MP में फर्जी जाति प्रमाण पत्र के 151 मामले, जज से कमिश्नर तक घेरे में

Aman Vaishnav | May 08, 2026, 14:51 IST
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मध्यप्रदेश में फर्जी SC-ST जाति प्रमाण पत्रों की जांच कर रही राज्य स्तरीय छानबीन समितियां 151 मामलों में कोई नतीजा नहीं निकाल पाईं। जज से लेकर कमिश्नर तक के नाम इस सूची में हैं। एक मृत व्यक्ति का मामला भी अभी लंबित दिखाया जा रहा है।

News In Short

  • एमपी में SC-ST फर्जी जाति प्रमाण पत्रों की जांच के लिए समितियां बनी हैं।
  • 151 संदिग्ध मामलों में समिति अब तक कोई नतीजा नहीं निकाल पाई है।
  • सूची में जज, कमिश्नर और अन्य बड़े रसूखदारों के नाम भी शामिल हैं।
  • एक मृत व्यक्ति का केस भी अभी तक लंबित श्रेणी में दर्ज है।
  • सबसे पुराना मामला 2001 का है, इसकी जांच अभी तक पूरी नहीं हुई है।

News In Detail

जांच समितियां 151 मामलों में खाली हाथ

मध्यप्रदेश में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के संदिग्ध जाति प्रमाण पत्रों की जांच के लिए राज्य स्तरीय छानबीन समितियां बनाई गई थीं। ये समितियां 151 मामलों में जाति का सच अभी तक नहीं तलाश पाई हैं। यह चौंकाने वाला खुलासा अनुसूचित जाति के लंबित प्रकरण रजिस्टर से हुआ है।



इन मामलों में जज से लेकर कमिश्नर तक के रसूखदार शामिल हैं। उनकी जाति को लेकर शिकायतें आईं, जांच शुरू हुई लेकिन फाइलें आगे नहीं बढ़ीं।



मृत व्यक्ति का नाम भी लंबित सूची में

इस मामले में सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि लंबित सूची के क्रम संख्या 16 पर डॉ. विशाल खाम्बरा का नाम दर्ज है। उनकी मृत्यु 21 अगस्त 2023 को हो चुकी है। उनका मृत्यु प्रमाण पत्र रिकॉर्ड में शामिल है। इसके बाद भी छानबीन समिति ने यह मामला लंबित श्रेणी से नहीं हटाया है।



सालों से अटकी एक शिकायत

सूची में सबसे पुराना मामला एक शिक्षिका आशा का है, जो क्रम संख्या 128 पर दर्ज है। उनके खिलाफ शिकायत 4 मई 2001 को मिली थी। इतने सालों बाद भी मामला इसलिए अटका है क्योंकि सहायक आयुक्त जबलपुर से जानकारी नहीं मिली है।



इसी तरह रायसेन के स्वास्थ्य कार्यकर्ता राजेन्द्र कुमार ओड़ का मामला 19 जनवरी 2005 से लंबित है। वहां पुलिस अधीक्षक की रिपोर्ट का इंतजार है।



यूपी से आए पिता, बेटे ने MP में लिया SC आरक्षण

ये मामला लोक निर्माण विभाग में विशेष भर्ती अभियान के तहत का है। इसमें सहायक यंत्री बने योगेंद्र कुमार की जाति को लेकर 2008 में शिकायत हुई थी। 2022 में विजिलेंस रिपोर्ट आई थी।





इसमें सामने आया था कि SC-ST आरक्षण का लाभ केवल उसी राज्य में मिलता है जहां व्यक्ति या उसके पूर्वज 1950 से पहले से रह रहे हों। प्रवास यानी माइग्रेशन की स्थिति में राज्य सेवाओं में आरक्षण मान्य नहीं होता है।



योगेंद्र कुमार के पिता किशन लाल जाटव मूल रूप से उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के ग्राम नरहौली के निवासी हैं। वे 1965 में ग्वालियर आए और महालेखाकार कार्यालय में ऑडिटर बने। गांव में पुश्तैनी जमीन अभी भी परिवार के नाम दर्ज है। विजिलेंस रिपोर्ट आने के दो साल बाद भी यह मामला लंबित है।



जाति प्रमाण पत्र रद्द, फिर भी नौकरी जारी

इंदौर में कार्यरत सहायक वाणिज्यिक कर अधिकारी जय कुमार वर्मा का जाति प्रमाण पत्र उच्च स्तरीय छानबीन समिति ने 2 नवंबर 2019 को ही रद्द कर दिया था। उन्होंने 6 जुलाई 2005 को गौड़ जनजाति का प्रमाण पत्र लगाकर निरीक्षक के पद पर नियुक्ति पाई थी। इसके बाद वे पदोन्नत होकर सहायक वाणिज्यिक कर अधिकारी बन गए।



जांच में सामने आया कि वे गौड़ जनजाति के नहीं बल्कि राज मिस्त्री जाति के हैं। जो अन्य पिछड़ा वर्ग में आती है। प्रमाण पत्र रद्द होने के पांच साल बाद भी वे इंदौर में उसी पद पर काम कर रहे हैं।



रिटायर अधिकारी की जाति भी सवालों में

पीडब्ल्यूडी में सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता नरेंद्र कुमार के जाति प्रमाण पत्र की सत्यता को लेकर 2024 में गंभीर शिकायत मिली है। रजिस्टर के क्रम संख्या 107 पर दर्ज इस मामले में ग्वालियर एसपी से रिपोर्ट मांगी गई है। यह अधिकारी रिटायर हो चुके हैं लेकिन जांच अभी शुरुआती दौर में है।



जज और महापौर भी सूची में

इस सूची में सिर्फ छोटे अधिकारी नहीं हैं। मंदसौर के द्वितीय अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश राजकुमार का नाम भी इसमें है। वल्लभ भवन भोपाल में पदस्थ अवर सचिव राधेश्याम बघेल, प्रभारी मुख्य अभियंता रामदयाल अहिरवार सहित कई नाम सूची में शामिल हैं।



कोर्ट के आदेश से भी मामले अटके

क्रम संख्या 22 से 35 तक के मामलों समेत दर्जनों प्रकरण मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय जबलपुर में दायर याचिकाओं की वजह से रुके हुए हैं। याचिकाओं में कोर्ट ने अंतिम फैसला आने तक यथास्थिति बनाए रखने के आदेश दिए हैं। इससे कई मामलों में समिति के हाथ बंधे हुए हैं।



FAQ

  1. मध्यप्रदेश में फर्जी जाति प्रमाण पत्र की जांच कौन करता है और यह प्रक्रिया क्या है?
    मध्यप्रदेश में SC और ST जाति प्रमाण पत्रों की सत्यता जांचने के लिए राज्य स्तरीय छानबीन समितियां बनाई गई हैं। जब किसी के जाति प्रमाण पत्र पर संदेह होता है तो शिकायत इन समितियों के पास आती है। समिति पुलिस, राजस्व और अन्य विभागों से रिपोर्ट मंगाती है। जांच के बाद प्रमाण पत्र सही पाए जाने पर मामला बंद होता है और फर्जी पाए जाने पर रद्द किया जाता है।

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