50 हजार रुपए मानदेय की सीमा बरकरार, नियमितीकरण की मांग खारिज, पास के कॉलेज में देना होगा मौका
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अतिथि विद्वानों के 50 हजार रुपए मासिक मानदेय की सीमा को सही माना है। कोर्ट ने नियमितीकरण और नियमित भर्ती रद्द करने की मांग खारिज कर दी। हालांकि, नौकरी से बाहर होने पर उनके विषय में रिक्ति वाले नजदीकी कॉलेज में मौका देने का आदेश दिया है।
तीन याचिकाओं पर हाई कोर्ट का फैसला
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट (Madhya Pradesh High Court) के चीफ जस्टिस अलपेश वाई. कोगजे और जस्टिस विवेक जैन की डिवीजन बेंच ने शासकीय कॉलेजों में कार्यरत अतिथि विद्वानों से जुड़ी तीन याचिकाओं पर फैसला सुनाया है। यह आदेश 22 सितंबर को सुरक्षित किया गया था, जिसे 6 अक्टूबर को सुनाया गया।
कोर्ट ने अतिथि विद्वानों को नियमित करने की मांग खारिज कर दी है। हालांकि, नौकरी से बाहर होने वाले अतिथि विद्वानों के लिए कोर्ट ने राज्य सरकार को अहम निर्देश दिए हैं। अब ऐसे अतिथि विद्वानों को उनके विषय में रिक्ति होने पर नजदीकी कॉलेज में काम का प्रस्ताव देना होगा।
क्या था पूरा विवाद?
मामला डॉ. आभा अग्रवाल एवं अन्य की WP 16358/2024, डॉ. उषा तिवारी एवं अन्य की WP 24961/2023 और डॉ. सरस्वती दुबे एवं अन्य की WP 24402/2024 से जुड़ा है। याचिकाकर्ता अलग-अलग शासकीय डिग्री और पीजी कॉलेजों में अतिथि विद्वान के रूप में काम कर रहे हैं। उन्होंने मानदेय, सेवा जारी रखने और नियमितीकरण समेत कई राहतें मांगी थीं।
50 हजार रुपए की सीमा को दी गई थी चुनौती
याचिकाकर्ताओं ने 5 अक्टूबर 2023 के सरकारी आदेश की कंडिका 6.1 को चुनौती दी थी। इसमें अतिथि विद्वानों का मानदेय 1500 रुपए प्रतिदिन से बढ़ाकर 2000 रुपए प्रतिदिन किया गया था। साथ ही अधिकतम 50 हजार रुपए प्रतिमाह की सीमा तय की गई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि UGC नियमों के तहत संविदा शिक्षकों को नियमित सहायक प्राध्यापक के न्यूनतम सकल वेतन से कम भुगतान नहीं किया जा सकता।
UGC नियमों का हवाला देकर मांगा था नियमित वेतन
याचिकाकर्ताओं ने UGC विनियम 2018 की कंडिका 13.0 का हवाला दिया। उनका कहना था कि संविदा आधार पर नियुक्त शिक्षकों को नियमित सहायक प्राध्यापक के मासिक सकल वेतन से कम भुगतान नहीं किया जा सकता।
इसी आधार पर उन्होंने 50 हजार रुपए की सीमा को UGC नियमों के खिलाफ बताया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के गंभीरदान के. गढ़वी और शाह समीर भरतभाई मामलों का भी हवाला दिया।
हाई कोर्ट ने कहा- अतिथि विद्वान और संविदा शिक्षक अलग
हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं का यह तर्क स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि UGC विनियम 2018 की कंडिका 13.0 संविदा शिक्षकों पर लागू होती है। अतिथि विद्वानों के लिए UGC ने 28 जनवरी 2019 को अलग व्यवस्था जारी की थी। इसमें 1500 रुपए प्रति व्याख्यान और अधिकतम 50 हजार रुपए प्रतिमाह मानदेय का प्रावधान था।
नियुक्ति प्रक्रिया में अंतर सबसे अहम
कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति नियमित सहायक प्राध्यापकों की तरह MPPSC की प्रतियोगी चयन प्रक्रिया से नहीं हुई थी। अतिथि विद्वानों की नियुक्ति राज्य की तय स्थानीय मेरिट प्रक्रिया के आधार पर हुई थी। इसलिए उन्हें UGC विनियम 2018 की कंडिका 13.0 के तहत नियमित सहायक प्राध्यापक के वेतन का दावा करने का अधिकार नहीं है।
शाह समीर भरतभाई केस भी नहीं आया काम
याचिकाकर्ताओं ने शाह समीर भरतभाई मामले का हवाला देकर न्यूनतम वेतनमान की मांग की थी। हाई कोर्ट ने कहा कि उस मामले में संविदा शिक्षकों और नियमित सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति प्रक्रिया समान थी। मौजूदा मामले में अतिथि विद्वानों की नियुक्ति प्रक्रिया अलग है। इसलिए उस फैसले का लाभ यहां नहीं दिया जा सकता।
