MP के छात्रों के लिए बड़ी राहत: अब 35 हजार में होगी इंजीनियरिंग, FRC करेगी फैसला
समझें क्या है पूरा मामला
- कई निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों ने फीस घटाने का प्रस्ताव दिया है।
- कॉलेजों ने सालाना शिक्षण शुल्क 35 हजार रुपए की मांग।
- प्रस्ताव शुल्क विनियामक समिति के सामने रखा गया है।
- दस वर्षों में 58 निजी इंजीनियरिंग कॉलेज बंद हुए हैं।
- केवल 45 से 55 प्रतिशत सीटें भर रही हैं।
10 साल में 58 कॉलेज बंद, फिर भी सीटें खाली
मध्यप्रदेश में निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों की हालत पिछले कुछ सालों से ठीक नहीं है। एक दशक में 58 कॉलेज बंद हो गए। इस दौरान सिर्फ एक नया सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज खुला।
हालत यह है कि निजी कॉलेजों की औसतन 45 से 55 प्रतिशत सीटों पर ही प्रवेश हो पाते हैं। सरकारी कॉलेजों में 80 से 90 प्रतिशत सीटें भर जाती हैं। यह अंतर बताता है कि निजी कॉलेज छात्रों को आकर्षित करने में पिछड़ रहे हैं।
पांच साल का आंकड़ा क्या कहता है
पिछले पांच वर्षों के आंकड़े स्थिति को और साफ करते हैं।
2021-22 में 126 कॉलेजों में 47,520 सीटें थीं। उनमें से 28,534 पर प्रवेश हुए। 2022-23 में 124 कॉलेजों में 58,535 सीटों पर 31,659 प्रवेश हुए। 2023-24 में 123 कॉलेजों में 60,754 सीटों पर 33,334 दाखिले हुए। 2024-25 में 142 कॉलेजों में 73,637 सीटों पर 42,924 प्रवेश हुए। 2025-26 में 128 कॉलेजों में 64,473 सीटों पर 38,171 छात्र आए।
यानी हर साल हजारों सीटें खाली रह जाती हैं।
छात्र क्यों नहीं आते निजी कॉलेजों में
विशेषज्ञों का कहना है कि इसके पीछे कई कारण हैं। उद्योगों की जरूरतों और इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम के बीच की दूरी बढ़ रही है। छात्रों की रोजगार को लेकर प्राथमिकताएं बदल रही हैं। नई तकनीकों के अनुसार पाठ्यक्रम समय पर अपडेट नहीं हो रहा।
एसोसिएशन ऑफ टेक्निकल प्रोफेशनल इंस्टिट्यूशंस के उपाध्यक्ष डॉ. अजीत सिंह पटेल कहते हैं कि उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्यों की तुलना में एमपी की फीस पहले से कम है। इसीलिए यहां दूसरे राज्यों के छात्र भी आते हैं।
अभी कितनी है फीस, क्या है दूसरे राज्यों का हाल
मध्यप्रदेश में फिलहाल निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों की फीस 40 से 60 हजार रुपए सालाना है। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और गुजरात में यह फीस औसतन एक से डेढ़ लाख रुपये तक पहुंचती है।
ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन यानी एआईसीटीई (AICTE – All India Council for Technical Education) ने न्यूनतम शुल्क करीब 80 हजार रुपये तय किया है। इसके बावजूद मध्यप्रदेश में यह उससे कम है।
अब कुछ कॉलेज इसे और घटाकर 35 हजार रुपए करना चाहते हैं।
फीस घटाने से क्या बदलेगा
कॉलेजों का तर्क सीधा है। सीटें खाली रहने से प्रति छात्र लागत बढ़ती है। इससे संस्थान आर्थिक संकट में फंसते हैं। अगर फीस घटी तो कम आय वाले परिवारों के बच्चे भी दाखिला ले सकेंगे।
साथ ही दूसरे राज्यों के छात्र भी मध्यप्रदेश की ओर आकर्षित होंगे। इससे सीटें भरेंगी और कॉलेजों की आर्थिक स्थिति सुधरेगी।
एफआरसी क्या करेगी
प्रवेश तथा फीस विनियामक समिति यानी एफआरसी (FRC – Fee Regulatory Committee) के सचिव डॉ. अनिल शिवानी ने बताया कि पांच-छह कॉलेजों से प्रस्ताव आए हैं। समिति कॉलेजों का पूरा लेखा-जोखा देखकर न्यूनतम शुल्क तय करती है। इस प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा है।
यानी अभी फैसला नहीं हुआ है। लेकिन अगर मंजूरी मिली तो यह पूरे निजी इंजीनियरिंग तंत्र को प्रभावित करेगा।
एक्सपर्ट कोट्स
डॉ. अजीत सिंह पटेल, उपाध्यक्ष, एसोसिएशन ऑफ टेक्निकल प्रोफेशनल इंस्टिट्यूशंस, मध्यप्रदेश:
उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और तमिलनाडु सहित अन्य राज्यों की तुलना में मध्यप्रदेश में इंजीनियरिंग का शुल्क कम है। इसी कारण दूसरे राज्यों के विद्यार्थी भी यहां प्रवेश लेते हैं। कुछ कॉलेज विश्वविद्यालय में तब्दील हो रहे हैं, इसलिए वे काउंसलिंग में शामिल नहीं हो रहे।
डॉ. अनिल शिवानी, सचिव, एफआरसी:
पांच-छह इंजीनियरिंग कॉलेजों से शुल्क तय करने के प्रस्ताव आए हैं। समिति कॉलेजों का लेखा-जोखा देखकर न्यूनतम शुल्क तय करती है। इस पर विचार किया जा रहा है।
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