MP में जाति का महा-फर्जीवाड़ा, टीचर पर आधार कार्ड चोरी का आरोप, 17 हजार मामले कोर्ट में अटके

Anjali Dwivedi | Mar 16, 2026, 16:53 IST
mp fake caste certificate scam government jobs cases
मध्य प्रदेश में फर्जी जाति प्रमाण पत्र के जरिए नौकरी पाने के हजारों मामले सामने आए हैं। आलीराजपुर में एक टीचर पर पहचान छिपाने का आरोप है। जानें सरकार और छानबीन समिति का क्या है रुख।

News In Short

  • सरकारी नौकरी के लिए लोग बन रहे फर्जी आदिवासी।
  • आलीराजपुर में टीचर ने दूसरे व्यक्ति का आधार कार्ड इस्तेमाल कर नौकरी पाई।
  • मध्य प्रदेश की अदालतों में जाति संबंधी 17 हजार से ज्यादा मामले लंबित हैं।
  • जांच रिपोर्ट आने के डेढ़ महीने बाद भी विभाग ने कोई कार्रवाई नहीं की।
  • 1996 से पहले के जाति प्रमाण पत्रों का कोई सेंट्रलाइज्ड डेटा मौजूद नहीं है।

News In Detail

मध्य प्रदेश में इस समय फर्जी जाति प्रमाण पत्र का मुद्दा गरमाया हुआ है। राज्यमंत्री गौतम टेटवाल की जाति का मामला अभी सुर्खियों में ही था कि अब सरकारी नौकरियों में बड़े फर्जीवाड़े के खुलासे होने लगे हैं। प्रदेश में आरक्षित सीटों का लाभ लेने के लिए लोग अपनी मूल पहचान छिपाकर आदिवासी बन रहे हैं।



मंत्री से लेकर विधायक तक सवालों के घेरे में

राज्यमंत्री गौतम टेटवाल पर आरोप है कि उन्होंने फर्जी सर्टिफिकेट के जरिए चुनाव लड़ा। उनके खिलाफ इंदौर हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई है। वहीं विधानसभा के बजट सत्र में कांग्रेस विधायक हीरालाल अलावा ने यह मुद्दा उठाया। उन्होंने फर्जी दस्तावेजों से सरकारी नौकरी पाने वालों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है।



जब इस मामले की पड़ताल हुई तो पता चला कि राज्यस्तरीय छानबीन समिति के पास फर्जी जाति प्रमाण पत्र के 7 हजार से ज्यादा मामले 15 साल से लंबित हैं। वहीं, कोर्ट में ऐसे 17 हजार से ज्यादा मामले हैं, जिन पर सुनवाई चल रही है। समझिए कैसे हुई गड़बड़ी...



6c57306d-27b


केस 1: टीचर बनने के लिए खुद को बताया आदिवासी

जाति बदलने का सबसे हैरान करने वाला मामला आलीराजपुर जिले से सामने आया है। यहां शर्मिला सोलंकी नामक शिक्षिका पर अपनी पहचान बदलने का आरोप लगा है। शिकायत के मुताबिक, शर्मिला मूल रूप से ठाकुर जाति से ताल्लुक रखती हैं। लेकिन उन्होंने फर्जी तरीके से खुद को अनुसूचित जनजाति (ST) का बताकर नौकरी हासिल कर ली। वह वर्तमान में प्राथमिक शिक्षक के पद पर कार्यरत हैं।



11 साल से चल रहा था धोखाधड़ी का खेल

आरोप है कि शर्मिला ने शिक्षिका बनने से पहले भी इसी सर्टिफिकेट का उपयोग किया। उन्होंने करीब 11 साल तक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के रूप में काम किया। यानी एक दशक से ज्यादा समय तक उन्होंने एसटी कोटे का लाभ उठाया। उन्होंने सरकार से आदिवासी कोटे के तहत वेतन और अन्य सुविधाएं प्राप्त कीं।



