पुलिस विभाग का 100 करोड़ का टेंडर रद्द, हाई कोर्ट ने सरकार का फैसला पलटा, लगाया जुर्माना
समझें क्या है पूरा मामला
- मामला मध्य प्रदेश पुलिस के 26 जिलों में डिजिटल वायरलेस सिस्टम लगाने की बड़ी परियोजना से जुड़ा है।
- इसी काम के लिए एमपी सरकार ने कुछ महीनों में लगातार छह बार टेंडर जारी किए।
- पांचवें टेंडर में मोबाइल कम्युनिकेशन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड सबसे कम यानी एल-1 बोलीदाता बनी।
- इसके बाद सरकार ने पांचवां टेंडर रद्द कर उसी दिन नया टेंडर जारी कर दिया।
- हाईकोर्ट ने इसे नियमों के खिलाफ मानते हुए छठी निविदा रद्द कर दी और पांचवीं प्रक्रिया पूरी करने के आदेश दिए।
सबसे कम बोली फाइनल होने के बाद विभाग ने बदला खेल
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पुलिस के डिजिटल वायरलेस सिस्टम की करोड़ों रुपए के टेंडर में बड़ा फैसला सुनाया है। एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया (Justice Vivek Rusia) और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने सरकार की छठी ई-निविदा को रद्द कर दिया।
कोर्ट ने साफ कहा कि जब वित्तीय बोली खुल चुकी थी और सबसे कम बोलीदाता तय हो चुका था, तब पूरी प्रक्रिया रद्द कर नई निविदा निकालना उचित नहीं था। कोर्ट ने सरकार को पांचवीं निविदा से आगे की प्रक्रिया पूरी करने और याचिकाकर्ता कंपनी को 50 हजार रुपए लागत देने के निर्देश दिए हैं।
पुलिस संचार व्यवस्था के लिए था यह बड़ा टेंडर
यह परियोजना मध्य प्रदेश पुलिस (MP Police) के 26 जिलों में डिजिटल वीएचएफ वायरलेस सिस्टम लगाने से जुड़ी थी। इसमें आधुनिक वायरलेस उपकरणों की सप्लाई, इंस्टॉलेशन और पूरी संचार व्यवस्था तैयार करनी थी। मोबाइल कम्युनिकेशन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने दावा किया कि उसने हर चरण में सभी तकनीकी शर्तें पूरी कीं और हर बार टेंडर प्रक्रिया में हिस्सा लिया।
पांचवीं निविदा में सबसे कम बोली लगी
27 दिसंबर 2025 को वित्तीय बोली खोली गई। इसमें याचिकाकर्ता कंपनी करीब 100.17 करोड़ रुपए की बोली के साथ एल-1 रही। दूसरी कंपनी एल-2 बनी। रिकॉर्ड के अनुसार, कुछ दिन बाद एल-2 कंपनी ने अपनी कीमत घटाकर नया प्रस्ताव भेजा। इसके बाद टेंडर मूल्यांकन समिति ने नए टेंडर की प्रक्रिया शुरू करने का फैसला लिया और 21 जनवरी 2026 को पांचवीं निविदा रद्द कर छठी निविदा जारी कर दी।
कोर्ट ने कहा, बोली खुलने के बाद मौका नहीं दिया जा सकता
हाई कोर्ट (जज विवेक रूसिया) ने इस पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि एक बार वित्तीय बोली खुल जाए तो सभी कंपनियों की कीमत सार्वजनिक हो जाती है। इसके बाद किसी कंपनी को अपनी कीमत घटाने या बढ़ाने का मौका देना पूरी निविदा प्रक्रिया की निष्पक्षता खत्म कर देता है। अदालत ने माना कि एल-2 कंपनी के संशोधित प्रस्ताव पर विचार करना ही नियमों के खिलाफ था।
L1 और L2 का मतलब क्या होता है
सरकारी टेंडर में पहले कंपनियों की तकनीकी पात्रता जांची जाती है। जो कंपनियां सभी तकनीकी और जरूरी शर्तें पूरी करती हैं, उनकी वित्तीय बोली खोली जाती है। इसके बाद सबसे कम कीमत देने वाली कंपनी को L1 (Lowest-1) कहा जाता है। यानी वही कंपनी काम पाने की पहली दावेदार होती है। इसके बाद दूसरी सबसे कम कीमत देने वाली कंपनी L2 (Lowest-2) कहलाती है।
छठे टेंडर में बदली गईं कई अहम शर्तें
सुनवाई के दौरान कंपनी ने बताया कि छठे टेंडर में कई जरूरी शर्तें बदल दी गईं। अनुभव की सीमा कम कर दी गई। कुछ जरूरी लाइसेंस बाद में देने की छूट दी गई। कई तकनीकी प्रमाणपत्र हटा दिए गए। सुरक्षा से जुड़े कुछ प्रावधान भी बदल दिए गए। कंपनी का आरोप था कि इन बदलावों से एक खास कंपनी को फायदा पहुंचाने की कोशिश हुई।
1999 पन्नों का रिकॉर्ड देखने के बाद कोर्ट ने बनाई राय
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने सभी छह टेंडरों का मूल रिकॉर्ड मंगवाया। यह रिकॉर्ड करीब 1999 पन्नों का था। रिकॉर्ड देखने के बाद कोर्ट ने माना कि पांचवें टेंडर के बाद पूरी प्रक्रिया बदल दी गई। अदालत ने यह भी नोट किया कि छठी निविदा में केवल एक कंपनी ने हिस्सा लिया और उसी को सफल घोषित कर दिया गया।
कोर्ट ने कहा, सस्ती बोली से बड़ा है पारदर्शी सिस्टम
सरकार ने दलील दी कि छठे टेंडर में करीब 84.25 करोड़ रुपए की बोली मिली, जिससे सरकारी धन की बचत हुई। लेकिन Jabalpur High Courtने कहा कि केवल कम कीमत किसी निविदा को सही नहीं बना सकती। यदि तकनीकी गुणवत्ता, जरूरी लाइसेंस, सुरक्षा मानक और कानूनी शर्तों से समझौता किया जाए तो ऐसी बचत स्वीकार नहीं की जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देकर सुनाया फैसला
MP High Court ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई अहम निर्णयों का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि सरकारी टेंडर पूरी पारदर्शिता और समान अवसर के सिद्धांत पर होने चाहिए। किसी एक कंपनी को फायदा देने के लिए शर्तें बदलना या वित्तीय बोली खुलने के बाद नई प्रक्रिया शुरू करना कानून के खिलाफ है।
सरकार को क्या करना होगा
एमपी हाई कोर्ट ने 21 जनवरी 2026 को जारी छठी ई-निविदा और उससे जुड़ी पूरी प्रक्रिया रद्द कर दी। साथ ही सरकार को पांचवीं निविदा की प्रक्रिया वहीं से आगे बढ़ाकर पूरी करने का आदेश दिया। याचिकाकर्ता कंपनी के पक्ष में 50 हजार रुपए कॉस्ट भी मंजूर की गई।
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