MP सरकार की देरी पर हाईकोर्ट नाराज, 10 हजार का केस बना सवाल
समझें क्या है पूरा मामला
- ग्वालियर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को फटकार लगाई।
- मामला 10 हजार रुपए की वसूली से जुड़ा था।
- अपील 461 दिन की देरी से दायर की गई।
- कोर्ट ने देरी माफी आवेदन अस्पष्ट बताया।
- अपील खारिज कर उदासीनता पर टिप्पणी की गई।
क्या था पूरा मामला
मध्यप्रदेश सरकार ने अपने एक कर्मचारी राधामोहन शर्मा से अतिरिक्त भुगतान की वसूली का आदेश दिया था। कर्मचारी ने इसे हाई कोर्ट की एकलपीठ में चुनौती दी। एकलपीठ ने वसूली आदेश को रद्द कर दिया और कर्मचारी के पक्ष में फैसला सुनाया। सरकार को इस फैसले से आपत्ति थी। लेकिन अपील दायर करने में 461 दिन लग गए। खंडपीठ के सामने यही देरी सबसे बड़ा सवाल बन गई।
461 दिन की देरी का कोई जवाब नहीं
जस्टिस जीएस अहलूवालिया और जस्टिस पुष्पेंद्र यादव की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की। अदालत ने देरी माफी के लिए जो आवेदन दिया गया था, उसे पूरी तरह अस्पष्ट बताया। आवेदन में यह भी नहीं लिखा था कि 461 दिन की देरी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई की गई। अदालत ने इसे गंभीर लापरवाही माना।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की भी अनदेखी
खंडपीठ ने एक और अहम बात कही। सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2024 में ऐसे मामलों में स्पष्ट निर्देश दिए थे। एमपी सरकार ने खुद 2018 और चार अप्रैल 2026 को इस बारे में परिपत्र जारी किए थे। इतने सारे निर्देशों और परिपत्रों के बावजूद ऐसे लापरवाही भरे आवेदन दाखिल होते रहते हैं। अदालत ने इस पर हैरानी जताई।
बस 10 हजार ही वसूल होते
सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से एक अहम स्वीकारोक्ति हुई। सरकार ने खुद माना कि एकलपीठ का अधिकांश फैसला सही है।
यह भी कहा कि यदि वसूली का अधिकार भी मान लिया जाए तो वर्ष 2016 के बाद की अवधि के लिए अधिकतम करीब 10 हजार रुपए ही वसूल हो सकते थे। इसकी वजह यह है कि कर्मचारी राधामोहन शर्मा वर्ष 2020 में सेवानिवृत्त हो चुके हैं।
सरकार की उदासीनता पर सख्त टिप्पणी
अदालत ने इस पूरे मामले को राज्य की सुस्त और उदासीन कार्यप्रणाली का जीता-जागता उदाहरण बताया। 10 हजार रुपए की संभावित वसूली के लिए डेढ़ साल से ज्यादा की देरी से अपील दायर करना अदालत को मंजूर नहीं था। खंडपीठ ने देरी माफी का आवेदन और रिट अपील दोनों खारिज कर दिए। सरकारी तंत्र में फाइलें किस रफ्तार से चलती हैं, यह मामला उसकी साफ तस्वीर पेश करता है।
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