नियमितीकरण की मांग पर भी बड़ा झटका
अतिथि विद्वानों ने लंबे समय से काम करने और वर्ष 2017 की MPPSC परीक्षा में शामिल होने के आधार पर नियमित करने की मांग की थी। उनका कहना था कि कुछ अंकों से चयन से चूकने के कारण उन्हें बार-बार परीक्षा में शामिल होने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। हाई कोर्ट ने यह मांग भी खारिज कर दी।
कोर्ट ने कहा- नियमित भर्ती का रास्ता खुला है
कोर्ट ने कहा कि अतिथि विद्वानों को नियमित होने का कोई तय अधिकार नहीं है। राज्य सरकार समय-समय पर MPPSC के माध्यम से सहायक प्राध्यापकों की नियमित भर्ती कर रही है। अतिथि विद्वानों को भी इन भर्तियों में शामिल होने का अवसर दिया गया है। इसलिए यह ऐसा मामला नहीं है, जिसमें उन्हें नियमित भर्ती से पूरी तरह बाहर रखा गया हो।
नियमित शिक्षक आने पर अतिथि विद्वान हटेंगे
कोर्ट ने साफ किया कि जब किसी पद पर नियमित सहायक प्राध्यापक कार्यभार संभाल लेता है, तो उस पद पर अतिथि विद्वान की जरूरत खत्म हो जाती है। ऐसे में अतिथि विद्वान को उसी पद पर बनाए रखना संभव नहीं है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के मनीष गुप्ता मामले का भी हवाला दिया, जिसमें नियमित चयनित उम्मीदवार के आने तक अतिथि विद्वान को जारी रखने की बात कही गई थी।
लेकिन बाहर होने वालों के लिए कोर्ट ने दी राहत
मामले का सबसे अहम हिस्सा उन अतिथि विद्वानों से जुड़ा है, जो नियमित शिक्षक के आने के बाद अपने पद से बाहर हो जाते हैं। याचिकाकर्ताओं ने शिकायत की थी कि उन्हें कई बार बहुत दूर के कॉलेजों में काम का प्रस्ताव दिया जाता है। कम मानदेय और घर से ज्यादा दूरी के कारण उनके लिए वहां जाना मुश्किल होता है।
अब नजदीकी कॉलेज में देना होगा प्रस्ताव
हाई कोर्ट ने इस शिकायत को कुछ हद तक सही माना है। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि अतिथि विद्वान के बाहर होने पर उसके विषय में रिक्ति उपलब्ध होने की स्थिति में उसे सबसे नजदीकी कॉलेज में काम का प्रस्ताव दिया जाए।कोर्ट ने माना कि इससे अतिथि विद्वानों की परेशानी कम होगी और वैकल्पिक कॉलेज में नियुक्ति को लेकर भेदभाव की शिकायत भी घटेगी।
25 प्रतिशत आरक्षण और आयु छूट पहले से लागू
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि राज्य सरकार अतिथि विद्वानों के लिए पहले ही कई राहतें दे चुकी है। नियमित भर्ती में सभी लंबवत श्रेणियों में 25 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण, अनुभव के आधार पर लाभ और आयु में छूट का प्रावधान किया गया है।
नियम 11(8) में संशोधन के बाद प्रत्येक शैक्षणिक सत्र के लिए एक वर्ष की आयु छूट दी गई है, जिसकी अधिकतम सीमा 10 वर्ष है। यह लाभ अगली तीन भर्ती प्रक्रियाओं के लिए लागू है।
कोर्ट ने नीति में दखल की सीमा भी बताई
हाई कोर्ट ने कहा कि सरकार की नीतियों में अदालत तभी हस्तक्षेप कर सकती है, जब नीति मनमानी हो या संविधान, कानून अथवा वैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करती हो।
अदालत सरकार की नीति सही है या उससे बेहतर विकल्प क्या हो सकता है, यह तय करने के लिए अपील की अदालत की तरह काम नहीं कर सकती। इसी आधार पर 5 अक्टूबर 2023 के आदेश को चुनौती देने वाली मुख्य मांगें खारिज कर दी गईं।
तीनों याचिकाएं सीमित राहत के साथ खत्म
हाई कोर्ट ने अतिथि विद्वानों को नियमित करने, 50 हजार रुपए की मानदेय सीमा खत्म करने और नियमित सहायक प्राध्यापकों की भर्ती का विज्ञापन रद्द करने की मांग स्वीकार नहीं की।
हालांकि, नौकरी से बाहर होने वाले अतिथि विद्वानों को नजदीकी कॉलेज में उनके विषय की रिक्ति होने पर मौका देने का निर्देश दिया गया है। इसी सीमित राहत के साथ तीनों याचिकाओं का निस्तारण कर दिया गया।