MP Teacher Recruitment: मध्यप्रदेश सरकार को शिक्षक तो चाहिए, लेकिन नियमित भर्ती से परहेज क्यों?
लेकिन दूसरी तरफ शिक्षा विभाग में ही नियुक्ति मांग रहे वेटिंग शिक्षकों की सुनने वाला कोई नहीं है। वेटिंग शिक्षक लगभग 45 दिनों से भोपाल में आंदोलन कर रहे हैं। पहले नीलम पार्क और फिर लोक शिक्षण संचालनालय के बाहर ये लोग जमे हुए हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब सरकार के पास 5 हजार 329 करोड़ जैसा भारी-भरकम फंड अतिथि शिक्षकों के मानदेय के लिए है, तो फिर सरकार नियमित भर्तियां क्यों नहीं करती? आखिर नियमित भर्तियां करने में दिक्कत क्या है?
स्कूलों में शिक्षकों की जरूरत
76 हजार अतिथि शिक्षकों (MP Guest Teachers) से सेवाएं लेने का सीधा मतलब यही निकलता है कि सरकार को शिक्षकों की जरूरत है। UDISE+ के आंकड़े बताते हैं कि फिलहाल मध्यप्रदेश में लगभग 92 हजार सरकारी स्कूल हैं। स्कूल शिक्षा विभाग को 38 हजार करोड़ का भारी-भरकम बजट भी दिया गया है। विधानसभा और शिक्षा विभाग के आंकड़े बताते हैं कि शिक्षकों के 2 लाख 87 हजार 455 पद स्वीकृत हैं, जिसमें से लगभग 73 हजार पद खाली हैं। इन्हीं खाली पदों पर व्यवस्था बनाए रखने के लिए राज्य में अतिथि शिक्षक सेवाएं दे रहे हैं।
फिर नियमित भर्ती क्यों नहीं?
खर्च में कटौती: नियमित पदों पर शिक्षकों की भर्ती करने का मतलब है शिक्षकों को महंगाई भत्ता, मकान किराया, परिवहन भत्ता और समयमान वेतनमान जैसी सुविधाओं का फायदा देना। यानी सरकारी खजाने पर लगातार भार बढ़ेगा। जबकि अतिथि शिक्षकों को सिर्फ मानदेय मिलता है। मानदेय भी पूरे साल नहीं दिया जाता।
अवकाश सुविधाएं: सरकारी शिक्षक को सरकार सीएल, ईएल, मेडिकल लीव और 180 दिनों का मातृत्व अवकाश भी देती है। यानी इस दौरान शिक्षक मौजूद नहीं भी है, तब भी उसकी सैलरी नहीं काटी जा सकती। जबकि अतिथि शिक्षकों के मामले में सिर्फ सीमित आकस्मिक अवकाश यानी सीएल की सुविधा है।
सामाजिक सुरक्षा से बचना: क्योंकि नियमित शिक्षकों को रिटायरमेंट के बाद पेंशन और ग्रेच्युटी जैसी सुविधाओं का भी फायदा देना पड़ता है। रिटायरमेंट के बाद एक भारी-भरकम रकम भी शिक्षक को दी जाती है। जाहिर है, इस खर्च से भी सरकार बचना चाहती है, क्योंकि अतिथि शिक्षकों के लिए पेंशन और ग्रेच्युटी जैसी कोई सुविधा नहीं है। साथ ही अगर किसी सरकारी कर्मचारी की आकस्मिक मृत्यु हो जाए, तो उसके परिवार में किसी को अनुकंपा नियुक्ति देने का भी प्रावधान है। जबकि अतिथि शिक्षक जो सेवा देते हैं, वहां अनुकंपा नियुक्ति लागू नहीं होती है।
कौन क्या बोला?
UDISE प्रणाली को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले, पूर्व प्रोफेसर और शैक्षिक प्रबंधन सूचना प्रणाली (EMIS) विभाग के प्रमुख रहे अरुण सी. मेहता से द सूत्र ने बात की। उनका कहना है कि सरकार अपनी जिम्मेदारी से भाग रही है। एक रेगुलर टीचर की जगह चार अतिथि टीचर लग जाते हैं। मगर रेगुलेटरी बॉडी क्या कर रही हैं? क्या समग्र शिक्षा के प्रोग्राम अप्रूवल बोर्ड ने भी आंखें मूंद ली हैं?
भोपाल में लोक शिक्षण संचालनालय के बाहर आंदोलन कर रहे वेटिंग शिक्षकों से द सूत्र ने बात की। एक उम्मीदवार इशांत श्रीवास्तव ने बताया कि अतिथि शिक्षकों की व्यवस्था तो इसलिए की गई थी, क्योंकि जल्दी भर्ती पूरी नहीं हो पाती। छात्रों की पढ़ाई प्रभावित न हो, इसलिए अस्थायी तौर पर अतिथि शिक्षकों की व्यवस्था की गई थी। लेकिन सरकार ने अब इस व्यवस्था को नियमित कर लिया है। सरकार कम पैसों में काम कराना चाहती है। इसलिए अब धीरे-धीरे अतिथि शिक्षकों की संख्या बढ़ रही है।
खुश अतिथि शिक्षक भी नहीं
सरकार भले ही स्कूलों में अतिथि शिक्षकों से सेवाएं ले रही है, लेकिन अतिथि शिक्षक भी सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगा चुके हैं। इनकी सबसे बड़ी मांग नियमितीकरण की है। भोपाल में आंदोलन के दौरान इनका आरोप था कि सरकार अपने वादे से मुकर गई। नियमित शिक्षकों की तरह अतिथि शिक्षक भी सरकार से सुविधाएं चाहते हैं, लेकिन वो मामला भी फिलहाल ठंडे बस्ते में ही पड़ा हुआ है।