हाई कोर्ट में जज बनाम जज! जस्टिस आरसीएस बिसेन के आदेशों पर उठे सवाल, चीफ जस्टिस तय करेंगे आगे की सुनवाई

Neel Tiwari | Nov 07, 2026, 09:24 IST
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में जस्टिस विवेक अग्रवाल ने दूसरी बेंच के आदेशों और पीड़िता की निजता पर सवाल उठाते हुए फैसला चीफ जस्टिस के पास भेजा।
MP High Court Single Bench Questions Previous Orders Over Process And Victim Privacy Refers Matter To Chief Justice
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में जस्टिस विवेक अग्रवाल ने एक ही स्तर की दूसरी पीठ के दो आदेशों पर सवाल उठाए हैं। ये आदेश जस्टिस आरसीएस बिसेन ने दिए थे। जस्टिस अग्रवाल ने आदेशों की कानूनी प्रक्रिया और पीड़िता की निजता को लेकर सवाल खड़े किए हैं। अब चीफ जस्टिस तय करेंगे कि इस मामले की सुनवाई कौन सी बेंच करेगी।

जस्टिस आरसीएस बिसेन के दो आदेशों पर सवाल

5 नवंबर 2026 को हुई सुनवाई में जस्टिस विवेक अग्रवाल (Justice Vivek Aggarwal) ने पहले के आदेशों को देखा। रिकॉर्ड के मुताबिक, 17 सितंबर 2026 को जस्टिस आरसीएस बिसेन की एकलपीठ ने जांच अधिकारी को एक वीडियो की जांच करने का निर्देश दिया था। इसके बाद 22 अक्टूबर 2026 को पीड़िता की ओर से दी गई पेन ड्राइव स्वीकार की गई। राज्य सरकार को उसमें मौजूद सामग्री की जांच कर अगली सुनवाई में रिपोर्ट देने को कहा गया था।



जस्टिस अग्रवाल ने पहली नजर में इस पूरी प्रक्रिया को CrPC और BNSS में तय कानूनी नियमों के विपरीत माना।



निपुण सक्सेना फैसले का भी किया उल्लेख

जस्टिस अग्रवाल ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के चर्चित फैसले निपुण सक्सेना एवं अन्य विरुद्ध भारत संघ एवं अन्य (2019) का भी जिक्र किया। उनके मुताबिक, दूसरी पीठ ने जिस तरीके से कार्रवाई की, वह पहली नजर में सुप्रीम कोर्ट के तय कानूनी नियमों के खिलाफ लगती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस बात की जांच जरूरी है कि पहले दिए गए आदेशों से कहीं पीड़िता की निजता का उल्लंघन तो नहीं हुआ।



पीड़िता ने कोर्ट में खुद रखी अपनी बात

सुनवाई के दौरान पीड़िता खुद कोर्ट में मौजूद रही। उसकी गोपनीयता बनाए रखने के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और लाइव टेलीकास्ट बंद कर दिया गया था। पीड़िता ने आरोप लगाया कि 22 अक्टूबर को जस्टिस आरसीएस बिसेन की पीठ के आग्रह पर पेन ड्राइव पेश करने के बाद उसका वकील उससे नाराज हो गया। वकील ने उसे अपना केस खुद लड़ने के लिए कह दिया। उसने यह भी बताया कि पहले के वकील को सामग्री देने के बावजूद उसे कोर्ट में पेश नहीं किया गया था।



दूसरे लोगों से संबंध बनाने के दबाव का आरोप

सुनवाई के दौरान पीड़िता ने अपने पति कौस्तुभ पटेल पर गंभीर आरोप लगाए। उसने कहा कि आवेदक उसे गुरुग्राम लेकर गया था, जहां उस पर दूसरे लोगों के साथ शारीरिक संबंध बनाने का दबाव बनाया जा रहा था। दूसरी ओर, आवेदक की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता मनीष दत्त ने सुझाव दिया कि दोनों पति-पत्नी हैं, इसलिए मामले को सुलह के लिए भेजना बेहतर होगा।



इस पर पीड़िता ने कहा कि उचित भरण-पोषण और देखभाल का आश्वासन मिलने पर वह सुलह के लिए तैयार हो सकती है। कोर्ट ने इन आरोपों के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की।



चीफ जस्टिस तय करेंगे आगे किस बेंच में होगी सुनवाई

जस्टिस विवेक अग्रवाल ने स्पष्ट किया कि मामले के गुण-दोष पर टिप्पणी किए बिना इसे चीफ जस्टिस के सामने रखना जरूरी है। चीफ जस्टिस को तय करना होगा कि 17 सितंबर और 22 अक्टूबर को जस्टिस आरसीएस बिसेन की ओर से पारित आदेश उचित थे या नहीं। साथ ही यह भी देखना होगा कि क्या उन आदेशों से पीड़िता की निजता प्रभावित हुई और क्या वे सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुरूप थे।



कोर्ट नंबर 21 और रोस्टर का भी किया उल्लेख

जस्टिस अग्रवाल ने अपने आदेश में 19 सितंबर 2026 के रोस्टर का भी जिक्र किया। इसके मुताबिक, कोर्ट नंबर 21 में जस्टिस आरसीएस बिसेन को सभी M.Cr.C. जमानत मामलों की सुनवाई की जिम्मेदारी दी गई है। वहीं, विशेष रोस्टर के तहत जमानत याचिकाओं की सुनवाई का जिम्मा जस्टिस अग्रवाल को भी सौंपा गया है।



ऐसे में अब यह तय करना जरूरी है कि कौस्तुभ पटेल की जमानत याचिका पर आगे सुनवाई जस्टिस आरसीएस बिसेन की पीठ करेगी या किसी दूसरी पीठ को यह जिम्मेदारी दी जाएगी।



फाइल चीफ जस्टिस के सामने रखने के निर्देश

जस्टिस विवेक अग्रवाल ने निर्देश दिया कि फाइल उसी दिन चीफ जस्टिस के समक्ष प्रस्तुत की जाए। इसके बाद चीफ जस्टिस के आदेश के अनुसार मामले को सूचीबद्ध किया जाएगा। इस मामले में आवेदक कौस्तुभ पटेल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनीष दत्त ने अधिवक्ता रोहन अवस्थी के साथ पैरवी की। राज्य सरकार की ओर से लोक अभियोजक मानस मणि वर्मा उपस्थित हुए।



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