सरकारी अस्पतालों की बदलेगी सूरत, मध्यप्रदेश को मिलेंगे 1000 नए डॉक्टर्स
समझें क्या है पूरा मामला...
- मध्य प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की भारी कमी है।
- स्वास्थ्य विभाग ने इस साल पीजी बॉन्डेड डॉक्टरों की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू की है।
- इससे लगभग एक हजार विशेषज्ञ डॉक्टर मिलने की उम्मीद है।
- वहीं देखा जाए तो पिछले अनुभव अच्छे नहीं रहे हैं।
- पिछले साल नियुक्त किए गए डॉक्टरों में से सिर्फ 10 फीसदी ने ही जॉइन किया था।
भोपाल के सरकारी अस्पतालों से लेकर दूर-दराज के गांवों तक डॉक्टरों की कमी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। इसी कमी को दूर करने के लिए स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग ने नई पहल शुरू की है।
बॉन्डेड डॉक्टरों की नई नियुक्ति प्रक्रिया
विभाग ने सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों से पीजी डिग्री पूरी कर चुके डॉक्टरों की नियुक्ति शुरू की है। इसके लिए ऑनलाइन काउंसलिंग कराई जा रही है। डॉक्टरों से पूछा जा रहा है कि वे कहां पदस्थापना चाहते हैं।
हालांकि अंतिम पोस्टिंग पद की उपलब्धता और विभाग की जरूरत के आधार पर ही होगी। इस प्रक्रिया से प्रदेश को लगभग एक हजार विशेषज्ञ डॉक्टर मिलने की उम्मीद जागी है।
वहीं बीते सालों का रिकॉर्ड भरोसा नहीं दिलाता है। आंकड़े बताते हैं कि करीब 60 फीसदी डॉक्टर तय समय पर जॉइन ही नहीं करते हैं। कई मामलों में तो जॉइनिंग टलती रहती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं जाना चाहते डॉक्टर
अनिवार्य बंधपत्र सेवा के तहत स्वास्थ्य विभाग ने साल 2025 में बड़ा आदेश जारी किया था। इसमें एमबीबीएस पूरी कर चुके 1977 डॉक्टर शामिल थे। इसके साथ पीजी पूरी कर चुके 876 डॉक्टरों को भी पदस्थापना दी गई। कुल मिलाकर 2853 डॉक्टरों की पदस्थापना के आदेश दिए गए थे।
जून के आखिरी सप्ताह में ये आदेश जारी हुए थे। साथ ही डॉक्टरों को 15 दिन के भीतर जॉइन करने को कहा गया था, लेकिन नतीजा निराशाजनक रहा।
बता दें कि सिर्फ 10 फीसदी डॉक्टरों ने ही जॉइन किया था। यह भी वे डॉक्टर थे जिन्हें जिला अस्पताल या शहरी क्षेत्रों में नियुक्ति मिली थी।
शहर बनाम गांव की खाई
ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में नियुक्त किए गए ज्यादातर डॉक्टरों ने जॉइन ही नहीं किया। यह आंकड़ा साफ बताता है कि डॉक्टर गांव जाने से बच रहे हैं।
विभाग ने बाद में कई डॉक्टरों को नोटिस भी भेजा था। नोटिस के बाद कुछ डॉक्टर अस्पताल पहुंचे भी। लेकिन वे लंबे समय तक टिके नहीं। कुछ समय बाद ही वे अवकाश पर चले गए।
इस तरह बॉन्डेड डॉक्टरों की नियुक्ति सिर्फ एक औपचारिकता बनकर रह गई है। असली फायदा मरीजों तक नहीं पहुंच पा रहा।
बॉन्ड राशि वसूली में सख्ती नहीं होती
बॉन्ड में डॉक्टरों से 10 से 20 लाख रुपए तक की राशि वसूलने का प्रावधान है। यह राशि तब वसूली जाती है जब डॉक्टर सेवा देने से इनकार करते हैं।
विभाग इसके लिए विधिक कार्रवाई की चेतावनी जरूर देता है। लेकिन हकीकत में यह कार्रवाई शायद ही कभी होती है।
जो डॉक्टर अनिवार्य बंधपत्र सेवा नहीं देते उनका पंजीयन सस्पेंड करने का भी प्रावधान है। इसके लिए भी सिर्फ चेतावनी ही दी जाती रही है।
इसी ढिलाई का नतीजा है कि चेतावनी के बावजूद पिछले साल 40 फीसदी डॉक्टरों ने सेवा के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति की।
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