HC में मुंशी ने किया आवेदन तामीली में फर्जीवाड़ा, मामला पति-पत्नी के तलाक का
समझें क्या है पूरा मामला...
- MP हाईकोर्ट में एक आवेदन पर फर्जी साइन मिले।
- सिग्नेचर दूसरे पक्ष के वकील के नाम से किए गए थे।
- कोर्ट ने रिकॉर्ड से असली सिग्नेचर का मिलान किया।
- पूछताछ में मुंशी ने अपनी लिखावट स्वीकार कर ली।
- कोर्ट ने भविष्य में ऐसे मामलों पर कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर पीठ में गंभीर मामला सामने आया। सुनवाई के दौरान एक आवेदन पर फर्जी सिग्नेचर मिलने की बात सामने आई। ये सिग्नेचर दूसरे पक्ष के वकील के नाम से किए गए थे। मामला 18 अगस्त 2026 की सुनवाई से जुड़ा है।
सुनवाई जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनिंद्र कुमार सिंह ने की। कोर्ट ने शिकायत मिलने के बाद रिकॉर्ड की जांच शुरू की। वकील ने कहा कि उसे आवेदन की कॉपी नहीं मिली थी। इसके बाद आवेदन के सिग्नेचर की जांच की गई।
वकालतनामे पर मौजूद असली सिग्नेचर से मिलान किया गया। दोनों सिग्नेचर अलग पाए गए। इसके बाद मामले की जांच आगे बढ़ाई गई।
मुंशी से सवाल हुए तो बदल गई पूरी कहानी
मामले में अधिवक्ता आजाद कृष्णा बैस का पक्ष सामने आया। उनके पंजीकृत मुंशी आकाश सिंह ठाकुर को कोर्ट में बुलाया गया। कोर्ट ने उससे आवेदन की तामील के बारे में सवाल किया।
शुरुआत में मुंशी ने इस बारे में जानकारी होने से इनकार किया। उसने कहा कि वकील के साथ तीन क्लर्क काम करते हैं। इसलिए उसे पता नहीं था कि नोटिस किसने दिया। यह तामील 4 जुलाई 2026 को होने की बात थी। इसके बाद कोर्ट ने आवेदन की लिखावट पर ध्यान दिया।
कोर्ट ने मुंशी से बाएं हिस्से की लिखावट देखने को कहा। लिखावट देखते ही मुंशी ने अपनी बात बदल दी। उसने माना कि वह लिखावट उसी की थी। इसके बाद पूरे मामले की तस्वीर साफ हो गई।
कोर्ट ने फर्जी तामील को गंभीर मामला माना
हाईकोर्ट ने मामले को अदालत की प्रक्रिया से जुड़ा गंभीर विषय माना। कोर्ट के अनुसार तामील की गलत रिपोर्ट पेश की गई थी। इसके लिए दूसरे वकील के नाम से सिग्नेचर किए गए थे।
कोर्ट ने इसे सामान्य गलती नहीं माना। बेंच ने इस मामले पर सख्त नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि ऐसी हरकत से न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होती है। इससे अदालत के रिकॉर्ड की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठता है। इसी वजह से कोर्ट ने भविष्य के लिए कड़ी चेतावनी दी। अदालत ने वकीलों और मुंशियों को सावधान रहने को कहा।
कोर्ट मुंशी की उम्र देखकर FIR से मिली राहत
कोर्ट ने मुंशी की कम उम्र को भी ध्यान में रखा। इसी कारण उसके खिलाफ तत्काल FIR दर्ज नहीं कराई गई। हालांकि कोर्ट ने उसे सख्त चेतावनी दी। भविष्य में ऐसी घटना सामने आने पर कार्रवाई कड़ी होगी।
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि ऐसी गलती को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा। अदालत में जमा हर दस्तावेज की जिम्मेदारी तय हो सकती है। गलत जानकारी या गलत तामील पर कानूनी कार्रवाई संभव है। इस मामले में उम्र के कारण मुंशी को राहत मिली। लेकिन कोर्ट ने भविष्य के लिए स्पष्ट संदेश दिया।
बार काउंसिल और बार एसोसिएशन को भेजा आदेश
हाईकोर्ट ने अपने आदेश की प्रति संबंधित संस्थाओं को भेजने को कहा। इसमें मध्य प्रदेश हाईकोर्ट बार एसोसिएशन शामिल है। स्टेट बार काउंसिल को भी आदेश भेजने के निर्देश दिए गए।
कोर्ट ने भविष्य में ऐसे मामलों पर सख्त कदम उठाने को कहा। ऐसे मामलों में मुंशी के साथ वकील की भूमिका भी देखी जाएगी। कोर्ट ने FIR जैसी कार्रवाई की चेतावनी दी है। इससे पंजीकृत मुंशियों की जिम्मेदारी भी साफ हो गई। अदालत में दस्तावेज जमा करना गंभीर जिम्मेदारी है। किसी भी गलत जानकारी का असर पूरे मामले पर पड़ सकता है।
