रिटायरमेंट से पहले विवादों में डीजीपी कैलाश मकवाना, शासन की मंजूरी पर सवाल, हार्टफुलनेस एमओयू बना गले की फांस!

Ramanand Tiwari | Sootr Creatives | Nov 07, 2026, 11:11 IST
मध्यप्रदेश पुलिस मुख्यालय और हार्टफुलनेस एमओयू पर बढ़ा विवाद, बिना सरकारी मंजूरी ध्यान प्रशिक्षण समझौते को लेकर डीजीपी के अधिकार क्षेत्र पर उठे सवाल।
Controversy Erupts Over MP Police HQ Heartfulness MoU Without Government Approval Raising Questions on DGP Administrative Powers
मध्यप्रदेश के डीजीपी कैलाश मकवाना ने फरवरी 2025 में हार्टफुलनेस संस्था के साथ अलग से एमओयू किया था। सूत्रों का दावा है कि इस समझौते पर हस्ताक्षर करने से पहले शासन की मंजूरी नहीं ली गई थी। आईजी रुचिवर्धन मिश्रा के हैदराबाद में प्रशिक्षण के लिए आवेदन करने पर यह मामला गृह विभाग के सामने आया।

इसके बाद आनंद विभाग की पहले से चल रही प्रशिक्षण व्यवस्था की जानकारी सामने आई। इससे समझौते को मंजूरी देने और इसे करने के अधिकार को लेकर सवाल उठने लगे।



बता दें कि हार्टफुलनेस एक ऐसी संस्था है, जो लोगों को ध्यान लगाना सिखाती है। इसका मुख्य काम लोगों का तनाव कम करना, मन को शांत रखना और मानसिक संतुलन बेहतर बनाना है। यही काम मध्यप्रदेश का आनंद विभाग भी कराता है।



आवेदन ने खोली पुराने एमओयू की फाइल

आईजी रुचिवर्धन मिश्रा ने हैदराबाद के हार्टफुलनेस केंद्र में प्रशिक्षण लेने के लिए शासन से अनुमति मांगी थी। जब इस आधिकारिक दौरे का प्रस्ताव शासन के पास पहुंचा, तो गृह विभाग ने इसकी वजह जानने के लिए जांच की।



सूत्रों के मुताबिक, इसी जांच के दौरान पुलिस मुख्यालय और हार्टफुलनेस संस्था के बीच हुआ एमओयू सामने आया। इसके बाद सवाल उठने लगे कि क्या समझौता करने से पहले शासन की मंजूरी ली गई थी और क्या डीजीपी को इस पर हस्ताक्षर करने का अधिकार था।



अब प्रशासनिक स्तर पर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या समझौते के लिए तय प्रक्रिया का पालन किया गया था। बताया जा रहा है कि संबंधित फाइल में शासन की पहले से मिली मंजूरी का कोई स्पष्ट दस्तावेज नहीं मिला है।



आनंद विभाग की व्यवस्था पहले से, फिर डीजीपी ने अलग एमओयू किया

सूत्रों के मुताबिक गृह विभाग ने आनंद विभाग से प्रशिक्षण व्यवस्था के बारे में जानकारी मांगी थी। इसके जवाब में आनंद विभाग ने अपने यहां चल रहे कार्यक्रमों और अलग-अलग संस्थाओं के साथ प्रशिक्षण की व्यवस्था के बारे में बताया। इन संस्थाओं में हैदराबाद की हार्टफुलनेस, कोयंबटूर की ईशा और आर्ट ऑफ लिविंग शामिल थीं। विभाग ने अपने जवाब में बताया कि इस तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रमों के लिए नए समझौते करने की जरूरत नहीं है।



इस जानकारी के सामने आने के बाद पुलिस मुख्यालय के अलग से एमओयू करने पर सवाल उठने लगे। साथ ही यह भी चर्चा शुरू हुई कि जब आनंद विभाग में पहले से प्रशिक्षण की व्यवस्था थी, तो पुलिस मुख्यालय को अलग समझौता करने की जरूरत क्यों पड़ी।



सूत्रों के अनुसार, पहले से विभागीय व्यवस्था होने के बावजूद पुलिस मुख्यालय ने अपना अलग समझौता किया। अब इसकी जांच होगी कि इस तरह का अलग समझौता करने के लिए शासन की मंजूरी लेना जरूरी था या नहीं।



आनंद विभाग के जवाब ने बढ़ाई परेशानी

आनंद विभाग ने साफ तौर पर कह दिया कि जब विभाग पहले से प्रशिक्षण और ध्यान शिविर करा रहा है, तो फिर अलग एमओयू की क्या आवश्यकता थी। आनंद विभाग की व्यवस्था पहले से उपलब्ध होने के बावजूद पुलिस मुख्यालय ने हार्टफुलनेस संस्था के साथ स्वतंत्र समझौता कर लिया।



