कर्मचारियों-पेंशनर्स के कैशलेस इलाज में नया पेंच! नॉन-इंपैनल्ड अस्पतालों की लिमिट 4 लाख से घटाकर 1.50 लाख करने का प्रस्ताव
वहीं, वित्त विभाग ने इसे घटाकर 1.50 लाख रुपए करने का प्रस्ताव दिया है। इसी वजह से योजना का फाइनल ड्राफ्ट अटका हुआ है।
क्या है नया पेंच?
नॉन-इंपैनल्ड यानी असूचीबद्ध अस्पताल वे हैं, जो योजना की सूची में शामिल नहीं हैं। कर्मचारी कई बार ऐसे अस्पताल में भी इलाज करा सकते हैं। इसलिए वहां की सीमा तय करना जरूरी है।
स्वास्थ्य विभाग का प्रस्ताव चार लाख रुपए तक का था। वित्त विभाग इसे सिर्फ 1.50 लाख रुपए तक रखना चाहता है। यानी सीमा में 2.50 लाख रुपए की कटौती का सुझाव है। यह करीब 62 फीसदी की कमी है।
स्वास्थ्य, सामान्य प्रशासन और वित्त विभाग के बीच चर्चा हुई है। फिर भी योजना का फाइनल ड्राफ्ट तैयार नहीं हो सका। यही कैशलेस इलाज की राह में सबसे बड़ी अड़चन बन गई है।
4 लाख से 1.50 लाख की लिमिट
इस प्रस्ताव का असर सीधे कर्मचारियों की जेब पर पड़ेगा। मान लीजिए किसी कर्मचारी का इलाज असूचीबद्ध अस्पताल में तीन लाख रुपए का हुआ। चार लाख की सीमा में यह पूरा कैशलेस होता। 1.50 लाख की सीमा में आधी रकम ही कवर होगी। यह सिर्फ उदाहरण है, योजना में अंतिम नियम बनने बाकी हैं।
प्रस्ताव के मुताबिक सामान्य मामलों में इलाज की सीमा 10 लाख रुपए है। विशेष परिस्थितियों में अनुमति के बाद यह 20 लाख रुपए तक जा सकती है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 18 मई 2025 को इसे लागू करने की घोषणा की थी। घोषणा को अब काफी समय हो चुका है।
इंपैनल्ड अस्पतालों का नियम
इंपैनल्ड यानी सूचीबद्ध अस्पतालों के लिए अलग राशि सीमा तय नहीं की गई है। यहां नियम सीधा है। बीमा कवर में जितनी राशि उपलब्ध होगी, उतना इलाज कैशलेस होगा।
कर्मचारियों और पेंशनर्स को डिजिटल हेल्थ कार्ड भी मिलेगा। इसी कार्ड से कैशलेस इलाज की सुविधा मिलेगी। यानी सूचीबद्ध अस्पताल में जाने पर सीमा की उलझन कम रहेगी। असली दिक्कत असूचीबद्ध अस्पतालों में आएगी।
600 करोड़ का प्रीमियम किसका?
प्रीमियम यानी बीमा के लिए चुकाई जाने वाली किस्त। योजना का सालाना प्रीमियम करीब 600 करोड़ रुपए आंका गया है। इसमें से 350 करोड़ रुपए अधिकारियों, कर्मचारियों और पेंशनर्स से जुटाने का प्रस्ताव है। बाकी 250 करोड़ रुपए सरकार वहन करेगी।
सरकार अभी भी कर्मचारियों के इलाज पर करीब 350 करोड़ रुपए सालाना खर्च करती है। यानी नई योजना में सरकार का हिस्सा 250 करोड़ रुपए होगा। यह मौजूदा खर्च से कम दिखता है। लेकिन इसका असली हिसाब फाइनल ड्राफ्ट के बाद ही साफ होगा। प्रस्ताव अब कैबिनेट में जाएगा।
अभी कर्मचारियों को क्या दिक्कत?
योजना लागू न होने से कर्मचारी पुरानी व्यवस्था पर निर्भर हैं। यह मेडिकल रीइंबर्समेंट की व्यवस्था है। रीइंबर्समेंट यानी इलाज पर खर्च हुई रकम बाद में वापस मिलना।
इस व्यवस्था में मरीज को पहले अपनी जेब से पैसा देना पड़ता है। इसके बाद मेडिकल बिल जमा करने होते हैं। फिर रीइंबर्समेंट की प्रक्रिया पूरी करनी पड़ती है। इलाज के बीच यह परेशानी कई परिवारों के लिए भारी पड़ती है।
कैशलेस योजना इसी दिक्कत का हल बताई जा रही है। इसमें अस्पताल सीधे बीमा से पैसा लेगा। मरीज को शुरुआत में रकम नहीं चुकानी पड़ेगी।
वेतन के हिसाब से कितनी कटौती?
योजना में बीमा प्रीमियम को वेतन के आधार पर चार स्लैब में बांटने का प्रस्ताव है। स्लैब यानी वेतन के अलग-अलग वर्ग। ग्रुप 'डी' कर्मचारियों से कम से कम 250 रुपए प्रतिमाह लिए जा सकते हैं। उच्च अधिकारियों से अधिकतम 1000 रुपए प्रतिमाह तक लिए जा सकते हैं।
यह ढांचा अभी प्रस्ताव के स्तर पर है। बीच के स्लैब की रकम सोर्स में नहीं बताई गई है। कर्मचारी संगठन इस पर क्या राय रखते हैं, यह भी अभी सामने नहीं आया है।
अब आगे क्या होगा?
सबसे पहले तीनों विभागों में सीमा पर सहमति जरूरी है। यानी चार लाख और 1.50 लाख के बीच फैसला होना है। इसके बाद फाइनल ड्राफ्ट बनेगा। फिर प्रस्ताव कैबिनेट में जाएगा।
मध्यप्रदेश कैबिनेट की मंजूरी के बाद ही योजना जमीन पर उतर सकेगी। तब तक कर्मचारियों को पहले पैसा देने और बाद में रीइंबर्समेंट लेने की व्यवस्था पर ही चलना होगा। सवाल यह भी है कि क्या सीमा घटाने से योजना का असली फायदा कम हो जाएगा। इसका जवाब अंतिम फैसले से ही मिलेगा।