झांसी की रानी से आजाद तक, जानें स्वतंत्रता संग्राम में MP के वीरों का अमर इतिहास
Kaushiki | Aug 14, 2026, 16:45 IST
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रीवा का चावल आंदोलनImage credit : Kaushiki
रीवा रियासत और अंग्रेजों द्वारा किसानों पर लगाए गए जबरन टैक्स और जबरदस्ती चावल ले जाने के खिलाफ किसानों ने उग्र प्रदर्शन किया। अपने अधिकारों की इस लड़ाई में त्रिभुवन तिवारी और भैरव प्रसाद शुक्ला जैसे शूरवीर किसानों ने हंसते-हंसते अपने प्राणों का बलिदान दिया। इस आंदोलन ने किसान आंदोलन को सीधे राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ा और दिखाया कि आर्थिक शोषण से मुक्ति ही असली आजादी है।
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राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह का बलिदानImage credit : Kaushiki
गढ़ा-मंडला के गोंडवाना साम्राज्य के राजा शंकर शाह और उनके बेटे रघुनाथ शाह ने अपनी देशभक्ति कविताओं से जनता में क्रांति की अलख जगाई। अंग्रेजों ने उनकी क्रांतिकारी कविताओं से डरकर इस पिता-पुत्र की जोड़ी को सरेआम तोप के मुंह से बांधकर उड़ा दिया था। इस अमर शहादत ने पूरे महाकौशल क्षेत्र में विद्रोह की आग तेज कर दी और कला-साहित्य को आजादी का बड़ा हथियार बनाया।
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एमपी स्वतंत्रता संग्राम का इतिहासImage credit : Kaushiki
मध्य प्रदेश का स्वतंत्रता संग्राम भारत की आजादी का एक बेहद ही महत्वपूर्ण और स्वर्णिम अध्याय रहा है। मालवा से लेकर निमाड़ और गोंडवाना के वीरों ने 1857 की क्रांति से लेकर गांधीजी के जंगल सत्याग्रह तक अंग्रेजों के खिलाफ जमकर लड़ाई लड़ी। आइए आजादी के इस पर्व पर जानें MP के कुछ आंदोलनों का वीर इतिहास।
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चरण पादुका नरसंहार (एमपी का जलियांवाला बाग)Image credit : Kaushiki
14 जनवरी 1931 को छतरपुर के चरण पादुका में उर्मिल नदी किनारे शांतिपूर्ण सभा कर रहे ग्रामीणों पर अंग्रेजों ने अंधाधुंध गोलियां चलाईं। इस भीषण घटना में कई निर्दोष नागरिक शहीद हुए, जिस वजह से इसे 'मध्य प्रदेश का जलियांवाला बाग' भी कहा जाता है। इस त्रासदी ने अंग्रेजों के क्रूर चेहरे को बेनकाब किया और बुंदेलखंड की जनता को राष्ट्रीय आंदोलन से सीधा जोड़ दिया।
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टंट्या भील और भीमा नायक (मध्य प्रदेश के 'रॉबिनहुड')Image credit : Kaushiki
निमाड़ और मालवा के जंगलों से जननायक टंट्या मामा और 'क्रांतिसूर्य' भीमा नायक ने अपनी छापामार (गुरिल्ला) वॉरफेयर से अंग्रेजों को परेशान कर दिया। वे ब्रिटिश सरकार का खजाना लूटकर गरीब और जरूरतमंद आदिवासियों में बांट देते थे, जिससे उन्हें लोकनायक का दर्जा मिला। इनके आंदोलन ने जनजातीय समाज को एकजुट किया और ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ एक बेहद मजबूत स्थानीय क्रांति खड़ी कर दी।
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बोरास का चावल सत्याग्रह (1949 - भोपाल का जलियांवाला)Image credit : Kaushiki
15 अगस्त 1947 को देश आजाद होने के बाद भी भोपाल रियासत का नवाब भारत में विलय के लिए तैयार नहीं हो रहा था। 14 जनवरी 1949 को रायसेन के बोरास में नर्मदा तट पर तिरंगा फहरा रहे युवाओं पर नवाब की पुलिस ने गोलियां चलाकर उन्हें शहीद कर दिया। इस शहादत और भारी जन-दबाव के कारण नवाब को झुकना पड़ा और जून 1949 में भोपाल रियासत का भारत संघ में पूर्ण विलय हुआ।
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चंद्रशेखर आजाद की कर्मभूमि (ओरछा का बीझड़ जंगल)Image credit : Kaushiki
महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद ने ओरछा (निवाड़ी) के जंगलों में 'हरिशंकर ब्रह्मचारी' का छद्म नाम रखकर अज्ञातवास का समय बिताया था। सातार नदी के किनारे अपनी कुटिया बनाकर उन्होंने क्रांतिकारियों को निशानेबाजी की ट्रेनिंग दी और गुप्त गतिविधियों का संचालन किया। ओरछा का यह गुप्त ठिकाना HSRA संगठन का मुख्य केंद्र बना, जहां से पूरे उत्तर भारत में सशस्त्र क्रांति की रणनीति तैयार होती थी।
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रानी लक्ष्मीबाई की अंतिम रणभूमि (ग्वालियर)Image credit : Kaushiki
1857 के संग्राम की नायिका रानी लक्ष्मीबाई ने ग्वालियर के किले और कोटा की सराय में अंग्रेजों के खिलाफ अपना आखिरी युद्ध लड़ा। तात्या टोपे के साथ मिलकर उन्होंने ब्रिटिश सेना को कड़ी टक्कर दी और देश की रक्षा करते हुए ग्वालियर की धरती पर वीरगति पाई। रानी की इस शहादत ने भारतीय युवाओं के दिलों में स्वराज और देशभक्ति की ऐसी आग जलाई जो भारत की आजादी तक जलती रही।
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जंगल सत्याग्रह (1930)Image credit : Kaushiki
गांधीजी के डांडी मार्च से प्रेरित होकर सिवनी (टूरिया) और बैतूल (घोड़ाडोंगरी) के आदिवासियों ने कड़े ब्रिटिश कानूनों के खिलाफ आंदोलन शुरू किया। टूरिया में आदिवासी वीरों ने जंगलों के अधिकारों और देश के स्वाभिमान की रक्षा के लिए बिना डरे अंग्रेजों की गोलियां सीने पर खाईं। इस आंदोलन ने साबित कर दिया कि भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल शहरों तक सीमित नहीं था, बल्कि जनजातीय समाज भी पूरी ताकत से साथ था।
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झंडा सत्याग्रह (1923)Image credit : Kaushiki
1923 में जबलपुर से राष्ट्रीय ध्वज (तिरंगा) फहराने और उसके सम्मान की रक्षा के लिए ऐतिहासिक 'झंडा सत्याग्रह' की शुरुआत हुई थी। जब अंग्रेजों ने तिरंगे का अपमान किया, तो देश भर के क्रांतिकारी जबलपुर और नागपुर में झंडा फहराने के लिए एकजुट हो गए। इस जन-आंदोलन ने तिरंगे को पूरे देश और दुनिया के सामने भारत की आजादी और स्वाभिमान का सबसे बड़ा प्रतीक बना दिया।