उच्च शिक्षा विभाग सहायक प्राध्यापकों के संदिग्ध दिव्यांग सर्टिफिकेट की जांच में नाकाम
समझें क्या है पूरा मामला
- 123 दिव्यांग सहायक प्राध्यापकों के सर्टिफिकेट संदिग्ध हैं
- 2 साल से मेडिकल बोर्ड से दोबारा नहीं कराई जा सकी जांच
- सुप्रीम कोर्ट ने 15 अप्रैल 2026 को नियुक्त किया नोडल अधिकारी
- उच्च शिक्षा की बेरुखी से दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम का उल्लंघन
- विभाग की नाकामी पर दिव्यांगजन आयुक्त ने जताई नाराजगी
मध्य प्रदेश में दिव्यांगता सर्टिफिकेट फर्जीवाड़ा की जड़ें गहरी हैं। उच्च शिक्षा विभाग द्वारा भर्ती 123 दिव्यांग सहायक प्राध्यापक 2 साल से संदेह के घेरे में हैं। शिकायतों के बाद विभाग ने जांच के आदेश दिए। सुप्रीम कोर्ट ने 15 अप्रैल 2026 को नोडल अधिकारी नियुक्त किया था लेकिन उच्च शिक्षा विभाग तब भी जांच नहीं करा सका।
विभाग की उदासीनता के चलते दो माह बीतने के बाद भी संदिग्ध सर्टिफिकेट के आधार पर सहायक प्राध्यापकों को मेडिकल बोर्ड के सामने पेश नहीं किया जा सका। विभाग की यह बेरुखी दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम की धज्जियां उड़ा रही है।
फर्जीवाड़े की पृष्ठभूमि
सहायक प्राध्यापक परीक्षा 2017 में 123 दिव्यांग अभ्यर्थी चुने गए। मध्य प्रदेश लोकसेवा आयोग से चयन के बाद नियुक्ति मिली। बाद में इनके अशक्तता प्रमाण पत्र संदिग्ध पाए गए। कई शिकायतें दिव्यांगजन आयुक्त कार्यालय पहुंचीं। इनमें से ज्यादातर सर्टिफिकेट संदिग्ध होने से उनकी जांच कराने के लिए निर्देश भी कई बार जारी किए गए।
उच्च शिक्षा विभाग संचालनालय से जारी इन निर्देशों पर विभाग के संभागीय अधिकारी चुप्पी साधे रहे। वहीं संदेह के दायरे में आने वाले प्राध्यापक भी पत्राचार और नए दांवपेच से मामले को उलझाए रहे। कई बार आदेश जारी होने के बाद भी संदिग्ध सर्टिफिकेट के आधार पर मेडिकल बोर्ड से परीक्षण कराने कोई प्राध्यापक आगे नहीं आया।
विभाग से भी कार्रवाई नहीं
प्राध्यापकों द्वारा उच्च शिक्षा संचालनालय के आदेश की अनदेखी करने पर भी उन पर नरमी बरती गई। सक्षम मेडिकल बोर्ड से जांच न कराने और टालमटोल करने पर भी विभाग ने उन पर कार्रवाई नहीं की।
ऐसे में फर्जी दिव्यांग सर्टिफिकेट से नौकरी हासिल करने वाले अब भी पद पर जमे हैं और वेतन सहित दूसरी सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं। जबकि उनके फर्जीवाड़े के चलते बाहर हुए योग्य अभ्यर्थी भटकने मजबूर हैं। पूरे मामले में फर्जीवाड़े की जांच में चिकित्सकीय परीक्षण न कराना विभाग की लापरवाही उजागर कर रहा है।
सुप्रीम कोर्ट में जारी सुनवाई
यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। कोर्ट ने 15 अप्रैल 2026 को नोडल अधिकारी नियुक्त कर निर्देश दिए थे। जिसके तहत दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 लागू किया जाना था। यानी ऐसे सभी सहायक प्राध्यापकों का मेडिकल परीक्षण सक्षम बोर्ड से कराना सुनिश्चित करना था। हांलाकि नोडल अधिकारी की नियुक्ति के दो माह बीतने के बाद भी ऐसा नहीं हुआ है।
दिव्यांगजन आयुक्त ने मांगी सूची
दिव्यांगजन आयुक्त डॉ.अजय खेमरिया द्वारा 03 जून 2026 को उच्च शिक्षा आयुक्त को पत्र भेजकर स्थिति पर असंतोष जताया है। आयुक्त उच्च शिक्षा को सभी 123 प्राध्यापकों की सूची मांगी।
यानी सहायक प्राध्यापक परीक्षा 2017 में चयनित सभी दिव्यांग अभ्यर्थियों के दस्तावेजों के साथ ही उच्च शिक्षा विभाग द्वारा की गई जांच रिपोर्ट भी तलब की गई है। पत्र में कहा गया कि प्राध्यापक जानबूझकर जांच नहीं करा रहे। इससे असली दिव्यांगों का हक मारा जा रहा है।
FAQ
- मध्य प्रदेश में दिव्यांग सर्टिफिकेट फर्जीवाड़ा (Divyang Certificate Fraud) क्या है?
2017 में 123 दिव्यांग सहायक प्राध्यापकों (Assistant Professors) की भर्ती हुई। उनके अशक्तता प्रमाण पत्र संदिग्ध हैं। 2 साल से पुनर्जांच नहीं हुई। सुप्रीम कोर्ट ने 15/04/2026 को नोडल अधिकारी नियुक्त किया। पर जांच अब तक नहीं हुई। फर्जी दिव्यांग सर्टिफिकेट से नौकरी हड़पने का आरोप है। - सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी जांच क्यों नहीं हो रही?
सुप्रीम कोर्ट ने 15/04/2026 को नोडल अधिकारी नियुक्त किया। दो महीने बीत गए हैं। पर उच्च शिक्षा विभाग 123 संदिग्ध प्राध्यापकों को मेडिकल बोर्ड के सामने नहीं ला पाया। विभाग के निर्देशों के बाद भी प्राध्यापक जांच से बच रहे हैं। इससे दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 91 का उल्लंघन हो रहा है। - फर्जी दिव्यांग सर्टिफिकेट (Fake Divyang Certificate) पर क्या कार्रवाई होगी?
दिव्यांगजन आयुक्त ने सभी 123 प्राध्यापकों की सूची मांगी है। मेडिकल बोर्ड से पुनर्जांच कराई जाएगी। फर्जी पाए जाने पर सेवा समाप्त होगी। दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत न्यायिक कार्रवाई होगी। धारा 91 के उल्लंघन पर सजा का प्रावधान है। असली दिव्यांगों को न्याय दिलाना लक्ष्य है।
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फर्जी दिव्यांगता सर्टिफिकेट