नीति बदलते ही उलटफेर: एमपी में दूरदराज जिलों में एक भी डॉक्टर नहीं पहुंचा, बड़े शहरों में 92 बढ़े
समझें क्या है पूरा मामला...
- मध्यप्रदेश में डीआरपी पोस्टिंग की नई व्यवस्था सवालों में घिर गई है।
- जुलाई 2026 की पोस्टिंग में 10 जिलों में एक भी डॉक्टर नहीं पहुंचा है।
- भोपाल, इंदौर और ग्वालियर में कुल 92 डॉक्टर ज्यादा पहुंच गए हैं।
- कुल डॉक्टर 392 से बढ़कर 562 हुए, पर 26 जिलों में संख्या घटी।
- मध्यप्रदेश डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ला ने पूरे मामले का रिव्यू कराने की बात कही है।
डीआरपी पोस्टिंग में क्या बदला
जिला रेजीडेंसी प्रोग्राम यानी डीआरपी की पोस्टिंग व्यवस्था तीन महीने बाद बदली गई। इस कार्यक्रम में रेजीडेंट डॉक्टर जिला अस्पतालों में तैनात किए जाते हैं।
पहले जिलों का आवंटन राज्य स्तर से होता था। अब मेडिकल कॉलेज के डीन की अध्यक्षता वाली समिति जिले तय करती है।
इस बदलाव का मकसद साफ था। स्थानीय जरूरत के हिसाब से डॉक्टरों की तैनाती हो। जिस इलाके से मेडिकल कॉलेज में ज्यादा मरीज आते हैं, वहां के जिला अस्पतालों को ज्यादा डॉक्टर मिलें।
वहीं जुलाई 2026 की पोस्टिंग के आंकड़े अलग कहानी कहते हैं। दूरदराज और पिछड़े जिलों तक डॉक्टर नहीं पहुंचे। बड़े मेडिकल कॉलेजों और उनके पास के जिलों में जमावड़ा बढ़ गया।
10 जिलों में एक भी डॉक्टर नहीं
सबसे चौंकाने वाले आंकड़े रिमोट जिलों के हैं। मार्च से जुलाई के बीच इन जिलों में 6 से 12 डॉक्टर पहुंचे थे। जुलाई के बाद की पोस्टिंग में यह संख्या शून्य रह गई।
कटनी में पहले 12 डॉक्टर पहुंचे थे। अब वहां एक भी नहीं है। छिंदवाड़ा में 9 और नरसिंहपुर में 8 डॉक्टर थे। दोनों जगह अब शून्य है।
सतना में 7 डॉक्टर तैनात हुए थे। शहडोल और टीकमगढ़ में 6-6 डॉक्टर पहुंचे थे। अब इन तीनों जिलों में भी कोई डॉक्टर नहीं है।
इनके अलावा छतरपुर, डिंडोरी, आगर मालवा और अशोकनगर में भी एक डॉक्टर नहीं पहुंचा। यानी कुल 10 जिले पूरी तरह खाली रह गए।
बड़े शहरों में बढ़ा जमावड़ा
दूसरी तरफ भोपाल, इंदौर और ग्वालियर जैसे शहरों में डॉक्टर बढ़ गए। भोपाल में पहले 10 डॉक्टर थे। अब यहां 48 डॉक्टर हैं।
इंदौर में संख्या 14 से बढ़कर 35 हो गई। ग्वालियर में यह आंकड़ा 3 से उछलकर 36 पर पहुंच गया। तीनों शहरों में मिलाकर 92 डॉक्टर ज्यादा पहुंचे।
यही रुझान कई और जिलों में भी दिखा। धार में डॉक्टर 10 से बढ़कर 46 हो गए। रायसेन में संख्या 12 से 33 हुई। खंडवा में 11 से 29 डॉक्टर पहुंचे। नर्मदापुरम में यह संख्या 9 से 21 हो गई। खरगोन में 8 से बढ़कर 23 डॉक्टर हो गए।
इन जिलों में भी घटी संख्या
कुछ जिलों में डॉक्टर पूरी तरह गायब तो नहीं हुए। लेकिन संख्या बहुत कम रह गई। उमरिया में पहले 17 डॉक्टर थे। अब सिर्फ 2 बचे हैं।
मंदसौर में डॉक्टर 12 से घटकर 2 रह गए। शाजापुर में 11 से 2 हो गए। नीमच में 8 से 1, बुरहानपुर में 7 से 1 और मुरैना में 7 से 1 डॉक्टर बचे।
आंकड़ों में दिखा असंतुलन
मार्च से जुलाई की तुलना में जुलाई के बाद कुल डॉक्टर बढ़े हैं। यह संख्या 392 से बढ़कर 562 हो गई। यानी 170 डॉक्टर ज्यादा मिले।
फिर भी 26 जिलों में डॉक्टरों की संख्या पहले से कम हो गई। आंकड़े संकेत देते हैं कि दिक्कत डॉक्टरों की कुल संख्या से ज्यादा उनके बंटवारे में रही।
जिला अस्पतालों पर असर
जिला अस्पताल छोटे शहरों और गांवों के मरीजों का पहला सहारा होते हैं। यहां डॉक्टर कम होने पर मरीजों को बड़े शहर जाना पड़ता है। इससे इलाज का खर्च और समय दोनों बढ़ते हैं।
जिन 10 जिलों में एक भी डॉक्टर नहीं पहुंचा, वहां यह दिक्कत और गंभीर हो सकती है।
विशेषज्ञ और सरकार की राय
फाइमा (FAIMA – Federation of All India Medical Association) के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. आकाश सोनी ने पुरानी व्यवस्था का पक्ष रखा। उनके मुताबिक पहले पोस्टिंग के विकल्प खुले रहते थे। उनकी मांग है कि व्यवस्था बदलने की बजाय कमियां दूर की जाएं।
उप मुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला ने कहा कि डीआरपी पोस्टिंग को लेकर नई व्यवस्था बनी है। उन्होंने रिव्यू कराने की बात कही। यानी देखा जाएगा कि ऐसा कैसे हुआ। उन्होंने व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने का भरोसा भी दिया।
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