मप्र का हैपीनेस इंडेक्स : खुशहाली का पैरामीटर तय नहीं कर पाई मप्र सरकार 8 साल में
भारत में अनूठा आनंद विभाग बनाकर देश भर में वाहवाही लूटने वाला मध्यप्रदेश अपने घर में ही खुशहाली का पैमाना नहीं ढूंढ पाया। यह बात थोड़ी हैरान करने वाली है।
2018 में हुई थी शुरुआत
राज्य के आनंद संस्थान ने साल 2018 में आईआईटी खड़गपुर से करार किया था। मकसद था कि जीडीपी की तर्ज पर मप्र का 'हैपीनेस इंडेक्स'(Happiness Index in Madhya Pradesh) तैयार किया जाए। यह इंडेक्स बताता कि प्रदेश के लोग कितने खुश हैं और उनकी जिंदगी की गुणवत्ता कैसी है।
आईआईटी खड़गपुर के 'हैपीनेस एंड वेल बीइंग (Happiness and Well Being)' विभाग के कुछ विशेषज्ञों ने अलग-अलग डोमेन के हिसाब से प्रश्नावली तैयार की। सर्वे भी शुरू हुआ, लेकिन डाटा का विश्लेषण नहीं हो पाया और रिपोर्ट अधूरी रह गई।
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इच्छाशक्ति नहीं दिखाई सरकार ने
मप्र सरकार इस असमंजस में पड़ गई कि गांव और शहरों में गहन सर्वे के लिए आईआईटी विशेषज्ञों पर ही भरोसा करें या फिर किसी नई एजेंसी को 'हायर' किया जाए। यह फैसला अटका रहा और काम आगे नहीं बढ़ा।
'खुशहाली का पैमाना' ढूंढने में सियासी और प्रशासनिक बाधाएं आती रहीं। इच्छाशक्ति की कमी भी आड़े आई। नतीजा यह हुआ कि 8 साल की कवायद के बाद भी रिपोर्ट का एक पन्ना भी सामने नहीं आया।
आनंद संस्थान के निदेशक सत्य प्रकाश आर्य का कहना है कि देश में शासकीय स्तर पर ऐसा सर्वे अभी तक नहीं हुआ है। आर्य के मुताबिक जीवन की खुशी और आनंद का भाव सबके लिए अलग-अलग होता है। यह सबके लिए अंतर्मन का भाव है। इसीलिए इस काम में साइंटिफिक मेथडोलॉजी (Scientific Methodology) से निष्कर्ष तक पहुंचना जरूरी है।
इन सवालों में छिपी है खुशी की तलाश
हैपीनेस इंडेक्स के सर्वे में ये सवाल शामिल किए जाने थे। परिवार की आमदनी और कामकाज का नेचर (Nature) यानी स्वरूप क्या है। तन और मन का स्वास्थ्य कैसा है। समय का ऑडिट (Audit) यानी किस काम में ज्यादा खुशी मिलती है। सुबह की सैर और व्यायाम को कितना महत्व दिया जाता है।
इसके अलावा जीवन स्तर, आत्मिक संतुष्टि, समाज और परिवार के बीच संबंध, बच्चे और बुजुर्गों के बीच बॉन्डिंग (Bonding), रोटी, कपड़ा और मकान के अलावा अन्य बेसिक जरूरतें, सहयोग का भाव और परंपराओं की अहमियत जैसे विषय भी सर्वे का हिस्सा थे।
अब जल्द होगा फैसला
आनंद संस्थान के निदेशक सत्य प्रकाश आर्य के मुताबिक हैपीनेस इंडेक्स की रिपोर्ट में विलंब जरूर हुआ है। लेकिन अब इसकी तैयारी जोर-शोर से हो रही है। आईआईटी खड़गपुर के विशेषज्ञ कुछ काम कर चुके हैं। अन्य एजेंसियों के प्रस्ताव की चर्चा भी जारी है।
आर्य ने कहा कि जल्द ही इसका निर्णय हो जाएगा। यानी लंबे इंतजार के बाद मप्र को उसकी खुशहाली का असली पैमाना शायद जल्द मिल जाए।
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मप्र देश में पहला बनना चाहता है
यह प्रोजेक्ट इसलिए भी खास है क्योंकि देश में शासकीय स्तर पर अभी तक ऐसा कोई सर्वे नहीं हुआ है। अगर मप्र यह इंडेक्स बना लेता है तो यह पूरे देश में एक मिसाल बन सकता है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि सरकार अब ठोस कदम उठाए और सिर्फ घोषणाओं तक न रुके।
FAQ
- मध्यप्रदेश का हैपीनेस इंडेक्स क्या है और इसे क्यों बनाया जा रहा है?
मध्यप्रदेश सरकार जीडीपी की तर्ज पर एक ऐसा इंडेक्स बनाना चाहती है जो यह बताए कि राज्य के लोग अपनी जिंदगी से कितने खुश हैं। इसे 'हैपीनेस इंडेक्स' कहा जा रहा है। इसमें आमदनी, स्वास्थ्य, पारिवारिक संबंध, बुनियादी जरूरतें और आत्मिक संतुष्टि जैसे पहलुओं को मापा जाएगा। यह देश में अपनी तरह का पहला शासकीय प्रयास होगा। - हैपीनेस इंडेक्स में कौन-कौन से पैरामीटर शामिल होते हैं?
हैपीनेस इंडेक्स में परिवार की आमदनी, कामकाज का स्वरूप, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, जीवन स्तर, आत्मिक संतुष्टि, पारिवारिक और सामाजिक संबंध, बुजुर्गों और बच्चों के बीच बॉन्डिंग, बुनियादी जरूरतें, परंपराओं की अहमियत और सहयोग का भाव जैसे पहलुओं को शामिल किया जाता है। इसे साइंटिफिक मेथडोलॉजी से तैयार किया जाना है।
हैपीनेस सर्वे एमपी