एमपी में सरकारी योजनाओं ने बढ़ाई बैंकों की मुसीबत, 2100 करोड़ रुपए डूबे
मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री के नाम पर चल रही स्वरोजगार और आवास योजनाओं की हालत अब ठीक नहीं रही है। सरकार और बैंकों के 25 मार्च को जारी किए गए ताजे आंकड़े चौंकाने वाले हैं।
वहीं, जिन योजनाओं को शुरू में युवाओं और गरीबों का सहारा बनना था, अब वे बैंकों के लिए सिरदर्द बन चुकी हैं। सीएम ग्रामीण आवास मिशन में तो बकाया राशि का 67.9% हिस्सा अब एनपीए (Non-Performing Asset - NPA या डूबत कर्ज) हो चुका है। ये राशि लगभग एक हजार 670 करोड़ रुपए है।
वसूली के मामले में बैंकों को मुश्किलें
मुख्यमंत्री उद्यम क्रांति योजना और मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना का भी यही हाल है। इन योजनाओं के लक्ष्यों की प्राप्ति तो 127% दिख रही है, लेकिन वसूली के मामले में बैंकों को काफी मुश्किलें आ रही हैं।
इन योजनाओं में 422 करोड़ रुपए एनपीए यानी डूबे हुए कर्ज के रूप में बदल चुके हैं। वहीं मुख्यमंत्री ग्रामीण आवास मिशन में पांच साल में एनपीए 21% तक बढ़ गया है। कुल मिलाकर ग्रामीण आवास और स्वरोजगार योजनाओं में करीब 2100 करोड़ रुपए एनपीए में फंसे हुए हैं।
खातों को बंद नहीं कर पा रही बैंक
सीएम ग्रामीण आवास योजना में एनपीए पांच साल में 46% से बढ़कर 68% तक पहुंच गया है। बैंकों का कहना है कि सरकार से किए गए एक MOU (समझौते) की वजह से वे इन खातों को बंद नहीं कर पा रहे हैं। साथ ही वन टाइम सेटलमेंट भी नहीं कर पा रहे हैं।
वहीं विमुक्त, घुमंतू और अर्धघुमंतू वर्ग के लिए स्वरोजगार योजनाओं में सिर्फ 11.8% ही उपलब्धि मिल पाई है। इसका मतलब यह है कि बैंकिंग सुविधाएं अब भी इस वर्ग तक सही से नहीं पहुंच पाई हैं। इस योजना में एक से 10 लाख तक का लोन दिया जाता है।
टंट्या मामा आर्थिक कल्याण योजना
टंट्या मामा आर्थिक कल्याण योजना में आधे से ज्यादा आवेदन पेंडिंग पड़े हुए हैं। इस स्कीम में पांच हजार के लक्ष्य के मुकाबले सिर्फ दो हजार 743 आवेदन मंजूर हुए हैं। इस योजना में अजजा वर्ग को 10 हजार से लेकर एक लाख तक का कर्ज 7% ब्याज पर अनुदान के साथ मिलता है।
जन-धन खाते का क्या हाल
मध्यप्रदेश में मार्च 2026 तक 4 करोड़ 66 लाख जनधन खाते खोले जा चुके हैं, जबकि 2015 में ये संख्या सिर्फ एक करोड़ 19 लाख थी। इन खातों में कुल 18 हजार 318 करोड़ जमा हैं। यानी हर खाते में औसतन तीन हजार 931 हैं, जो 2015 के 445 रुपए के मुकाबले काफी ज्यादा है।
ग्रामीण क्षेत्रों में 61% खाते हैं। इनमें भी महिलाएं 55% के साथ पुरुषों से आगे हैं। रिपोर्ट बताती है कि जीरो बैलेंस वाले खातों की संख्या आधी हो गई है। दस साल पहले 86 लाख जीरो बैलेंस खाते थे। अब ये घटकर 43 लाख हो गए हैं।
सबसे ज्यादा 17 लाख आठ हजार खाते सागर में हैं जहां 680 करोड़ नौ लाख रुपए जमा हैं।
रिपोर्ट के अनुसार पुरुषों और कंपनियों के मुकाबले ग्रामीण महिलाएं कर्ज चुकाने में कहीं ज्यादा ईमानदार साबित हुई हैं। महिला स्व सहायता समूहों को तीन हजार 570 करोड़ रुपए का वितरण किया गया, लेकिन उनका एनपीए (डूबा हुआ कर्ज) सिर्फ 2.4% है।
सरकारी योजनाओं का पूरा बोझ सरकारी बैंकों पर है, जो अपने लक्ष्यों से 300% ज्यादा काम कर रहे हैं। वहीं बड़े निजी बैंक जैसे HDFC Bank(10%), ICICI Bank(11%), और एक्सिस (8%) सरकारी प्राथमिकताओं को नजरअंदाज कर रहे हैं।
रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि केंद्र सरकार की योजनाएं (केंद्र की योजनाएं) मध्य प्रदेश में बेहतर तरीके से काम कर रही हैं। इनमें पीएम स्वनिधि और पीएम विश्वकर्मा योजनाजैसी योजनाएं शामिल हैं।
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