एमपी में स्वास्थ्य और महिला बाल विकास विभाग के डेटा में गड़बड़ी, कई लाभार्थियों का वेरिफिकेशन फेल
मध्य प्रदेश के सरकारी विभागों में डिजिटल मॉनिटरिंग के दावों की पोल खुल गई है। हाल ही में मुख्य सचिव अनुराग जैन की अध्यक्षता में हुई एक हाई-लेवल मीटिंग हुई थी।
इस मीटिंग में स्वास्थ्य एवं महिला बाल विकास विभाग की जो रिव्यू रिपोर्ट पेश की गई, उसने सबको चौंका दिया। रिपोर्ट से साफ है कि विभाग का डेटा अब भरोसेमंद नहीं रह गया है।
आलम यह है कि खुद विभाग के अधिकारी भी मान रहे हैं कि कागजों और पोर्टलों पर दर्ज जानकारी पर भारी गड़बड़ी का संदेह हैं।
21% लाभार्थियों का ही वेरिफिकेशन
रिपोर्ट के मुताबिक एक हैरान कर देने वाली बात सामने आई है। प्रदेश के 68 लाख 82 हजार लाभार्थियों में से सिर्फ 21% का ही अनमोल 2.0 पोर्टल पर समग्र आईडी से वेरिफिकेशन हो पाया है।
इसका मतलब ये है कि 79% गर्भवती महिलाओं और अन्य लाभार्थियों का रिकॉर्ड बिना पक्के वेरिफिकेशन के है। रिपोर्ट में कुपोषित बच्चों के पंजीकरण और आंगनवाड़ी रिकॉर्ड में भी भारी गड़बड़ियां हैं। कहीं आंकड़ा लक्ष्य से दोगुना है तो कहीं बच्चों की संख्या घट गई है।
अलर्ट सिस्टम लागू करने की तैयारी
अब संदिग्ध डेटा पकड़ने के लिए एआई आधारित अलर्ट सिस्टम लागू करने की तैयारी की जा रही है। इसके लिए एएनएम को अलर्ट भेजे जाएंगे और हर जिले और संभाग में साप्ताहिक नोटिफिकेशन जारी होंगे।
इसके अलावा पोर्टल या संपर्क एप में डेटा दर्ज करने से पहले सुपरवाइजर से वेरिफिकेशन करना अब जरूरी होगा।
डेडलाइन के बाद भी काम अधूरा
डेडलाइन बीत गई और 79% का डेटा अब तक वेरिफाइ नहीं किया गया है। प्रदेश के 68 लाख 82 हजार लाभार्थियों में से सिर्फ 21% का ही समग्र सत्यापन हुआ है। यानी 79% रिकॉर्ड बिना किसी वेरिफिकेशन के हैं।
जबकि इस काम को पूरा करने की आखिरी तारीख 31 मार्च 2026 थी। सत्यापन में सिवनी (53%) और मंडला (52%) सबसे आगे हैं।
कुपोषित बच्चों का पंजीयन 209%
मुख्यमंत्री बाल आरोग्य संवर्धन कार्यक्रम में कुपोषित बच्चे का पंजीयन होना था। सिवनी में ये आंकड़ा 209% और मंडला में 199% दर्ज किया गया है।
इसका मतलब ये है कि या तो बच्चों के नाम बार-बार डाले गए, या पुराने रिकॉर्ड हटाए नहीं गए। या फिर डेटा एंट्री में कोई गड़बड़ी हुई है।
नाम जुड़ने के बजाय कुल संख्या घटी
तीन से छह साल के बच्चों का पंजीयन बढ़ाने के लिए जनवरी और अप्रैल में विशेष अभियान चलाए गए थे। इसके बाद भी झाबुआ में 480 और श्योपुर में 550 बच्चों के नाम रिकॉर्ड से कम हो गए।
इसका मतलब है कि नए नाम जुड़ने के बजाय कुल संख्या घट गई, जो कि डेटा क्लीन-अप या एंट्री में गड़बड़ी का इशारा कर रहा है।
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