MP के सरकारी स्कूलों में खरीदी का खेल! पैसा छात्रों का, दुकान अफसरों की पसंद की! किसकी मेहरबानी?

Atul Dwivedi | Oct 30, 2026, 20:14 IST
निजी स्कूलों के बाद सरकारी स्कूलों में भी खास दुकान का खेल?
The procurement game in MP’s government schools: The funds belong to the students, but the shops are chosen by the officials! Find out whose patronage allows this scam to flourish.
अक्सर ये आरोप लगते हैं कि निजी स्कूल एक खास दुकान से किताबें और ड्रेस लेने का दबाव डालते हैं। इन दुकानों और स्कूलों की शिकायतें जब सामने आती हैं, तब प्रशासन कार्रवाई करने का दावा भी करता है। लेकिन जब सिस्टम में बैठे लोग ही तय कर दें कि किस दुकान से छात्रों के लिए सामान लिया जाएगा, तो जाहिर है विवाद होगा ही।

विवाद और बड़ा तब हो जाता है जब स्कूल सरकारी हो और सामान का पैसा छात्रों से ही लिया जाए। ऐसा ही एक मामला मध्य प्रदेश से सामने आया है, जहां एक खास दुकान से सामान लेने का आदेश कुछ जिला शिक्षा अधिकारियों ने जारी किया था। इस पूरे मामले की द सूत्र ने पड़ताल की, हमने जिम्मेदारों से भी बात की और जाना कि आखिर ऐसी नौबत क्यों आई?



मामला कैसे शुरू हुआ?

मामले की शुरुआत लोक शिक्षण संचालनालय के एक आदेश से हुई है। डीपीआई ने आदेश में कहा कि 10 महीने के लिए जूनियर रेडक्रॉस शुल्क छात्रों से लेने का प्रावधान है। जूनियर रेडक्रॉस के लिए स्थानीय स्तर पर ड्रेस तैयार की जाएगी। बाकी सामान जिनमें कैप, स्कार्फ और डायरी जैसी चीजें शामिल हैं, वो रेडक्रॉस भवन शिवाजी नगर से ली जा सकती हैं। बस यहीं से सारा खेल शुरू हुआ था। इसके बाद 10 सितंबर 2025 को रेडक्रॉस सोसाइटी भोपाल ने एक आदेश निकाला था। इस आदेश में साफ लिखा था कि जूनियर रेडक्रॉस के लिए जो सामान खरीदा जाए, वो खुशी एंटरप्राइज से लिया जाए।



रेडक्रॉस का आदेश

रेडक्रॉस ने अपने आदेश में हवाला दिया कि पहले सारा सामान खरीदने के लिए, स्कूलों को रेडक्रॉस की राज्य शाखा आना पड़ता था। सभी स्कूलों के लिए ऐसा करना आसान नहीं था। फिलहाल रेडक्रॉस के पास सामान मौजूद भी नहीं है। इसलिए खुशी एंटरप्राइज से सामान लिया जाए। रेडक्रॉस ने अपने आदेश में ये भी लिखा कि खुशी एंटरप्राइज का सामान उच्च गुणवत्ता का है। इसलिए जो दरें तय की गई हैं, इन्हीं दरों पर सामान की खरीद की जा सकती है।



जूनियर रेडक्रॉस क्या है?

जूनियर रेडक्रॉस, रेडक्रॉस सोसाइटी की ही एक शाखा है, जो स्कूलों और कॉलेजों के स्तर पर संचालित की जाती है। शासकीय, अशासकीय, हाईस्कूल, उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, मॉडल स्कूल और सांदीपनी स्कूलों में भी जूनियर रेडक्रॉस की स्थापना की जाती है। इसकी स्थापना का मकसद साफ है, छात्रों के मन में अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा की ऐसी भावना विकसित करना जिससे वो एक जिम्मेदार नागरिक बन सकें। ऐसे नागरिक जो मुसीबत के वक्त दूसरों की मदद के लिए तैयार रहें।



डीपीआई का आदेश

विवाद क्यों है?

