एमपी पुलिस का डिजिटल तैयारी पर जोर, हर थाने में डिजिटल रजिस्टर बनाने का सुझाव
ऐसे समझें क्या है पूरा मामला...
- हर थाने में डिजिटल रजिस्टर तैयार करने का सुझाव।
- चार्जशीट के साथ डिजिटल रिकॉर्ड कोर्ट भेजने पर जोर।
- डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने की व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत बताई।
- ऑनलाइन समन, मेडिकल और फॉरेंसिक रिपोर्ट के बढ़ते उपयोग का उल्लेख।
- मध्य प्रदेश में डिजिटल पुलिसिंग के प्रयासों की सराहना भी की गई।
मध्य प्रदेश में पुलिस व्यवस्था को पूरी तरह डिजिटल बनाने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण पहल सामने आई है। भोपाल में आयोजित पुलिस विभाग के कार्यक्रम में हाईकोर्ट के जस्टिस संजीव एस. कालगांवकर ने हर थाने में डिजिटल रजिस्टर तैयार करने का सुझाव दिया।
जस्टिस संजीव का कहना था कि यदि आरोपी और साक्ष्यों का डिजिटल चार्जशीट के साथ रिकॉर्ड कोर्ट तक पहुंचे तो समन और वारंट जैसी कानूनी प्रक्रियाएं पहले से अधिक तेज और प्रभावी हो सकती हैं।
भोपाल में पुलिस अधिकारियों के बीच रखे सुझाव
राज्य अपराध अभिलेख ब्यूरो की ओर से भोपाल के कुशाभाऊ ठाकरे कन्वेंशन सेंटर में आयोजित कार्यक्रम में प्रदेशभर के पुलिस अधिकारी मौजूद रहे।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जस्टिस संजीव एस. कालगांवकर ने कहा कि मध्य प्रदेश ने डिजिटल पुलिसिंग के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण पहल की हैं, लेकिन अभी भी कई स्तरों पर सुधार की आवश्यकता है।
कालगांवकर ने ऑनलाइन एफआईआर और ऑनलाइन चार्जशीट से जुड़े आंकड़ों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रदेश की वास्तविक क्षमता इससे कहीं अधिक है और सभी विभागों को मिलकर इस दिशा में लगातार काम करना होगा।
डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने पर उठाया सवाल
जस्टिस कालगांवकर ने कहा कि आज अधिकांश अपराधों की जांच में सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल वीडियो, बैंक रिकॉर्ड, हार्ड डिस्क और अन्य इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज महत्वपूर्ण साक्ष्य बन चुके हैं।
कालगांवकर ने सवाल उठाया कि इतने बड़े पैमाने पर डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने के लिए मजबूत और व्यवस्थित व्यवस्था विकसित करना समय की जरूरत है। केवल डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसमें साक्ष्यों के सुरक्षित संरक्षण की भी व्यवस्था होनी चाहिए।
हर थाने में डिजिटल रिकॉर्ड रखने की सलाह
उन्होंने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रत्येक थाने में ऐसा डिजिटल रजिस्टर तैयार किया जा सकता है जिसमें आरोपी, गवाह, साक्ष्य, मोबाइल नंबर और ई-मेल जैसी आवश्यक जानकारी दर्ज हो।
यदि यही रिकॉर्ड चार्जशीट के साथ न्यायालय तक पहुंचे तो कोर्ट सीधे संबंधित व्यक्ति को समन और वारंट जारी करने की प्रक्रिया को और तेज बना सकेगा।
मोबाइल तकनीक से आसान हो रही न्यायिक प्रक्रिया
जस्टिस कालगांवकर ने कहा कि देश में करोड़ों लोग मोबाइल का उपयोग कर रहे हैं। ऐसे में समन और नोटिस जैसी कानूनी सूचनाएं मोबाइल और डिजिटल माध्यमों से भेजना अब व्यवहारिक विकल्प बन चुका है। उन्होंने कहा कि तकनीक का बेहतर उपयोग करने से कागज की बचत होगी और पुलिस व न्यायालय दोनों की कार्यप्रणाली अधिक प्रभावी बन सकेगी।
ऑनलाइन सेवाओं के आंकड़े भी साझा किए
कार्यक्रम के दौरान बताया गया कि अब तक प्रदेश में 50 लाख से अधिक समन ऑनलाइन भेजे जा चुके हैं। इसके अलावा लगभग 3 लाख मेडिकल रिपोर्ट और 2.60 लाख फॉरेंसिक रिपोर्ट भी डिजिटल माध्यम से संबंधित संस्थानों तक पहुंचाई गई हैं।
अधिकारियों के अनुसार डिजिटल प्रक्रिया अपनाने से दस्तावेजों के आदान-प्रदान में तेजी आई है और बड़ी मात्रा में कागज की बचत भी हुई है।
कार्यक्रम में रखे गए सुझाव यह संकेत देते हैं कि मध्य प्रदेश में पुलिस और न्यायिक व्यवस्था को अधिक डिजिटल, पारदर्शी और तेज बनाने की दिशा में प्रयास जारी हैं।
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म के साथ-साथ साक्ष्यों की सुरक्षित स्टोरेज और मजबूत तकनीकी ढांचा विकसित करना भी उतना ही जरूरी होगा।
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