कों पर उतरते हैं, कभी अतिथि शिक्षक प्रदर्शन करते हैं, तो कभी स्वास्थ्यकर्मी और बिजली कर्मचारी आंदोलन का रास्ता अपनाते हैं।

अब इस लिस्ट में सफाईकर्मियों का आंदोलन भी जुड़ गया है। सवाल यह है कि आखिर मध्यप्रदेश में नियमितीकरण ऐसा मुद्दा क्यों बन गया है, जिसके लिए हजारों कर्मचारी बार-बार सड़कों पर उतरते हैं? क्या इसकी वजह यह है कि सरकारों ने आश्वासन तो दिए, लेकिन स्थायी समाधान नहीं निकाला? या फिर संविदा और आउटसोर्स व्यवस्था ही ऐसी है, जिसमें कुछ सालों बाद नियमितीकरण की मांग उठना लगभग तय हो जाता है?



द सूत्र ने इसी सवाल की पड़ताल की। हमने बीते करीब 10 सालों के उन बड़े कर्मचारी आंदोलनों को खंगाला, जिनमें नियमितीकरण प्रमुख मांगों में शामिल रहा। इस पड़ताल में एक दिलचस्प तस्वीर सामने आई। कर्मचारी संगठन बदलते रहे, आंदोलन के तरीके बदलते रहे, लेकिन मांग लगभग हर बार एक जैसी रही-स्थायी नौकरी, समान काम का समान वेतन और सामाजिक सुरक्षा।



1. संविदा कर्मचारियों का करो या मरो आंदोलन

मध्यप्रदेश में नियमितीकरण को लेकर हुए बड़े शक्ति प्रदर्शनों में संविदा कर्मचारियों का करो या मरो आंदोलन भी शामिल रहा है। प्रदेश के स्वास्थ्य, शिक्षा और दूसरे विभागों में काम करने वाले 30 हजार से ज्यादा संविदा कर्मचारियों के भोपाल पहुंचने का दावा किया गया था। राजधानी का नीलम पार्क आंदोलन का बड़ा केंद्र बना था। कर्मचारियों ने जेल भरो आंदोलन किया और तिरंगा यात्रा भी निकाली थी। हालांकि संविदा कर्मचारियों का यह संघर्ष 2018 से ही तेज होने लगा था, लेकिन 2022 और 2023 के दौरान आंदोलन ने व्यापक रूप ले लिया था। कर्मचारियों का आरोप था कि सालों से सरकारी विभागों में काम करने के बावजूद उन्हें नियमित कर्मचारियों जैसी सुविधाएं नहीं मिल रही थीं। वेतन में अंतर था और नौकरी की सुरक्षा भी नहीं थी।



लगातार आंदोलनों के बीच सरकार को संविदा कर्मचारियों की सेवा शर्तों और सुविधाओं को लेकर नीतिगत घोषणाएं करनी पड़ी थीं। तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के समय 2023 में संविदा कर्मचारियों के लिए कई सुविधाओं का ऐलान हुआ था। बाद में मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी संविदा कर्मचारियों को नियमित कर्मचारियों के समान लाभ देने की बात कही था।



2. बिजली विभाग: 2026 में भी नियमितीकरण का इंतजार

मध्यप्रदेश का बिजली विभाग उन विभागों में शामिल है, जहां बड़ी संख्या में संविदा और आउटसोर्स कर्मचारी काम करते हैं। बिजली कर्मचारी लंबे वक्त से समान काम के बदले समान वेतन और नियमितीकरण की मांग उठाते रहे हैं। 2019 में कर्मचारियों ने अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन किया था। इसके बाद 2021 और 2023 में भी आंदोलन हुए था। अक्टूबर 2026 में करीब 4500 संविदा बिजलीकर्मियों के नियमितीकरण को लेकर एक बार फिर चर्चा हुई थी। लेकिन कर्मचारियों के मुताबिक, संबंधित परीक्षा की अधिसूचना जारी नहीं हुई और प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी है।



3. NHM कर्मचारियों का आंदोलन

कोरोना महामारी के दौरान स्वास्थ्य व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालने वाले भी आंदोलन में उतरे थे। संविदा स्वास्थ्यकर्मियों ने नियमितीकरण की मांग को लेकर कई बार आंदोलन किया था। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन यानी NHM के कर्मचारियों ने समान वेतन, नौकरी की सुरक्षा और नियमितीकरण को लेकर लगातार विरोध प्रदर्शन किए थे। 24 दिसंबर 2022 को स्वास्थ्य मंत्री का घेराव और चक्काजाम की कोशिश का मामला सामने आया था। इस दौरान पुलिस ने 23 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मामला दर्ज किया था। इसके कुछ महीने बाद 29 मई 2023 को संविदा स्वास्थ्यकर्मी फिर भोपाल की सड़कों पर उतरे थे। कर्मचारी मुख्यमंत्री आवास की ओर बढ़ना चाहते थे, लेकिन पुलिस ने उन्हें रास्ते में रोक दिया था।



8 जून 2026 को भी मुख्यमंत्री आवास के घेराव की तैयारी की गई थी। आंदोलन में लगभग 32 हजार कर्मचारियों के जुटने का दावा किया गया था। इन प्रदर्शनों में नियमितीकरण और समान काम के बदले समान वेतन की मांग प्रमुख रही।



4. अतिथि शिक्षकों का महाआंदोलन

मध्यप्रदेश में नियमितीकरण को लेकर अतिथि शिक्षकों का आंदोलन भी काफी चर्चा में रहा है।



स्कूलों में बरसों से पढ़ा रहे अतिथि शिक्षक नियमितीकरण और रोजगार की सुरक्षा की मांग को लेकर भोपाल पहुंचे थे। 2 अक्टूबर 2024 को गांधी जयंती के दिन बड़ी संख्या में अतिथि शिक्षक भोपाल के अंबेडकर पार्क में जमा हुए थे। उनकी योजना मुख्यमंत्री आवास की ओर बढ़ने की थी। इसी दौरान रात में पुलिस कार्रवाई को लेकर विवाद खड़ा हो गया था। आंदोलनकारी शिक्षकों ने आरोप लगाया कि स्ट्रीट लाइट बंद करके उन्हें खदेड़ा गया और पुलिस ने लाठीचार्ज किया था। हालांकि पुलिस अधिकारियों ने लाठीचार्ज के आरोपों से इनकार किया था। बाद में कुछ प्रदर्शनकारी शिक्षकों के खिलाफ प्रकरण दर्ज होने की बात भी सामने आई थी।



अब यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि नियमित कर्मचारियों के बजाय दैनिक वेतनभोगी, संविदा और आउटसोर्स कर्मचारियों से काम लेने की व्यवस्था इतनी व्यापक कैसे हुई? यदि शुरू से ही साफ और स्पष्ट नियम बनाए जाते, नेता राजनीतिक फायदे के लिए वादे न करते तो क्या ऐसी नौबत आती?

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