फर्जी सिग्नेचर का मामला किस केस से जुड़ा है
यह मामला First Appeal 1806/2025 से जुड़ा है। अपील हाकम सिंह और श्रीमती चंदा के बीच है। दोनों दमोह जिले के निवासी बताए गए हैं। दोनों की शादी 23 मई 2019 को हुई थी।
शादी हिंदू रीति रिवाज से होने की जानकारी दी गई। शादी के बाद दोनों के बीच विवाद शुरू हुआ। बाद में पति ने तलाक के लिए अदालत का रुख किया। उसने पत्नी पर कई आरोप लगाए। पत्नी ने इन आरोपों का अलग पक्ष रखा। इसी वैवाहिक विवाद से जुड़ी अपील हाईकोर्ट में चल रही है।
पति ने तलाक के लिए क्या आरोप लगाए
पति ने पत्नी पर विवाह के बाद शारीरिक संबंध नहीं बनाने का आरोप लगाया। उसने पत्नी पर धमकी देने का भी आरोप लगाया। पति के अनुसार पत्नी अधिकतर समय मायके में रहती थी। उसने अप्रैल 2023 से पत्नी के मायके में रहने की बात कही।
पति के अनुसार पत्नी इसके बाद वापस नहीं आई। उसने 50 हजार रुपये मांगने का आरोप भी लगाया। मांग पूरी नहीं होने पर विवाद बढ़ने की बात कही गई। इसके बाद पति ने तलाक की याचिका दाखिल की। पति ने दहेज मामले को भी इसी विवाद से जोड़ा। उसने पुलिस शिकायत को बाद में उठाया गया कदम बताया।
दमोह की अदालत ने तलाक की याचिका खारिज की
पति ने दमोह की अदालत में तलाक की याचिका दायर की थी। मामला हिंदू विवाह कानून की धारा 13 से जुड़ा था। पति ने क्रूरता और अलग रहने को आधार बनाया था। 19 सितंबर 2025 को निचली अदालत ने फैसला सुनाया।
अदालत ने पति की तलाक याचिका खारिज कर दी। इसके बाद पति ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की। उसने निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी।
10 अक्टूबर 2025 को हाईकोर्ट में अपील दायर हुई। अपील हिंदू विवाह कानून की धारा 28 से जुड़ी है। इसमें फैमिली कोर्ट कानून की धारा 19 का भी सहारा लिया गया।
हाईकोर्ट में पति ने किन बातों पर जोर दिया
पति ने निचली अदालत के फैसले पर कई सवाल उठाए। उसने गवाहों के बयानों का सही मूल्यांकन नहीं होने की बात कही। उसने पत्नी की गवाही का भी हवाला दिया। पति के अनुसार पत्नी अप्रैल 2023 से मायके में रही। उसने कहा कि पत्नी ने वापसी के लिए नोटिस नहीं भेजा।
पति ने पुलिस शिकायत की टाइमिंग पर भी सवाल उठाया। उसके अनुसार शिकायत तलाक मामले के बाद दर्ज हुई। पति ने इसे बाद में उठाया गया कदम बताया। उसने निचला फैसला रद्द करने की मांग की। उसने अपने पक्ष में तलाक की डिक्री देने की मांग की।
फर्जी सिग्नेचर ने सुनवाई को नया मोड़ दिया
वैवाहिक विवाद की अपील अपनी जगह हाईकोर्ट में चल रही है। लेकिन सुनवाई के दौरान सामने आया फर्जीवाड़ा अलग मुद्दा बन गया। इसमें कोर्ट के रिकॉर्ड और प्रक्रिया पर सवाल उठा। कोर्ट ने इसी वजह से सख्त रुख अपनाया।
मुंशी की लिखावट ने मामले में अहम मोड़ ला दिया। पहले दी गई जानकारी और बाद की बात अलग थी। कोर्ट के सामने सच स्वीकार करने के बाद स्थिति साफ हुई। कम उम्र के कारण मुंशी को तत्काल राहत मिली। फिर भी कोर्ट ने भविष्य के लिए कड़ा संदेश दिया। बार काउंसिल को भी आदेश की प्रति भेजी गई।
हाईकोर्ट ने दी साफ चेतावनी
हाईकोर्ट का यह आदेश कानूनी प्रक्रिया के लिए अहम माना जा रहा है। इससे अदालत में काम करने वालों की जिम्मेदारी सामने आती है। हर आवेदन और तामील में सावधानी जरूरी है।
फर्जी सिग्नेचर से न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इस मामले में कोर्ट ने समय रहते गड़बड़ी पकड़ ली। वैवाहिक अपील का अंतिम फैसला अभी अलग मुद्दा है।
फर्जी सिग्नेचर वाले मामले ने सुनवाई को नया मोड़ दिया। कोर्ट की चेतावनी ने वकीलों और मुंशियों को संदेश दिया। अदालत की प्रक्रिया में किसी भी तरह की गड़बड़ी भारी पड़ सकती है।
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