क्या गर्मियों की मूंग सचमुच 'जहरीली' है? क्यों उठा इतना बड़ा विवाद, जानिए पूरी कहानी
क्या गर्मियों में उगाई जाने वाली मूंग खाना सुरक्षित है? क्या इसे जल्दी पकाने के लिए ऐसे रसायनों का इस्तेमाल होता है, जो स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हैं? क्या इससे कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है? और यदि ऐसे सवाल सही हैं तो फिर सरकार इसकी खरीद क्यों कर रही है?
मध्यप्रदेश में इन दिनों यही सवाल सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। सोशल मीडिया से लेकर आम लोगों तक हर जगह ग्रीष्मकालीन मूंग को लेकर बहस छिड़ी हुई है। इसकी सबसे बड़ी वजह हाल ही में भोपाल में हुआ बड़ा किसान आंदोलन है, जिसने पूरे प्रदेश का ध्यान इस मुद्दे की ओर खींचा है।
सबसे पहले समझिए... विवाद शुरू कैसे हुआ?
मध्यप्रदेश के किसानों की मांग थी कि उनकी 100 प्रतिशत ग्रीष्मकालीन मूंग न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीदी जाए। दूसरी ओर सरकार का कहना था कि वह केवल 25 प्रतिशत मूंग खरीदेगी। यही विवाद आंदोलन की वजह बना। नर्मदापुरम संभाग सहित मूंग उत्पादक जिलों के किसान भोपाल पहुंचे और प्रदर्शन शुरू किया। आंदोलन इतना बड़ा हुआ कि राजधानी में करीब ढाई दिन तक ट्रैफिक व्यवस्था प्रभावित रही, एक दिन स्कूल बंद रहे और कई स्थानों पर कारोबार भी प्रभावित हुआ। आखिरकार सरकार को फैसला बदलना पड़ा। अब सरकार प्रति एकड़ तीन क्विंटल के हिसाब से मूंग खरीदेगी।
अब आंदोलन खत्म होने के बाद नई बहस सामने आ गई है। सवाल उठने लगे हैं कि क्या ग्रीष्मकालीन मूंग वास्तव में जहरीली होती है और क्या इसे उगाने में ऐसे रसायनों का इस्तेमाल होता है, जो लोगों के स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकते हैं? इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने के लिए 'द सूत्र' ने कृषि वैज्ञानिकों, किसान संगठनों के प्रतिनिधियों, किसानों और आम लोगों से बातचीत की।
ग्रीष्मकालीन मूंग आखिर है क्या?
मार्च से जून के बीच उगाई जाने वाली मूंग को ग्रीष्मकालीन मूंग कहा जाता है। रबी फसल की कटाई और खरीफ की बुवाई के बीच खेत खाली रहते हैं। ऐसे समय में किसान अतिरिक्त आमदनी के लिए मूंग की खेती करते हैं। एक दशक में इसकी खेती का रकबा तेजी से बढ़ा है। मध्यप्रदेश के करीब डेढ़ दर्जन जिलों में इसकी खेती होती है। नर्मदापुरम संभाग इसका सबसे बड़ा उत्पादक क्षेत्र है।
वैज्ञानिक क्या कहते हैं?
मध्यप्रदेश के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ.ए.चटर्जी गर्मियों की मूंग के साइड इफैक्ट बताते हैं। उनका कहना है कि ग्रीष्मकालीन मूंग में कई बार पैराग्वाट (Paraquat) और ग्लाइफोसेट (Glyphosate) जैसे हर्बीसाइड्स (खरपतवारनाशक रसायन) का उपयोग किया जाता है। मूंग में फूल लगातार आते रहते हैं। ऐसे में फसल को जल्दी एक साथ पकाने के लिए इन रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है।
डॉ. चटर्जी का कहना है कि इन खरपतवारनाशकों का असर खेत में करीब छह महीने तक बना रह सकता है। ये रसायन विषैले हैं और यदि भोजन के जरिए शरीर में पहुंचें तो स्वास्थ्य पर बेहद बुरा असर पड़ता है।
ग्रीष्मकालीन मूंग से जुड़ी प्रमुख समस्याएं
सिंचाई पर अत्यधिक निर्भरता
गर्मी के मौसम में तापमान ज्यादा होने के कारण फसल को बार-बार पानी देना पड़ता है। जिन क्षेत्रों में नहर या ट्यूबवेल जैसी सिंचाई व्यवस्था नहीं है, वहां खेती जोखिम भरी हो जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार सिंचाई से भूजल पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है और भविष्य में जल संकट गहरा सकता है।
कीट और बीमारियों का ज्यादा खतरा
गर्मी में माहू (एफिड), सफेद मक्खी, थ्रिप्स और तेला जैसे कीट तेजी से फैलते हैं। इनमें सबसे बड़ी समस्या येलो मोजैक वायरस (Yellow Mosaic Virus) है, जो सफेद मक्खी के माध्यम से फैलता है और उत्पादन में भारी कमी ला सकता है। इन्हें नियंत्रित करने के लिए किसानों को बार-बार कीटनाशकों का छिड़काव करना पड़ता है, जिससे खेती की लागत बढ़ जाती है। बाद में यही येलो मोजैक सोयाबीन में भी लग जाता है।
खरपतवारनाशकों का बढ़ता उपयोग
समय कम होने के कारण कई किसान निराई-गुड़ाई की जगह रासायनिक खरपतवारनाशकों का इस्तेमाल करते हैं। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार इससे मिट्टी, जल स्रोत और मानव स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। साथ ही मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीव, विशेषकर नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले बैक्टीरिया भी प्रभावित होते हैं।
इतने सवाल तो सरकार खरीद क्यों रही?
