एमपी के गेस्ट फैकल्टी परेशान, मिनिमम पे स्केल की मांग तेज, शिक्षा विभाग की कमेटी के फैसले का इंतजार
News in short
- 25 साल सेवा के बाद भी अनिश्चित भविष्य।
- मिनिमम पे स्केल से वंचित अतिथि विद्वान।
- अभी तक हरियाणा नीति लागू नहीं हुई है।
- 2000 रुपए प्रतिदिन पर काम करने को मजबूर।
- पुरानी भर्ती न होने से उम्र निकल गई।
News in Detail
मध्यप्रदेश में अतिथि विद्वानों की स्थिति लगातार चिंताजनक बनी हुई है। हरियाणा नीति लागू करने की घोषणा के 100 दिन बाद भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
मिनिमम पे स्केल और स्थायी भविष्य की मांग लंबे समय से जारी है। बावजूद इसके, सरकार की चुप्पी ने हजारों युवाओं को असमंजस में डाल दिया है। यह मुद्दा अब बड़ा सामाजिक और शैक्षणिक सवाल बन चुका है।
गेस्ट फैकल्टी में नाराजगी
मध्यप्रदेश में अतिथि विद्वानों का मुद्दा गंभीर बन गया है। वहीं सरकार पर सवाल उठ रहे हैं। जनवरी 2026 में नीति लागू करने का आश्वासन दिया गया था।
उच्च शिक्षा विभाग ने हरियाणा मॉडल अपनाने की बात कही गई थी। इसके लिए बनी समिति 100 दिन बाद भी कोई ठोस निर्णय नहीं हुआ। इससे अतिथि विद्वानों में नाराजगी लगातार बढ़ रही है।
मिनिमम पे स्केल बना समस्या
अतिथि विद्वानों को उचित वेतन नहीं मिल रहा है। यूजीसी का मिनिमम पे स्केल 57 हजार 700 रुपए तय है। लेकिन उन्हें ये वेतन नहीं मिल रहा है। वे सिर्फ 2000 रुपए प्रतिदिन पर काम कर रहे हैं। इन्हें 25 दिन से ज्यादा का भुगतान भी नहीं मिलता। वहीं छुट्टी लेने पर या वर्किंग डे कम होने पर मानदेय काट लिया जाता है।
भर्ती की संख्या भी घटी
वर्ष 2017 से पहले भर्ती नहीं निकाली गई थी। इससे कई योग्य उम्मीदवारों की उम्र निकल गई। दो दशकों तक अवसर नहीं मिलने से नुकसान हुआ। नई भर्तियों में पुराने उम्मीदवार पीछे रह गए। अब उनकी जगह नए उम्मीदवार आ रहे हैं। इससे उनका भविष्य और अधिक संकट में है।
सरकार की भूमिका पर सवाल
2023 में पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान ने पंचायत करके गेस्ट फैकल्टी को आश्वासन दिया था। ये घोषणाएं सिर्फ आश्वासन तक सिमट कर रह गई हैं। सरकार स्थायी समाधान नहीं हो सका। मौजूदा उच्च शिक्षा मंत्री इंदिर सिंह परमार की घोषणा भी हरियाणा पॉलिसी की रिपोर्ट के इंतजार में उलझकर रह गई है।
अतिथि विद्वान कर रहे मांग
अतिथि विद्वान लंबे समय से संघर्ष कर रहे हैं।वे नियमितीकरण की मांग कर रहे हैं। वे मिनिमम पे स्केल और प्राध्यापकों को मिलने वाले लाभ चाहते हैं। उनका कहना है कि उनसे नियमित काम तो लिया जाता है लेकिन सुविधाएं वैसी नहीं मिल रहीं।
सता रही भविष्य की चिंता
अतिथि विद्वानों का भविष्य असुरक्षित बना हुआ है। गेस्ट फैकल्टी की मांग उठा रहे अतिथि विद्वान संघर्ष मोर्चा के डॉ. सुरजीत सिंह भदौरिया और शंकरलाल खरवाडिया ने हरियाणा पॉलिसी पर स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है।
उनका कहना है वे ढाई दशक से काम कर रहे हैं। अब तक उन्हें यूजीसी के अनुसार न्यूनतम पे स्केल और दूसरे लाभ नहीं मिले। उनका भविष्य अब भी सुरक्षित नहीं है जबकि सरकार को इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए।
FAQ
- अतिथि विद्वान मिनिमम पे स्केल क्यों नहीं मिल रहा?
अतिथि विद्वानों को यूजीसी द्वारा निर्धारित मिनिमम पे स्केल नहीं दिया जा रहा है। सरकार उन्हें अस्थायी कर्मचारी मानती है। इस कारण वे नियमित लाभों से वंचित रहते हैं। यह समस्या लंबे समय से बनी हुई है। - हरियाणा नीति क्या है और क्यों जरूरी है?
हरियाणा नीति में अतिथि विद्वानों को नियमित कर्मचारियों जैसे लाभ मिलते हैं। इसमें वेतन, सुरक्षा और अन्य सुविधाएं शामिल हैं। मध्य प्रदेश में इसे लागू करने की मांग इसलिए बढ़ रही है। - मध्य प्रदेश में अतिथि विद्वानों का भविष्य क्या है?
अगर हरियाणा नीति लागू होती है तो भविष्य सुरक्षित हो सकता है। लेकिन अभी तक कोई ठोस फैसला नहीं हुआ है। इससे हजारों अतिथि विद्वानों का करियर अनिश्चित बना हुआ है।
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