मध्यप्रदेश में वन भूमि डायवर्सन के लिए नया सरकारी एजेंट, वन विकास निगम के कमीशन और दोहरी व्यवस्था पर उठे सवाल
जंगल की जमीन पर निगम का नया राजस्व मॉडल
वन संरक्षण से जुड़ा सरकारी निगम अब परियोजनाओं को सेवाएं देकर अतिरिक्त राजस्व जुटाएगा। निगम वन भूमि हस्तांतरण के मामलों में परामर्शदाता और अभिकर्ता (Consultants and Agents) की भूमिका निभाएगा। इस व्यवस्था में सड़क, रेलवे, बिजली और खनन परियोजनाओं से जुड़ी संस्थाएं सेवाएं ले सकेंगी। इन सेवाओं के बदले मिलने वाला शुल्क निगम की अतिरिक्त आय का स्रोत बनेगा।
वन विभाग में पहले से अधिकारी
वन विभाग में भूमि संबंधी मामलों के लिए पहले से प्रशासनिक व्यवस्था मौजूद है। इन प्रकरणों को संभालने के लिए विभाग में अधिकारी भी नियुक्त हैं। अब निगम को एजेंट बनाने से एक और व्यवस्था जुड़ जाएगी। इससे दोनों संस्थाओं की जिम्मेदारियों और कार्यक्षेत्र को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
मंजूरी की फाइल से आगे बढ़ेगा निगम का कारोबार
जानकारी के अनुसार, निगम की गतिविधियां केवल फाइल संबंधी परामर्श तक सीमित नहीं रहेंगी। वह वन्यजीव प्रबंधन और भूजल संरक्षण की योजनाओं में भी सहयोग करेगा। इन योजनाओं की तैयारी और क्रियान्वयन में निगम की भूमिका रहेगी। खनन से होने वाले नुकसान की भरपाई से जुड़े काम भी इसमें शामिल होंगे। क्षतिपूर्ति वनीकरण की योजनाओं में भी निगम सेवाएं दे सकेगा। इन सेवाओं का शुल्क परियोजनाओं की लागत से सीधे जुड़ सकता है। ऐसे में प्रत्येक सेवा का दायरा और लागत स्पष्ट करना जरूरी होगा। भुगतान की जानकारी सार्वजनिक करने की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण होगी।
विशेष संस्था का दर्जा लेने की तैयारी
वन विकास निगम राज्य सरकार से विशेष संस्था का दर्जा हासिल करने की तैयारी करेगा। जानकारी के अनुसार, इसके लिए भंडार क्रय और सेवा उपार्जन नियमों का सहारा लिया जाएगा। इन नियमों की आरक्षित सूची के तहत निगम को शामिल करने की तैयारी है। इस कदम से सरकारी कामकाज में निगम की अलग संस्थागत पहचान बन सकती है।
निगम बनेगा एजेंट
वन भूमि का गैर-वन उपयोग सामान्य जमीन के उपयोग में बदलाव जैसी प्रक्रिया नहीं है। इसके लिए कानूनी प्रावधानों का पालन करना जरूरी होता है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार, वन भूमि के गैर-वन उपयोग के लिए केंद्र की पूर्व स्वीकृति जरूरी है। ऐसे मामलों में निगम की भूमिका मंजूरी की कानूनी प्रक्रिया से अलग होगी।
अधिकारियों की विशेषज्ञता बनेगी निगम की कमाई का आधार
वन अधिकारियों की विशेषज्ञता को निगम की नई जिम्मेदारी का आधार बताया गया है। उनका अनुभव दस्तावेज तैयार करने और पर्यावरण संबंधी योजनाओं को लागू करने में उपयोगी है। हालांकि, सरकारी विशेषज्ञता का शुल्क लेकर उपयोग करने वाली व्यवस्था में सार्वजनिक निगरानी जरूरी होगी। सेवाएं देने की शर्तें और काम के परिणामों का मूल्यांकन स्पष्ट होना चाहिए। इससे संबंधित संस्थाओं का भरोसा मजबूत हो सकेगा।
राजस्व बढ़ाने की तैयारी, जवाबदेही की तस्वीर अधूरी
मौजूदा जानकारी में शुल्क की दरों और भुगतान की निगरानी का विस्तृत ब्योरा नहीं है। शिकायतों के समाधान की व्यवस्था भी स्पष्ट नहीं है। नई व्यवस्था में वन संरक्षण और राजस्व बढ़ाने की दो जिम्मेदारियां साथ दिखाई देती हैं। वन भूमि से जुड़े मामलों में विकास परियोजनाओं के हित महत्वपूर्ण होते हैं। साथ ही पर्यावरणीय सुरक्षा सुनिश्चित करना भी जरूरी है। निगम की नई भूमिका में पारदर्शिता और जवाबदेही महत्वपूर्ण होगी। इसके लिए शुल्क और कामकाज का पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक करना जरूरी होगा।