नर्मदापुरम के किसान महेंद्र सिंह चौहान कहते हैं कि खेती की लगातार बढ़ती लागत ने किसानों को ग्रीष्मकालीन मूंग उगाने के लिए मजबूर कर दिया है। उनका कहना है कि मानसून जल्दी सक्रिय होने की आशंका रहती है। ऐसे में फसल समय पर पकाने के लिए कई किसान 'सफाया' जैसे नींदानाशक रसायनों का इस्तेमाल करते हैं। वे स्वीकार करते हैं कि ये रसायन विषैले हैं, लेकिन किसानों की अपनी मजबूरी भी है।
पहले सरकार ने ही बढ़ावा दिया था...
महेंद्र सिंह चौहान सवाल उठाते हैं कि पहले सरकार ने किसानों को ग्रीष्मकालीन मूंग उगाने के लिए प्रोत्साहित किया, अब उसी खेती से पीछे हट रही है। यदि सरकार मानती है कि विषैले रसायनों के कारण ग्रीष्मकालीन मूंग से कैंसर जैसे खतरे बढ़ सकते हैं, तो फिर 25 या 60 प्रतिशत खरीद क्यों? पूरी खरीद ही बंद क्यों नहीं की जाती?
उनका कहना है कि यदि सरकार खेती की दिशा बदलना चाहती है तो किसानों को किसी वैकल्पिक फसल के लिए भी उतना ही सहयोग देना होगा, जितना कभी मूंग की खेती के लिए दिया गया था।
किसान संघ ने कहा- हर फसल में होता है कीटनाशक का इस्तेमाल
भारतीय किसान संघ, मध्य भारत प्रांत के अध्यक्ष शैतान सिंह राजपूत का कहना है कि मूंग की MSP खरीद को लेकर सरकार की ओर से गंभीर मिसमैनेजमेंट हुआ है। किसान संघ एक महीने से सरकार को स्थिति से अवगत करा रहा था, लेकिन सरकार किसानों को संतुष्ट करने वाला समाधान नहीं दे सकी। वे कहते हैं कि ग्रीष्मकालीन मूंग को जहरीला बताकर MSP खरीद से बचने की कोशिश की जा रही है।
उनका सवाल है कि आखिर ऐसी कौन-सी खेती बची है जिसमें कीटनाशक या खरपतवारनाशक का उपयोग नहीं होता? मूंग की फसल केवल दो महीने की होती है और इसमें सामान्यतः दो या तीन स्प्रे ही किए जाते हैं, जबकि केला, आम, पपीता, अंगूर और सब्जियों जैसी फसलों में तीन-चार महीने के दौरान कई बार कीटनाशकों का छिड़काव होता है।
वे यह भी कहते हैं कि यदि मूंग को पकाने में उपयोग होने वाले 'सफाया' से कैंसर का खतरा माना जा रहा है, तो यही रसायन प्रदेशभर में किसान खरपतवार नियंत्रण के लिए भी इस्तेमाल कर रहे हैं।
शैतान सिंह राजपूत का आरोप है कि सरकार को केवल बंद कमरे में बैठकर अफसरों की सलाह पर निर्णय नहीं लेना चाहिए, बल्कि खेतों की वास्तविक परिस्थितियों को भी समझना चाहिए।
उनके अनुसार मूंग खरीदी में कटौती की असली वजह बजट की कमी और अन्य प्रशासनिक कारण हैं। उनका आरोप है कि सरकार ने दूसरी योजनाओं पर अधिक खर्च किया और उसका बोझ किसानों पर डाल दिया।
सबसे बड़ा सवाल अभी भी बाकी है...
ग्रीष्मकालीन मूंग को लेकर दो अलग-अलग तस्वीरें सामने हैं। एक तरफ कृषि वैज्ञानिक कुछ रसायनों के उपयोग और उनके संभावित स्वास्थ्य प्रभावों को लेकर चिंता जता रहे हैं। दूसरी ओर किसान और किसान संगठन कहते हैं कि रसायनों का उपयोग केवल मूंग तक सीमित नहीं है, बल्कि अधिकतर फसलों में होता है। उनका मानना है कि केवल मूंग को निशाना बनाना उचित नहीं है।
इसी बीच सरकार ने किसानों के आंदोलन के बाद खरीद का दायरा बढ़ा दिया है, लेकिन ग्रीष्मकालीन मूंग, रसायनों के उपयोग, स्वास्थ्य संबंधी आशंकाओं और सरकारी नीति को लेकर बहस अभी भी जारी है।
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