भ्रष्टाचार की जांच में सुस्त लोकायुक्त और EOW, खात्मा रिपोर्ट पेश करने में दिखाई फुर्ती

Sanjay Sharma | Jun 04, 2026, 15:30 IST
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MP में लोकायुक्त और EOW की खात्मा रिपोर्ट पर कोर्ट ने नाराजगी जताई गई है। छात्रवृत्ति बांटने में गड़बड़ी की वजह से जनजातीय और पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग के 35 केस और 24 से ज्यादा अन्य मामलों में क्लीन चिट देने की कोशिश की गई।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • लोकायुक्त-EOW की तीन दर्जन से ज्यादा खात्मा रिपोर्ट खारिज की गई।
  • दस्तावेज और तथ्यों के बावजूद एजेंसियों से जांच में अनदेखी हुई।
  • ज्यादातर केस में जांच सालों तक चलती है।
  • छात्रवृत्ति में गड़बड़ी के 35 केस में खात्मा लगाने में एक सी दलील सामने आई है।
  • जिनमें खात्मा लगाने की तैयारी थी अब उनमें फिर से जांच होगी।

MP में भ्रष्टाचार पर नकेल कसने वाली एजेंसियां खुद केस बंद करने में दिलचस्पी दिखा रही हैं। लोकायुक्त और EOW ने पिछले 12 महीने में 35 से ज्यादा मामलों में खात्मा रिपोर्ट कोर्ट में पेश कर दी।



हालांकि जांच एजेंसियों की एक जैसी दलीलों को देखते हुए कोर्ट ने इन सभी मामलों में फिर जांच के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने शिकायत को बंद करने के आधार को पर्याप्त नहीं माना है। ऐसे में दोनों जांच एजेंसियों की निष्पक्षता पर सवाल उठे हैं।



इन केसों को भी बंद करने की थी जल्दी

1. भोपाल नगर निगम के अपर आयुक्त कमलेंद्र सिंह परिहार को 83 हजार 500 रुपए लेने के मामले में पकड़ा गया था। केस दर्ज करने के बाद लोकायुक्त द्वारा जल्दबाजी में जांच निपटाई गई।



सबूतों की कमी बताकर क्लोजर पेश करने पर कोर्ट ने जमकर फटकार लगाई। क्योंकि अपर आयुक्त द्वारा रिश्वत मांगने के ऑडियो को नजरअंदाज किया गया था। इस केस में दोबारा जांच के निर्देश दिए गए हैं।



2. सागर के एक SDM पर पत्नी-बेटे के नाम आठ करोड़ की जमीन खरीदने के आरोप लगे थे। इसकी शिकायत की जांच के बाद लोकायुक्त ने संपत्ति की खरीदी को सही मान लिया।



खात्मा रिपोर्ट में संपत्ति खरीदना आय से मेल खाने की पुष्टि कर दी गई। इस पर कोर्ट ने एक लाख वेतन पाने वाली अधिकारी द्वारा आठ करोड़ की जमीन खरीदने का दावा खारिज कर दिया।



3. भोपाल में PWD के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर पर एक ही ठेकेदार को 12 करोड़ के 4 टेंडर देने की शिकायत की गई थी। इसमें EE की भूमिका पर सवाल खड़े किए गए थे।



EOW ने जांच के आधार पर इन टेंडरों को नियम के अनुरूप बताया। वहीं कोर्ट में खात्मा रिपोर्ट को एक दिन में खोले गए टेंडर में रेट और दूसरी समानताओं पर हैरानी जताई। साथ ही दोबारा जांच के निर्देश दिए हैं।



4. सीहोर के पंचायत सचिव पर फर्जी जॉब कार्ड, फर्जी मस्टर रोल से लाखों की हेराफेरी की शिकायत थी। इस पर पर EOW ने जांच की।



जांच में हेराफेरी को क्लेरिकल मिस्टेक बताकर केस बंद करने की सिफारिश की गई। कोर्ट ने पूछा 80 लाख की मिस्टेक कैसे हो सकती है। इस पर अधिकारी तर्क ही नहीं दे पाए।



5. रीवा में दो करोड़ रुपए की एक्सपायरी दवा खरीदी के मामले में शिकायत पर लोकायुक्त की जांच खानापूर्ति तक सिमट कर रह गई। खात्मा रिपोर्ट में इसे टेक्निकल एरर बताया। जिस पर। कोर्ट ने बिल देखते हुए इसे सामान्य गलती माने से इंकार कर दिया।



सबूत की आंख-मिचौली

जिन मामलों में कोर्ट ने खात्मा रिपोर्ट पेश की उनकी जांच में भारी खामियां मिली हैं। दिलचस्प बात यह है कि सबूत होने पर भी वे एजेंसी को दिखे नहीं।



  • अधिकारियों द्वारा जमीन की रजिस्ट्री रिश्तेदारों के नाम करना
  • इंजीनियर के साइन से हुए टेंडर
  • तहसीलदार के बैंक लॉकर से मिले सबूत
  • सचिव के फर्जी जॉब कार्ड
  • CMHO द्वारा पास किए गए एक्सपायरी दवा के बिल भी जांच में नजर अंदाज किए गए।

क्लीन चिट का ठेका

बीते महीनों में जिस तरह भ्रष्टाचार निवारण एक्ट के मामलों में जांच एजेंसियों ने खात्मा रिपोर्ट पेश की हैं। उनसे बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं। पुराने केसों की भरमार की घटाने के लिए अधिकारी तथ्यों और साक्ष्यों की अनदेखी करने से भी परहेज नहीं कर रहे हैं।



एक मामले के शिकायतकर्ता सौरभ गुप्ता का कहना है, ऐसा लग रहा है कि एजेंसियों को जिम्मेदारों को सजा दिलाने से ज्यादा चिंता केस बंद करने की है।



सिर्फ क्लोजर रिपोर्ट पेश करने में फुर्ती

लोकायुक्त और EOW के अधिकारियों को ट्रैप या छापा मारने के लिए लंबी तैयार करनी पड़ती है। चार्जशीट तैयार करने महीनों लग जाते हैं।



जबकि क्लोजर रिपोर्ट पेश करने में जल्दबाजी दिखाई जा रही है। इससे भ्रष्टाचार के सहारे बेहिसाब संपत्ति जमा करने वाले सजा से बच रहे हैं।



हर केस की जांच कटघरे में

लोकायुक्त और EOW ने जो थोक में खात्मा रिपोर्ट दी थी, उसे कोर्ट ने रद्द कर दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ शिकायत में सबूत ना होने पर केस बंद नहीं किया जा सकता।



अब शिकायतकर्ता भी ये पूछ रहे हैं कि जांच कितनी ईमानदारी से हो रही है। इससे साफ हो रहा है कि राज्य की दोनों जांच एजेंसियों को अपना तरीका सुधारना होगा।



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