इस मामले में सबसे बड़ा खुलासा तब हुआ, जब सुरतान सोलंकी ने पुलिस में शिकायत की। सुरतान का नाम शर्मिला के सर्टिफिकेट में पिता के तौर पर दर्ज है। सुरतान ने आरोप लगाया कि उनके डाक्यूमेंट्स का गलत इस्तेमाल हुआ है। शर्मिला के असली पिता प्रताप सिंह पंवार हैं। सुरतान का कहना है कि उनके आधार और राशन कार्ड को धोखे से इस्तेमाल किया गया।



केस 2: मां की जाति पर महिला बनी आदिवासी

दूसरा मामला ग्राम पंचायत बोरझाड़ का है। यहां लक्ष्मी नामक महिला पर फर्जी एसटी सर्टिफिकेट लगाने का आरोप है। लक्ष्मी ने आंगनवाड़ी कार्यकर्ता भर्ती के लिए आवेदन किया है। शिकायतकर्ताओं के अनुसार, लक्ष्मी के पिता बालचंद कुम्हार समुदाय (OBC) से हैं। राजस्व रिकॉर्ड में भी उनके पिता के नाम पर जमीन दर्ज है।



नियमों के अनुसार, संतान की जाति पिता की जाति से तय होती है। लेकिन यहां लक्ष्मी ने अपनी मां की आदिवासी जाति का प्रमाण पत्र बनवाया। आदिवासी समाज ने अब इन दोनों मामलों की कड़ी जांच की मांग की है। समाज का कहना है कि यह उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन है।



अदालतों में लंबित हजारों मामले

मध्य प्रदेश में जाति प्रमाण पत्रों की जांच के लिए छानबीन समिति बनी है। इसके बावजूद 7 हजार से ज्यादा मामले 15 साल से पेंडिंग हैं। वहीं अदालतों में ऐसे 17 हजार से अधिक मामले चल रहे हैं। समिति के अध्यक्ष प्रमुख सचिव ई रमेश कुमार हैं। नियम के मुताबिक जांच तीन माह में पूरी होनी चाहिए।



सरकार ने माना- 350 मामलों में हुई गड़बड़ी

विधानसभा में सरकार ने खुद स्वीकार किया है कि फर्जी सर्टिफिकेट के कई मामले हैं। मंत्री विजय शाह ने बताया कि पिछले 10 साल में 350 मामले सामने आए। इनमें से 232 मामलों की जांच अभी भी जारी है। अब तक 24 अधिकारी-कर्मचारियों के खिलाफ दोष साबित हो चुका है। सरकार दोषियों पर कार्रवाई करने की बात कह रही है।



क्यों अटके हैं 20 साल पुराने मामले?

पुराने मामलों के लटके रहने की मुख्य वजह रिकॉर्ड की कमी है। साल 1962 से लेकर 1987 तक प्रमाण पत्र जारी करने के अधिकार कई अफसरों को थे। तहसीलदारों से लेकर मंत्रियों तक के पास ये अधिकार हुआ करते थे। साल 1996 से पहले प्रमाण पत्र का कोई तय प्रारूप या आवेदन नहीं था। अलग-अलग जगहों से बने सर्टिफिकेट का एक जगह रिकॉर्ड नहीं है।



ये खबरें भी पढ़ें...



दिल्ली में पीएम मोदी और सीएम मोहन यादव की मुलाकात, किसानों और विकास योजनाओं पर फोकस



गैस सिलेंडर से छुट्टी! जबलपुर के इस गांव में ऐसे बनता है खाना



“गरीबों को कमाने खाने दो…” मैकेनिक की दुकानों पर लगी PIL पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी



बिना मान्यता वाले स्कूलों के एडमिशन विज्ञापन पर हाईकोर्ट सख्त, शिक्षा सचिव से मांगा शपथ पत्र



Tags:
  • इंदौर हाईकोर्ट
  • मध्य प्रदेश
  • आदिवासी
  • धोखाधड़ी
  • राज्यमंत्री गौतम टेटवाल
  • फर्जी जाति प्रमाण पत्र