एमपी हाई कोर्ट में 7 जजों की सिफारिश पर उठे सवाल, SC-ST-OBC प्रतिनिधित्व को लेकर जनहित याचिका दायर

Neel Tiwari | Oct 30, 2026, 12:37 IST
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में 7 नए जजों की सिफारिश पर विवाद, सभी वर्गों को उचित हिस्सेदारी देने की मांग को लेकर जबलपुर में याचिका दायर।
PIL filed in Jabalpur challenging MP High Court collegium recommendations seeking fair social representation in judicial appointments
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में सात नए जजों की नियुक्ति को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। OBC एडवोकेट्स वेलफेयर एसोसिएशन ने जबलपुर हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की है। इसमें 26 अक्टूबर 2026 को कॉलेजियम की ओर से की गई सिफारिशों को चुनौती दी गई है। याचिका में दावा किया गया है कि सात नामों में से छह सामान्य वर्ग के हैं।

वहीं, SC-ST वर्ग से एक भी नाम शामिल नहीं है। संगठन ने इन सिफारिशों पर दोबारा विचार करने की मांग की है। हालांकि अदालत ने अभी इस मामले में कोई फैसला नहीं सुनाया है।



सात नामों में छह सामान्य वर्ग से, SC-ST से कोई नहीं

बता दें कि एसोसिएशन के सचिव रामभजन सिंह लोधी की ओर से यह जनहित याचिका दायर की गई है। यह याचिका जबलपुर हाई कोर्ट की मुख्य पीठ में दर्ज है। याचिका के दावे के अनुसार कॉलेजियम ने 26 अक्टूबर 2026 को सात अधिवक्ताओं के नामों की सिफारिश की थी। इनमें छह नाम सामान्य वर्ग से हैं और एक उम्मीदवार OBC वर्ग से है। SC और ST वर्ग से किसी भी उम्मीदवार का नाम अनुशंसित नहीं किया गया है।



ये आंकड़े याचिका में किए गए दावे हैं। नियुक्तियों की संवैधानिक वैधता पर अदालत का कोई निष्कर्ष अभी सामने नहीं आया है। याचिकाकर्ता इसे न्यायपालिका में सामाजिक प्रतिनिधित्व के असंतुलन का उदाहरण बताते हैं।



मौजूदा जजों में SC-ST-OBC की भागीदारी पर सवाल

याचिका में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के मौजूदा जजों की सामाजिक पृष्ठभूमि के आंकड़े भी रखे गए हैं। इसके मुताबिक वर्तमान 38 जजों में से 36 सामान्य या उच्च जाति वर्ग से हैं। SC और OBC वर्ग से एक-एक जज होने का दावा किया गया है। ST वर्ग से कोई जज नहीं है।



याचिकाकर्ताओं का कहना है कि प्रदेश की आबादी में SC, ST और OBC की संयुक्त हिस्सेदारी लगभग 88 से 90 प्रतिशत है। इसके बावजूद न्यायपालिका में इन वर्गों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा है।



ज्ञापन और राष्ट्रपति सचिवालय के पत्रों का जिक्र

एसोसिएशन के अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर के मुताबिक संगठन वर्ष 2020 से लगातार ज्ञापन दे रहा है। एसोसिएशन ने 15 मई 2026 और 4 सितंबर 2026 को राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री कार्यालय और सुप्रीम कोर्ट को अभ्यावेदन दिए थे।



राष्ट्रपति सचिवालय की भूमिका

याचिका के मुताबिक राष्ट्रपति सचिवालय ने इन ज्ञापनों को उचित कार्रवाई के लिए संबंधित संस्थानों और मध्य प्रदेश शासन के विधि विभाग को भेजा था। आरोप है कि इसके बावजूद कॉलेजियम ने इन पर विचार किए बिना सिफारिशें अंतिम कर दीं।



आरक्षण वाले पदों और न्यायपालिका का अंतर

रामेश्वर सिंह ठाकुर का कहना है कि जिन क्षेत्रों में आरक्षण लागू है, वहां SC, ST, OBC और महिलाओं की कुछ भागीदारी दिखती है। लेकिन न्यायपालिका और संवैधानिक पदों पर इन वर्गों का प्रतिनिधित्व बेहद कम है



एसोसिएशन का आरोप है कि कुछ जातियों और परिवारों का उच्च पदों पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रभाव बना हुआ है। संगठन ने नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और सामाजिक विविधता सुनिश्चित करने की मांग की है।



याचिका में क्या मांगा गया है

जनहित याचिका में हाई कोर्ट से 26 अक्टूबर 2026 की कॉलेजियम सिफारिशों को पुनर्विचार के लिए वापस मंगाने की मांग की गई है। याचिका के अंतिम निराकरण तक नई नियुक्तियों के वारंट जारी करने पर अंतरिम रोक की भी अपील है।



पारदर्शी दिशा-निर्देश की मांग

याचिकाकर्ताओं ने SC, ST और OBC वर्गों को आबादी के अनुपात में उचित प्रतिनिधित्व देने के लिए पारदर्शी और समावेशी दिशा-निर्देश बनाने की मांग भी की है।



राज्य विधि अधिकारी नियुक्ति पर भी मांग

एसोसिएशन ने केवल हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति नहीं, बल्कि राज्य विधि अधिकारी नियुक्ति में भी सामाजिक प्रतिनिधित्व की मांग उठाई है। याचिका में अतिरिक्त महाधिवक्ता, उप महाधिवक्ता और शासकीय अधिवक्ता जैसे पदों का जिक्र है।



AAG, DAG और GA पदों पर सवाल

इन पदों पर SC, ST और OBC वर्गों की उचित भागीदारी के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाने की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं की ओर से नौ अधिवक्ता पैरवी कर रहे हैं। इनमें विनायक प्रसाद शाह, परमानंद साहू, उदय कुमार, तीरथ प्रसाद जायसवाल, पुष्पेंद्र कुमार, अखिलेश कुमार प्रजापति, रमेश कुमार प्रजापति, त्रिलोकी नाथ सोनकर और काजल विश्वकर्मा शामिल हैं।

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