एमपी में अग्निकांड पर अफसरों की सुस्ती, हर बार देते बस एक ही बहाना...
समझें क्या है पूरा मामला...
- भोपाल में हर साल आग की 1200 से ज्यादा छोटी बड़ी घटनाएं होती हैं।
- हर बार फायर ब्रिगेड आग बुझाती है और पुलिस औपचारिक एफआईआर दर्ज कर लेती है।
- लेकिन जिम्मेदारी तय करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठता है।
- अफसरों का तर्क है कि मध्यप्रदेश में फायर एक्ट लागू नहीं है।
- वहीं मौजूदा कानूनों में ही सख्त कार्रवाई के प्रावधान मौजूद हैं।
भोपाल शहर में आग लगने की खबरें अब आम हो चुकी हैं। कभी बाजार में दुकान जलती है, कभी होटल में शॉर्ट सर्किट होता है। हर घटना के बाद वही सवाल उठता है। आखिर जिम्मेदार कौन है।
फायर ब्रिगेड मौके पर पहुंचती है और आग बुझाती है। पुलिस औपचारिकता के तौर पर एफआईआर दर्ज करती है। लेकिन इसके बाद मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। न भवन मालिक पर कार्रवाई होती है, न सुरक्षा मानकों की समीक्षा होती है।
कानून में पहले से अधिकार
वहीं हैरान कर देने वाली बात है कि अधिकारी अक्सर कहते हैं कि मध्यप्रदेश में अलग से फायर एक्ट न होने की वजह से सख्त कार्रवाई नहीं हो पाती है।
अब अधिकारियों के यह दावे खोखले साबित हुए हैं। मौजूदा कानूनों में अग्नि सुरक्षा को लेकर पहले से ही व्यापक अधिकार दिए गए हैं।
मध्यप्रदेश नगर निगम अधिनियम 1956 की धारा 310 के तहत कोई भवन आग या किसी और वजह से खतरनाक पाया जाए तो उसे खाली कराने या गिराने तक का आदेश दिया जा सकता है। यह अधिकार सीधे निगम के पास है।
वहीं धारा 338 ज्वलनशील सामग्री के भंडारण पर रोक लगाने की शक्ति देती है। वहीं धारा 248 उन व्यापारों को नियंत्रित करने का अधिकार देती है जो जीवन और संपत्ति के लिए खतरनाक हो सकते हैं।
भूमि विकास नियमों के नियम 87 में साफ कहा गया है कि सरकार फायर अथॉरिटी नामित करेगी। हाईराइज भवनों को अनुज्ञा भी इसी अथॉरिटी की क्लीयरेंस के बाद मिलती है।
इसके अलावा नेशनल बिल्डिंग कोड में अग्निशामक यंत्र लगाने से लेकर आग लगने पर लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने तक की पूरी व्यवस्था तय की गई है।
किन भवनों पर लागू नियम
ये सभी नियम खास तौर पर उन भवनों पर लागू होते हैं जो 15 मीटर या उससे अधिक ऊंचे हों। इसके अलावा किसी भी तल पर 500 वर्गमीटर से ज्यादा निर्मित क्षेत्र वाले भवन भी इसके दायरे में आते हैं।
होटल, अस्पताल, शैक्षणिक संस्थान और औद्योगिक भवन भी इस दायरे में शामिल हैं। गोडाउन और विस्फोटक या ज्वलनशील सामग्री रखने वाले परिसर भी इन नियमों के अंतर्गत आते हैं।
बड़ी घटनाएं, कार्रवाई नहीं हुई
पिछले कुछ महीनों में भोपाल में कई बड़ी आग की घटनाएं हुई हैं। हर बार जांच शुरू हुई, लेकिन नतीजा एक जैसा रहा। न किसी पर सख्त कार्रवाई हुई, न जिम्मेदारी तय हुई।
12 जून को हलालपुर क्षेत्र में एक पटाखा दुकान में आग लगी थी। इससे पहले 8 जून को लालघाटी स्थित होटल भोज इन में भी आग लगी थी। होटल की बिल्डिंग की ऊंचाई 15 मीटर से कम होने की वजह से निगम ने कोई कार्रवाई नहीं की।
25 मई को रचना टॉवर में आग लगी थी। गोविंदपुरा थाना प्रभारी अवधेश सिंह तोमर के मुताबिक कोई शिकायतकर्ता सामने नहीं आया, इसलिए एफआईआर दर्ज नहीं हो सकी।
इसके अलावा 15 फरवरी को कस्तूरबा नगर की एक फैक्ट्री में आग लगी थी। इस घटना में पास की बस्ती को खाली कराना पड़ा था। इसके अलावा नवंबर और दिसंबर 2025 में टिंबर मार्केट में भी आग की बड़ी घटनाएं सामने आई थीं।
अफसरों की सफाई अलग अलग
नगर निगम के फायर ऑफिसर सौरभ श्रीवास्तव का कहना है कि वे सिर्फ उन्हीं भवनों पर कार्रवाई कर सकते हैं जिन्हें फायर एनओसी लेना अनिवार्य है। सामान्य भवनों और दुकानों पर सीधी कार्रवाई का अधिकार उनके पास नहीं है।
जिन इलाकों में आग लगी, वहां के थाना प्रभारियों ने बताया कि ऐसे मामलों में आमतौर पर असंज्ञेय अपराध दर्ज किया जाता है। उपलब्ध तथ्यों के आधार पर औपचारिकता पूरी कर मामला बंद कर दिया जाता है। दुकान में लगी भीषण आग
निगम के अपर आयुक्त तरुण वशिष्ठ शर्मा ने भी माना कि मौजूदा प्रावधानों में अधिकार मौजूद हैं। लेकिन फायर ऑफिसर के पास सीधे कार्रवाई की शक्ति नहीं है। इसके लिए वे बिल्डिंग ऑफिसर पर निर्भर रहते हैं। उन्होंने कहा कि इस दिशा में कार्ययोजना बनाई जा रही है।
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