हालांकि डीजीपी कैलाश मकवाना की मंशा अच्छी थी। उन्होंने पुलिस कर्मचारियों का स्ट्रेस कम करने और मानसिक संतुलन बेहतर बनाने के लिए ध्यान प्रशिक्षण की पहल की थी। इसमें किसी आर्थिक घोटाले की बात सामने नहीं रखी गई है, लेकिन शासन की अनुमति और अधिकारों के इस्तेमाल पर सवाल जरूर खड़े हो रहे हैं।



शासन स्तर पर सबके अधिकार अलग-अलग हैं। पुलिस मुख्यालय में पदस्थ अधिकारियों के अधिकार भी अलग हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या डीजीपी कैलाश मकवाना ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर हार्टफुलनेस संस्थान के साथ एमओयू पर हस्ताक्षर कर दिए।



यदि शासन की अनुमति अनिवार्य थी और उसके बिना समझौता हुआ, तो यह अधिकारों के दुरुपयोग का मामला बन सकता है। हालांकि इसका अंतिम निष्कर्ष संबंधित शासन नियमों और मूल दस्तावेजों के परीक्षण से ही निकलेगा।



मूल सवाल यही है कि जब आनंद विभाग पहले से प्रशिक्षण और ध्यान शिविर की व्यवस्था कर रहा था, तो पुलिस मुख्यालय को अलग एमओयू करने की आवश्यकता क्यों पड़ी?



फरवरी 2025 में हुए समझौते पर अब नियमों का सवाल

पुलिस मुख्यालय के मुताबिक दो फरवरी 2025 को हार्टफुलनेस संस्था के साथ यह समझौता हुआ था। डीजीपी कैलाश मकवाना और कमलेश डी पटेल ने उस समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए थे।



पांच फरवरी की विभागीय जानकारी में पुलिसकर्मियों और परिवारों को निशुल्क ध्यान प्रशिक्षण देने की बात थी। इस कार्यक्रम का उद्देश्य तनाव प्रबंधन, मानसिक संतुलन और पुलिस कर्मचारियों की कार्यक्षमता सुधारना बताया गया। वहीं निशुल्क प्रशिक्षण का उद्देश्य अपने आप शासन की पूर्व अनुमति की जरूरत समाप्त नहीं करता।



डीजीपी के अधिकार क्षेत्र से बाहर था एमओयू?

प्रशासनिक जानकारों के मुताबिक, विभागीय समझौते की वैधता अधिकार प्रत्यायोजन और स्वीकृति प्रक्रिया पर निर्भर है। ऐसे में देखना जरूरी होगा कि डीजीपी को स्वतंत्र रूप से एमओयू करने का अधिकार था।



शासन की स्वीकृति अनिवार्य होने पर बिना अनुमति हुआ समझौता प्रशासनिक परीक्षण का विषय बन सकता है। इस मामले में लागू नियम, हस्ताक्षरित दस्तावेज और सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी निर्णायक रिकॉर्ड होंगे।



पूर्व अनुमति के दस्तावेज सामने नहीं आने से नियम-विरुद्ध समझौता किए जाने के आरोप गंभीर हुए हैं। हालांकि अधिकारों के उल्लंघन का अंतिम निष्कर्ष संबंधित शासन नियमों और मूल रिकॉर्ड से ही निकलेगा।



एक हजार से ज्यादा थानों तक पहुंच चुका ध्यान कार्यक्रम

बता दें कि दिसंबर 2025 में एक हजार से अधिक थानों में साप्ताहिक ध्यान सत्र शुरू हुए थे। विश्व ध्यान दिवस पर लगभग 2 हजार 800 केंद्रों से 50 हजार से अधिक पुलिसकर्मी ऑनलाइन जुड़े थे।



इतने बड़े विस्तार के बाद एमओयू से संबंधित आदेश और विभागीय जवाबदेही की अहमियत बढ़ती है। कार्यक्रम के संचालन, नोडल अधिकारियों की नियुक्ति और प्रशिक्षण संबंधी दस्तावेज भी समीक्षा में महत्वपूर्ण होंगे।



आईजी रुचिवर्धन मिश्रा ने बताया, प्रशिक्षण पूरी तरह निशुल्क

आईजी रुचिवर्धन मिश्रा ने बताया था कि हार्टफुलनेस के ध्यान शिविर पुलिसकर्मियों के लिए निशुल्क हैं। उनके अनुसार, डीजीपी के निर्देश पर कर्मचारियों में तनाव घटाने के लिए ये कार्यक्रम चलाए गए।



इस उद्देश्य से आयोजित शिविरों में मानसिक संतुलन और कार्यक्षमता सुधारने पर जोर दिया जाता है।



