जब तक नया राज्यपाल नहीं आता, तब तक मौजूदा पद पर बने रहेंगे मंगूभाई पटेल, HC ने खारिज की याचिका
समझें क्या है पूरा मामला...
- मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्यपाल को हटाने की याचिका खारिज कर दी है।
- याचिका में नए राज्यपाल की नियुक्ति की मांग की गई थी।
- रिटायर्ड प्रोफेसर डॉ. एमए खान ने यह याचिका दायर की थी।
- कोर्ट ने कहा, नया उत्तराधिकारी आने तक राज्यपाल पद पर रहेंगे।
- जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बीपी शर्मा की बेंच ने फैसला सुनाया।
क्या था पूरा विवाद
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर हुई थी। इसमें राज्य में नए राज्यपाल की नियुक्ति की मांग की गई थी। यह याचिका जबलपुर के जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय के रिटायर्ड प्रोफेसर डॉ. एमए खान ने दायर की थी। उनका कहना था कि मौजूदा राज्यपाल मंगूभाई पटेल का कार्यकाल पूरा हो चुका है।
याचिकाकर्ता ने कोर्ट से मांग की थी कि राज्यपाल को तुरंत पद से हटाया जाए। उनका तर्क था कि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को अस्थायी तौर पर राज्यपाल का प्रभार दिया जाए। यह मामला जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बीपी शर्मा की डिवीजन बेंच के सामने आया।
याचिकाकर्ता की दलील
याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क था कि राज्यपाल का पांच साल का कार्यकाल खत्म हो चुका है। इसलिए उनके मुताबिक राज्यपाल को अब पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने कोर्ट से मांग की कि इस पद को तुरंत खाली कराया जाए।
वहीं, सुनवाई के दौरान बेंच ने इस दलील पर सहमति नहीं जताई। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ कार्यकाल पूरा होने से कोई संवैधानिक पद अपने आप खाली नहीं हो जाता। इसके लिए संविधान में साफ प्रावधान दिए गए हैं।
कोर्ट ने क्यों उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान जस्टिस आनंद पाठक की बेंच ने याचिकाकर्ता की योग्यता पर भी सवाल उठाए। हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता ने अपनी सामाजिक साख और जनहितकारी पृष्ठभूमि का खुलासा नहीं किया था।
कोर्ट के मुताबिक मध्य प्रदेश हाईकोर्ट नियम, 2008 के तहत जनहित याचिका दायर करने के लिए यह जानकारी देना जरूरी होता है। इसे कानूनी भाषा में बोना फाइड्स (Bona fides) कहा जाता है। याचिकाकर्ता इस शर्त को पूरा नहीं कर सके।
इस वजह से कोर्ट ने शुरुआत में ही याचिका की गंभीरता पर सवाल खड़े किए। बेंच का मानना था कि बिना पूरी जानकारी के ऐसी संवेदनशील याचिका पर विचार करना उचित नहीं है।
अनुच्छेद 156 में क्या लिखा है
मामले के संवैधानिक पहलू पर विचार करते हुए कोर्ट ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 156(3) का जिक्र किया। इस अनुच्छेद के मुताबिक राज्यपाल का सामान्य कार्यकाल पांच साल का होता है।
वहीं, इसी अनुच्छेद में एक जरूरी परंतुक (Proviso) भी जोड़ा गया है। इस परंतुक में साफ लिखा है कि कार्यकाल पूरा होने के बाद भी राज्यपाल तब तक पद पर बने रहेंगे, जब तक उनका उत्तराधिकारी पदभार नहीं संभाल लेता।
कोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान जानबूझकर बनाया गया है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि राज्य में कभी भी संवैधानिक शून्य की स्थिति पैदा न हो। अगर राज्यपाल का पद खाली रह जाए तो कई सरकारी कामकाज प्रभावित हो सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का हवाला
अपने फैसले को मजबूत आधार देने के लिए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का हवाला दिया। यह फैसला कृष्णा बल्लभ सहाय बनाम जांच आयोग मामले में 1969 में आया था।
उस मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने यही माना था कि संवैधानिक व्यवस्था में राज्यपाल का पद खाली नहीं छोड़ा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने तब स्पष्ट किया था कि कार्यकाल खत्म होने के बाद भी राज्यपाल का कार्यभार संभालना पूरी तरह वैध होता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि यह फैसला आज भी उतना ही प्रासंगिक है। कोर्ट ने इसे अपने आदेश का आधार बनाया।
कोर्ट का अंतिम फैसला
इन सभी तर्कों और कानूनी प्रावधानों पर विचार करने के बाद बेंच ने अपना फैसला सुनाया। कोर्ट ने याचिका को विचार योग्य नहीं माना और इसे खारिज कर दिया।
बेंच ने अपने आदेश में साफ लिखा कि संविधान खुद इस बात की गारंटी देता है। राज्य का सबसे बड़ा संवैधानिक पद किसी भी हालत में खाली नहीं रह सकता। कोर्ट ने कहा कि जब तक नया राज्यपाल कार्यभार नहीं संभाल लेता, मौजूदा राज्यपाल पूरी वैधता के साथ पद पर बने रहेंगे।
इस फैसले से यह भी साफ हो गया कि सिर्फ कार्यकाल पूरा होने के आधार पर कोई भी व्यक्ति संवैधानिक पद पर सीधे सवाल नहीं उठा सकता। कोर्ट ने इस मामले को कानूनी और संवैधानिक दोनों नजरिए से पूरी तरह स्पष्ट कर दिया।
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