एमपी में ट्रांसफर सिस्टम बदलने की तैयारी, जरूरत के हिसाब से होंगे तबादले, आज कैबिनेट में लगेगी मुहर!
मध्य प्रदेश सरकार इस बार तबादला नीति को सिर्फ “रूटीन प्रक्रिया” की तरह नहीं, बल्कि प्रशासनिक जरूरतों के हिसाब से री-डिजाइन करने की तैयारी में है।
डॉ. मोहन यादव सरकार की कैबिनेट बुधवार को नई ट्रांसफर पॉलिसी पर फैसला ले सकती है। सामान्य प्रशासन विभाग ने इसका ड्राफ्ट तैयार कर मुख्यमंत्री सचिवालय को भेज दिया है।
इस बार सबसे बड़ा बदलाव यह माना जा रहा है कि “स्वैच्छिक” और “प्रशासनिक” तबादलों को अलग-अलग कैटेगरी में रखा जा सकता है। यानी जो ट्रांसफर सिस्टम अब तक एक ही कोटे में चलता था, वह अब दो हिस्सों में बंट सकता है।
क्यों बदल रही है सरकार ट्रांसफर नीति?
सरकार के सामने सबसे बड़ी समस्या यह रही कि पुराने सिस्टम में जरूरी प्रशासनिक फेरबदल भी सीमित हो जाते थे। क्योंकि स्वैच्छिक, म्युचुअल और प्रशासनिक तबादले एक ही कोटे में शामिल रहते थे।
ऐसे में कई जिलों और विभागों में जरूरत होने के बावजूद कर्मचारी नहीं भेजे जा पाते थे। अब सरकार उसी व्यवस्था को बदलने की तैयारी में है ताकि “जहां जरूरत, वहां पोस्टिंग” वाला मॉडल लागू किया जा सके।
कैबिनेट बैठक टलती रही, अब बुधवार को फैसला संभव
पहले यह प्रस्ताव सोमवार की कैबिनेट बैठक में आने वाला था, लेकिन मंत्रियों की परफॉर्मेंस रिव्यू मीटिंग और निगम-मंडल अध्यक्षों की ट्रेनिंग के कारण बैठक आगे बढ़ गई।
मंगलवार को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव क्षेत्रीय परिषद की बैठक में व्यस्त रहे, जिसकी अध्यक्षता केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने की। इसके बाद अब बुधवार सुबह मंत्रालय में होने वाली कैबिनेट बैठक में ट्रांसफर पॉलिसी को एजेंडे में शामिल किया गया है।
मंत्री विजय शाह की मांग के बाद बदला समीकरण
11 मई की कैबिनेट बैठक में मंत्री विजय शाह ने स्वैच्छिक तबादलों पर लिमिट खत्म करने की मांग उठाई थी। उन्होंने कहा था कि कर्मचारियों को अपनी जरूरत और परिस्थितियों के अनुसार ट्रांसफर का अवसर मिलना चाहिए।
मुख्यमंत्री ने उसी दौरान अधिकारियों को नई नीति पर पुनर्विचार कर प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश दिए थे। अब माना जा रहा है कि उसी चर्चा का असर नए ड्राफ्ट में दिखाई दे सकता है।
नई ट्रांसफर पॉलिसी में क्या-क्या बदल सकता है?
1. स्वैच्छिक और प्रशासनिक तबादले अलग होंगे
अब तक कुल कर्मचारियों के 10 से 15 प्रतिशत तबादलों की सीमा तय रहती थी। नई व्यवस्था में प्रशासनिक और स्वैच्छिक ट्रांसफर के लिए अलग-अलग स्लॉट बनाए जा सकते हैं। इससे जरूरी प्रशासनिक फेरबदल के रास्ते आसान होंगे।
2. जिलों में कलेक्टर और प्रभारी मंत्री की भूमिका बढ़ेगी
तृतीय और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के तबादलों में जिलों के प्रभारी मंत्री और कलेक्टर को अधिक अधिकार दिए जा सकते हैं। प्रभारी मंत्री की मंजूरी के बाद कलेक्टर ट्रांसफर सूची जारी करेंगे।
3. बड़े अधिकारियों के तबादले पर सीएम की अंतिम मुहर
प्रथम श्रेणी अधिकारियों के तबादले बिना मुख्यमंत्री की मंजूरी के नहीं हो सकेंगे। यानी वरिष्ठ अफसरों के मामलों में अंतिम फैसला सीएम स्तर पर ही रहेगा।
4. एक साल के भीतर दोबारा ट्रांसफर पर रोक
ड्राफ्ट के मुताबिक, जिन कर्मचारियों का पिछले एक साल में तबादला हो चुका है, उन्हें सामान्य परिस्थितियों में दोबारा शिफ्ट नहीं किया जाएगा। इस कदम को “स्थिर प्रशासन” की दिशा में बड़ा संकेत माना जा रहा है।
5. ऑनलाइन आवेदन से होगी पूरी प्रक्रिया
सरकार ट्रांसफर प्रक्रिया को डिजिटल मोड में आगे बढ़ाने की तैयारी में है। सभी विभागों से ऑनलाइन आवेदन लिए जा सकते हैं ताकि प्रक्रिया ज्यादा पारदर्शी बन सके।
स्कूल शिक्षा विभाग की नीति फिर अलग रह सकती है
हर साल की तरह इस बार भी स्कूल शिक्षा विभाग अपनी अलग ट्रांसफर पॉलिसी ला सकता है। इसके अलावा जनजातीय कार्य, राजस्व और ऊर्जा विभाग भी अलग दिशा-निर्देश जारी कर सकते हैं। हालांकि, इन विभागों की नीतियां सामान्य प्रशासन विभाग के मूल नियमों से बाहर नहीं होंगी।
कर्मचारियों के लिए क्या संकेत?
सरकार का फोकस इस बार “सिर्फ तबादले” नहीं, बल्कि “प्रशासनिक बैलेंस” बनाने पर दिख रहा है।
यदि नई व्यवस्था लागू होती है तो विभागों में स्टाफ की जरूरत के हिसाब से पोस्टिंग आसान हो सकती है। साथ ही, राजनीतिक और स्वैच्छिक दबाव के बीच प्रशासनिक जरूरतों को अलग पहचान देने की कोशिश भी साफ दिखाई दे रही है।
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