निशुल्क प्रशिक्षण के बावजूद सरकारी यात्रा खर्च का हिसाब जरूरी

प्रशिक्षण निशुल्क होने से सरकारी यात्राओं में होने वाले खर्च का सवाल स्वतः समाप्त नहीं होता। बाहर गए अधिकारियों की संख्या, यात्रा अनुमति और TA-DA भुगतान के रिकॉर्ड से स्थिति स्पष्ट होगी।



सरकारी मद से भुगतान हुआ हो तो उसकी स्वीकृति और राशि का विवरण देखना जरूरी होगा। मूल रिकॉर्ड से यह भी स्पष्ट होगा कि प्रशिक्षण यात्राओं के लिए किस स्तर से अनुमति मिली।



डीजीपी मकवाना ने नहीं दिया जवाब

इस मामले में डीजीपी कैलाश मकवाना से बात करने की कोशिश की गई। उन्होंने कहा कि अभी व्यस्त हूं, आप अपने सवाल व्हाट्सऐप पर भेज दीजिए। इसके बाद उन्हें हार्टफुलनेस संस्था के साथ किए गए एमओयू और शासन की अनुमति को लेकर सवाल भेजे गए।



डीजीपी मकवाना ने व्हाट्सऐप पर सवाल पढ़ लिए, लेकिन उनका कोई जवाब नहीं दिया। इसके बाद उन्हें दोबारा मैसेज भेजकर कहा गया कि आपके खिलाफ आरोप लग रहे हैं कि आपने शासन से अनुमति लिए बिना और अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर हार्टफुलनेस संस्था के साथ समझौता किया है। इस पर आप अपना पक्ष रखिए, ताकि उसे भी खबर में शामिल किया जा सके।



दो बार मैसेज भेजने के बाद भी डीजीपी मकवाना ने कोई जवाब नहीं दिया। खबर लिखे जाने तक उनकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। ऐसे में यह साफ नहीं हो पाया कि उन्होंने किस आधार पर यह समझौता किया था और क्या इसके लिए शासन से अनुमति ली गई थी। हालांकि उनके जवाब नहीं देने का मतलब यह नहीं है कि उन पर लगे आरोप सही हैं। इस मामले में उनका पक्ष आना अभी बाकी है।



अपर मुख्य सचिव संजय कुमार शुक्ल क्या बोले?

इस मामले में गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय कुमार शुक्ल से भी बात की गई। उन्होंने बताया कि आनंद विभाग से इस बारे में जानकारी मांगी गई थी। आनंद विभाग ने अपने जवाब में कहा है कि ध्यान और प्रशिक्षण के लिए पहले से ही व्यवस्था मौजूद है। ऐसे में अलग-अलग संस्थाओं के साथ नए एमओयू करने की जरूरत नहीं है।



डीजीपी कैलाश मकवाना ने हार्टफुलनेस संस्था के साथ जो एमओयू किया है, उसे लेकर संजय कुमार शुक्ल ने कहा कि पहले इस समझौते का परीक्षण कराया जाएगा। इसके बाद ही वे इस पर कुछ कह पाएंगे।



अब देखना होगा कि डीजीपी को अपने स्तर पर ऐसा समझौता करने का अधिकार था या इसके लिए पहले शासन से अनुमति लेना जरूरी था। यह बात समझौते से जुड़े दस्तावेजों और नियमों की जांच के बाद ही साफ हो सकेगी।



डीजीपी मकवाना के तीन पुराने निर्णय भी सवालों में

डीजीपी कैलाश मकवाना के कार्यकाल में इससे पहले भी कई ऐसे मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें पुलिस मुख्यालय के फैसलों और शासन के अधिकारों को लेकर सवाल उठे। कुछ मामलों में आदेश वापस लेने पड़े, तो कुछ में बाद में अनुमति लेने की स्थिति बनी।



1. आईपीएस की पोस्टिंग का आदेश वापस लेना पड़ा

पुलिस मुख्यालय से आईपीएस अधिकारी की पदस्थापना और तबादले संबंधी फैसलों को लेकर पहले भी विवाद सामने आए। एक मामले में पीएचक्यू की ओर से आईपीएस अधिकारियों की पोस्टिंग का आदेश जारी हुआ, जिसे बाद में वापस लेना पड़ा।



आईपीएस अधिकारियों की पदस्थापना का अधिकार शासन के गृह विभाग के पास है। इसके बावजूद पुलिस मुख्यालय से आदेश जारी होने के कारण अधिकार क्षेत्र पर सवाल खड़े हुए। नौ प्रशिक्षु आईपीएस अधिकारियों की जिला प्रशिक्षण पदस्थापना से जुड़े आदेश निरस्त होने का मामला भी सामने आया था।



