एमपी में एप्को पर आर्थिक संकट के सवाल, 8 करोड़ का अनुदान रुका तो कर्मचारियों के भविष्य पर बढ़ी चिंता
साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि प्रदेश की पर्यावरण योजनाओं पर इसका क्या असर पड़ेगा।
8 करोड़ का अनुदान रुका तो कैसे चलेंगे काम?
जानकारी के मुताबिक, हर साल मिलने वाली सरकारी आर्थिक मदद रुकने से एप्को पर वेतन और दूसरे खर्चों का दबाव बढ़ सकता है। बताया जा रहा है कि जिन संविदा कर्मचारियों की ड्यूटी चालू परियोजनाओं में लगी है, उनकी नौकरी फिलहाल सुरक्षित मानी जा रही है। वहीं, जिन संविदा कर्मचारियों के पास अभी कोई परियोजना नहीं है, उनके रोजगार को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। हालांकि, कितने कर्मचारी इससे प्रभावित होंगे और क्या किसी की छंटनी होगी, इस बारे में अभी कोई आधिकारिक आंकड़ा या आदेश सामने नहीं आया है।
333 करोड़ की परियोजनाएं, लेकिन एप्को को कितनी कमाई?
एप्को के सितंबर 2025 के दस्तावेजों में दो प्रस्तावित परियोजनाओं का जिक्र है। इनमें जबलपुर की परियोजना की अनुमानित लागत 280 करोड़ रुपए और श्योपुर की परियोजना की लागत 53 करोड़ रुपए बताई गई है। दोनों परियोजनाओं में एप्को को पर्यावरण से जुड़ी सलाह और परामर्श सेवाएं देने की जिम्मेदारी मिलने का उल्लेख है। इन दोनों योजनाओं की कुल अनुमानित लागत 333 करोड़ रुपए है। हालांकि, यह पूरी रकम एप्को की कमाई या उसके खाते में उपलब्ध बजट नहीं है। असली सवाल यह है कि इन परियोजनाओं से संगठन को कितनी फीस मिली और कितना भुगतान अभी बाकी है।
पर्यावरण शिक्षा से लेकर जलवायु योजना तक बड़ी जिम्मेदारी
एप्को सिर्फ सरकारी परियोजनाओं तक सीमित नहीं है। संगठन प्रदेश में पर्यावरण शिक्षा और जलवायु परिवर्तन से जुड़े काम भी करता है। वर्ष 2024-25 की आधिकारिक रिपोर्ट के मुताबिक, एप्को का पर्यावरण शिक्षा कार्यक्रम प्रदेश के 55 जिलों तक फैला हुआ है। वहीं, केंद्र सरकार के जलवायु पोर्टल पर मध्यप्रदेश की जलवायु कार्ययोजना में 535 गतिविधियां और 13 विभाग शामिल हैं। इस कार्ययोजना में एप्को को प्रदेश की नोडल संस्था की जिम्मेदारी दी गई है। ऐसे में संगठन की आर्थिक स्थिति कमजोर होने पर इन कामों पर क्या असर पड़ेगा, यह भी बड़ा सवाल है।
सरकारी मदद पर निर्भरता कम करने की थी योजना
एप्को की रणनीति में सरकारी अनुदान पर निर्भरता कम करके खुद की कमाई बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया था। साल 2021 में विधानसभा में दिए गए जवाब में बताया गया था कि एप्को पर्यावरण संबंधी परामर्श सेवाओं के बदले फीस ले सकता है। इस व्यवस्था के तहत 3 प्रतिशत परामर्श शुल्क और उसमें से 1 प्रतिशत एप्को के पास रखने का उल्लेख किया गया था। हालांकि, यह पुरानी व्यवस्था है। इससे संगठन की मौजूदा कमाई का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। इसके लिए नए वित्तीय आंकड़ों की जरूरत है। विधानसभा में वर्ष 2024 के एक जवाब में एप्को के 32 बचत खाते और 11 सावधि जमा खाते होने की जानकारी भी दी गई थी। लेकिन इन खातों में फिलहाल कितनी रकम है, इसका पूरा ब्योरा उपलब्ध नहीं है।
एप्को बंद होगा या बदलेगा अपना आर्थिक मॉडल?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर 8 करोड़ रुपए का सालाना अनुदान रोका गया है, तो सरकार ने संगठन के खर्च चलाने के लिए कोई दूसरी व्यवस्था की है या नहीं। फिलहाल एप्को को बंद करने, किसी दूसरी संस्था में विलय करने या कर्मचारियों की छंटनी करने का कोई प्रमाणित सरकारी आदेश सामने नहीं आया है।
ऐसे में सरकार को एप्को की मौजूदा आर्थिक स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। इसमें चालू वित्त वर्ष के लिए स्वीकृत बजट, उपलब्ध राशि और कर्मचारियों के वेतन पर होने वाले खर्च की जानकारी सार्वजनिक करना जरूरी है। इससे साफ हो सकेगा कि एप्को वास्तव में आर्थिक संकट से गुजर रहा है या अपनी कमाई बढ़ाने के लिए नए Financial Model की तरफ बढ़ रहा है। फिलहाल संगठन के कर्मचारियों और प्रदेश की पर्यावरण योजनाओं का भविष्य इन सवालों के जवाब पर निर्भर करता दिखाई दे रहा है।