ज्ञान के मंदिर से लेकर अदालत की दहलीज तक, जानें धार के भोजशाला का इतिहास

Kaushiki | May 15, 2026, 14:58 IST
1 / 8
पत्थरों पर उकेरा गया प्राचीन गौरव
Dhar Bhojshala History
Image credit : Kaushiki
भोजशाला की दीवारों और खंभों पर आज भी संस्कृत और प्राकृत के शिलालेख मौजूद हैं। इनमें व्याकरण के सूत्र और कई नाटकों के अंश पत्थरों पर बड़ी खूबसूरती से लिखे गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ये शिलालेख (इंस्क्रिप्शन) यहां एक भव्य मंदिर होने का पक्का सबूत देते हैं। खंभों पर देवी-देवताओं की आकृतियां और पुराने प्रतीक आज भी देखे जा सकते हैं
2 / 8
वाग्देवी की मूर्ति और लंदन का सफर
Dhar Bhojshala History
Image credit : Kaushiki
इतिहासकारों के मुताबिक, भोजशाला के परिसर में मां सरस्वती की एक बहुत ही सुंदर और प्राचीन प्रतिमा स्थापित थी। खुदाई के दौरान मिली इस वाग्देवी की मूर्ति को साल 1880 में अंग्रेज लंदन ले गए। आज भी ये ऐतिहासिक प्रतिमा लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम की शोभा बढ़ा रही है। हिंदू पक्ष हमेशा से इस मूर्ति को वापस भारत लाने की मांग करता रहा है।
3 / 8
राजा भोज ने की थी स्थापना
Dhar Bhojshala History
Image credit : Kaushiki
परमार वंश के प्रतापी राजा भोज ने 1034 ईस्वी में धार में इसकी स्थापना की। उन्होंने इसे 'सरस्वती सदन' के नाम से एक बड़े आवासीय विश्वविद्यालय के रूप में बनाया। यह नालंदा और तक्षशिला की तरह ही पूरे विश्व में शिक्षा के लिए प्रसिद्ध था। यहां छात्र व्याकरण, वास्तु और चिकित्सा जैसे विषयों का गहरा ज्ञान प्राप्त करते थे।
4 / 8
हालिया एएसआई सर्वे और और नए खुलासे
Dhar Bhojshala History
Image credit : Kaushiki
इंदौर हाई कोर्ट के आदेश पर साल 2024 में भोजशाला का वैज्ञानिक सर्वे किया गया। इस सर्वे के दौरान यहां खुदाई में 94 से अधिक प्राचीन मूर्तियां और शिलालेख मिले हैं। इनमें सर्वे में ब्रह्मा, गणेश, शिव-पार्वती और विष्णु की मूर्तियां मिले हैं। इसके साथ-साथ संस्कृत/नागरी लिपि के अभिलेख, शंख और स्वस्तिक के चिन्ह मिले हैं। ASI की रिपोर्ट कहती है कि ये ढांचा पहले से बने मंदिर के अवशेषों पर बना है। इंदौर हाई कोर्ट ने आज फैसला सुना दिया है। इस फैसले में कोर्ट ने हिंदू पक्ष की मांग को मंजूर कर लिया है।
5 / 8
आजादी के बाद एएसआई का नियंत्रण
Dhar Bhojshala History
Image credit : Kaushiki
स्वतंत्रता के बाद साल 1952 में इस परिसर को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को सौंपा गया। लंबे समय तक यहां किसी भी तरह की धार्मिक गतिविधियों पर पूरी तरह रोक लगी रही। धीरे-धीरे दोनों समुदायों के बीच अधिकारों की मांग बढ़ी और विवाद गहराता चला गया। इसके बाद प्रशासन ने यहां पूजा और नमाज के लिए अलग-अलग नियम बनाए।
6 / 8
वर्तमान पूजा और नमाज की व्यवस्था
Dhar Bhojshala History
Image credit : Kaushiki
साल 2003 में प्रशासन ने एक नई व्यवस्था बनाई जो आज भी लागू है। इसके तहत मंगलवार को हिंदू यहां पूजा करते हैं और शुक्रवार को मुस्लिम नमाज पढ़ते हैं। विवाद तब होता है जब वसंत पंचमी शुक्रवार के दिन पड़ जाता है। ऐसी स्थिति में सुप्रीम कोर्ट ने पूजा और नमाज के लिए अलग-अलग समय तय किया है।
7 / 8
आक्रमण और ढांचे में हुए बड़े बदलाव
Dhar Bhojshala History
Image credit : Kaushiki
इतिहासकारों के मुताबिक, 14वीं सदी में इस मंदिर पर विदेशी आक्रमणकारियों ने हमला किया। अलाउद्दीन खिलजी के समय इस प्राचीन मंदिर को ध्वस्त कर मस्जिद में बदलने का दावा किया जाता है। मंदिर के पुराने खंभों और पत्थरों का उपयोग करके ही यहां कमाल मौला मस्जिद बनाई गई। इसके बाद ही यहां सूफी संत कमाल मौलाना की दरगाह भी बनाई गई थी।
8 / 8
एमपी की भोजशाला का इतिहास
Dhar Bhojshala History
Image credit : Kaushiki
ASI survey in Dhar Bhojshala: मध्यप्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला आज भी अपनी प्राचीन भव्यता और अनसुलझे विवादों के लिए जानी जाती है। ये स्थान 11वीं सदी में राजा भोज द्वारा निर्मित एक महान विश्वविद्यालय था। वर्तमान में धार की भोजशाला मंदिर और मस्जिद के दावों के बीच फंसा है। आज ये स्थान धर्म, इतिहास और कानून की बड़ी लड़ाई का गवाह है।