2. सॉफ्टवेयर खरीदी, बाद में कार्योत्तर अनुमति मांगने की नौबत

दूसरा मामला पुलिस मुख्यालय की सॉफ्टवेयर खरीदी से जुड़ा है। साइबर पुलिस के लिए सॉफ्टवेयर खरीदने के मामले में भी शासन की पूर्व अनुमति और वित्तीय अधिकारों पर सवाल उठे थे।



बताया गया कि सॉफ्टवेयर खरीदने के बाद पुलिस मुख्यालय द्वारा कार्योत्तर अनुमति मांगी गई। यह मामला भी मंजूरी की प्रक्रिया और अधिकारियों के अधिकारों को लेकर चर्चा में रहा। खरीदी की स्वीकृति और भुगतान संबंधी स्थिति की अंतिम पुष्टि विभागीय रिकॉर्ड से होगी।



3. रिटायरमेंट की तारीख आगे बढ़ाने का प्रस्ताव भी सरकार ने नहीं माना

तीसरा मामला डीजीपी कैलाश मकवाना के रिटायरमेंट से जुड़ा है। पुलिस मुख्यालय की ओर से उनके कार्यकाल की गणना के आधार पर सेवानिवृत्ति की तारीख आगे करने के लिए गृह विभाग को पत्र भेजा गया।



पुलिस मुख्यालय ने दो दिसंबर 2024 को पदभार ग्रहण करने का आधार रखा था। इस आधार पर सेवानिवृत्ति दो दिसंबर 2026 को मानने का प्रस्ताव सामने आया।



वहीं शासन ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और 30 नवंबर 2026 की सेवानिवृत्ति तारीख तय कर दी। इस तरह कार्यकाल आगे करने का प्रस्ताव भी सरकार के स्तर पर मंजूर नहीं हुआ।



तीनों मामलों में मुख्य सवाल एक ही है कि पुलिस मुख्यालय के अधिकारियों के अधिकार कहां तक हैं? किन फैसलों के लिए शासन की पूर्व अनुमति जरूरी है। अब हार्टफुलनेस एमओयू ने इसी प्रशासनिक सवाल को एक बार फिर सामने ला दिया है।



डीजीपी मकवाना के एमओयू पर बढ़ी प्रशासनिक पड़ताल

गृह विभाग के मुताबिक, कैलाश मकवाना 30 नवंबर 2026 को डीजीपी पद से सेवानिवृत्त होंगे। ऐसे में सेवानिवृत्ति से पहले एमओयू की मंजूरी और प्रशिक्षण यात्राओं का रिकॉर्ड महत्वपूर्ण बन गया।



आईजी के प्रशिक्षण आवेदन से सामने आया यह मामला अब शासन की स्वीकृति प्रक्रिया तक पहुंचा है। अंतिम स्थिति हस्ताक्षरित समझौते, पूर्व अनुमति और संबंधित शासन नियमों की जांच से स्पष्ट होगी।



Sootr Knowledge

हार्टफुलनेस एक ऐसी संस्था है, जो लोगों को ध्यान लगाना सिखाती है। इसका मुख्य काम लोगों का तनाव कम करना, मन को शांत रखना और मानसिक संतुलन बेहतर बनाना है। इसका बड़ा ध्यान केंद्र हैदराबाद के पास कान्हा शांतिवनम में है। संस्था से कमलेश डी. पटेल जुड़े हैं, जिन्हें दाजी के नाम से भी जाना जाता है।



इस संस्था में सरकारी अधिकारी, पुलिसकर्मी, कर्मचारी, शिक्षक, विद्यार्थी और आम लोग ध्यान सीखने जाते हैं। वहां उन्हें बताया जाता है कि काम के दबाव में खुद को शांत कैसे रखें, गुस्से और चिंता पर कैसे काबू पाएं और अपना ध्यान काम पर कैसे लगाएं।



मध्यप्रदेश पुलिस के मामले में भी यही प्रशिक्षण दिया जा रहा था। पुलिसकर्मियों की ड्यूटी काफी तनाव भरी होती है। कई बार उन्हें लगातार काम करना पड़ता है और मुश्किल परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। इसी तनाव को कम करने के लिए डीजीपी कैलाश मकवाना ने हार्टफुलनेस संस्था के साथ समझौता किया था। इसके तहत पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों को मुफ्त में ध्यान सिखाने की व्यवस्था की गई थी।



यहां एक बात समझना जरूरी है कि हार्टफुलनेस पुलिसकर्मियों को अपराध की जांच करना, हथियार चलाना या कानून-व्यवस्था संभालना नहीं सिखाती। इसका प्रशिक्षण मुख्य रूप से ध्यान लगाने और मानसिक तनाव कम करने से जुड़ा है।

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