विवाद की सबसे बड़ी वजह कुछ चुनिंदा जिलों में ही खुशी एंटरप्राइज से सामान की खरीदी है। रेडक्रॉस सोसाइटी के इस आदेश के बाद, अनूपपुर, उमरिया, पन्ना, बालाघाट, शहडोल और सिंगरौली के जिला शिक्षा अधिकारियों ने भी एक आदेश जारी किया। इन अधिकारियों ने अपने आदेश में बताया कि छात्र-छात्राओं से रेडक्रॉस के नाम पर जो फीस ली जाती है, उसका इस्तेमाल किसी और मद में हो रहा है। इसलिए रेडक्रॉस सोसाइटी की तरफ से अनुशंसित खुशी एंटरप्राइज से सामान खरीदा जाए। लेकिन सवाल उठ रहे हैं कि जब फीस छात्र-छात्राओं से ली जा रही है, तो सामान एक निश्चित दुकान से क्यों खरीदा जा रहा है?



अनूपपुर और शहडोल के डीईओ का आदेश

आदेश में खुशी एंटरप्राइज के दो पते दर्ज हैं। एक पता खरगोन का है, जबकि दूसरा पता भोपाल का है। यानी खुशी एंटरप्राइज की दुकान पूरे मध्य प्रदेश में नहीं है। जिन जिलों में इसकी दुकानें नहीं हैं, वहां कैंप लगाकर ये सामान बेच रही है। इन्हीं कैंप्स में जाकर सरकारी स्कूलों के प्राचार्यों को सामान खरीदना है। विवाद की वजह ये भी है कि जब सामान का पैसा छात्र-छात्राओं से लिया जा रहा है, तो छात्रों को किसी भी दुकान से सामान लेने की आजादी क्यों नहीं है? क्यों रेडक्रॉस सोसाइटी और जिला शिक्षा अधिकारी खुशी एंटरप्राइज से ही सामान लेना चाहते हैं? और वो भी सिर्फ कुछ चुनिंदा जिलों में?



द सूत्र ने कुछ और जिलों में पड़ताल की। हमने ग्वालियर में पता किया कि क्या वहां भी खुशी एंटरप्राइज से सामान लेने का आदेश स्कूलों के प्राचार्यों को दिया गया है? तो इसका जवाब हमें ना में मिला। यानी वहां किसी भी दुकान में जाकर जूनियर रेडक्रॉस के लिए सामान खरीदा जा सकता है। वहां ऐसी कोई शर्त जिला शिक्षा अधिकारी की तरफ से नहीं रखी गई है, न ही ऐसा कोई आदेश जारी हुआ है।



उमरिया और पन्ना के डीईओ का आदेश

टेंडर प्रक्रिया नहीं!

मामले का एक पहलू ये भी है कि इस पूरी प्रक्रिया में, टेंडर प्रक्रिया को लेकर संदेह है। क्योंकि टेंडर प्रक्रिया होती तो सामान सीधा विभाग खरीदता, न कि स्कूलों को सामान खरीदने की छूट दी जाती है। स्कूल शिक्षा विभाग टेंडर जारी करता, वेंडर्स बिड लगाते और बिड जीतने वाली फर्म सीधे विभाग को सामान की सप्लाई करती है। इसके बाद शिक्षा विभाग उस सामान को स्कूलों तक पहुंचाता है।



बालाघाट के डीईओ का आदेश

रेडक्रॉस ने क्या कहा?

मामले में जानकारी के लिए द सूत्र ने रेडक्रॉस सोसाइटी भोपाल के जनरल सेक्रेटरी से बात करने की कोशिश की। हम उनके दफ्तर गए लेकिन वो मौजूद नहीं थे। इसके बाद हमने रेडक्रॉस के चेयरमैन डॉ. श्याम कुमरे से संपर्क किया। उनका कहना था कि ऐसा तो नहीं होना चाहिए। ये आदेश कब निकला उन्हें जानकारी नहीं है। जनरल सेक्रेटरी ही कुछ बता पाएंगे।



मामले में द सूत्र ने खुशी एंटरप्राइज से भी बात की। हमने पूछा कि क्या इस काम के लिए उन्हें टेंडर मिला है? तो उनका कहना था कि हां उन्हें टेंडर मिला है। खुशी एंटरप्राइज ने कैंप लगाकर सामान देने की बात भी स्वीकार की।



लेकिन यहां सवाल यही है कि अगर खुशी एंटरप्राइज को टेंडर मिला, तो क्या टेंडर सिर्फ कुछ चुनिंदा जिलों के लिए मिला? जबकि लोक शिक्षण संचालनालय और रेडक्रॉस ने आदेश तो सभी जिलों के जिला शिक्षा अधिकारियों के लिए दिया था। ऐसे में कुछ जिलों में सामान कहीं और से जबकि कुछ जिलों में सामान सिर्फ खुशी एंटरप्राइज से क्यों लिया जा रहा है?



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