मध्यप्रदेश हाई कोर्ट में बढ़ा विवाद, उप महाधिवक्ता बोले- मेरे साइन वाले जवाब में छेड़छाड़
समझें क्या है पूरा मामला...
- मामला मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में राज्य सरकार की ओर से दाखिल किए गए जवाब से जुड़ा है।
- उप महाधिवक्ता का दावा है कि उनके हस्ताक्षर वाले ड्राफ्ट को बदल दिया गया।
- आरोप है कि अदालत में अलग पैराग्राफ वाला जवाब दाखिल किया गया।
- शिकायत में बिना जानकारी और मंजूरी के किए गए बदलाव की जांच की मांग की गई है।
- जांच पूरी होने के बाद ही सच्चाई सामने आएगी।
हाईकोर्ट में दाखिल जवाब को लेकर उठा बड़ा विवाद
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में दाखिल एक न्यायालीन जवाब को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। राज्य सरकार की ओर से अदालत में पेश किए गए जवाब पर सवाल उठाए गए हैं।
उप महाधिवक्ता सुदीप भार्गव ने लिखित शिकायत देकर दावा किया है कि जिस जवाब पर उन्होंने हस्ताक्षर किए थे, अदालत में वही जवाब दाखिल नहीं हुआ।
सुदीप भार्गव का आरोप है कि मूल ड्राफ्ट में बिना उनकी जानकारी के बदलाव किया गया। उन्होंने इस पूरे मामले को बेहद गंभीर बताते हुए महाधिवक्ता प्रशांत सिंह से उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।
किस मामले से जुड़ा है पूरा विवाद
बता दें कि यह पूरा विवाद आपराधिक अपील क्रमांक 5209/2024 से जुड़ा हुआ है। इस मामले में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 389(1) के तहत आवेदन पर सुनवाई हो रही थी।
नियम के अनुसार राज्य सरकार की ओर से अदालत में लिखित जवाब पेश किया जाना था। उप महाधिवक्ता सुदीप भार्गव ने वह जवाब तैयार किया।
शिकायत के अनुसार उन्होंने ड्राफ्ट के पहले और आखिरी पन्ने पर अपने हस्ताक्षर भी किए थे। इसके बाद जवाब अदालत में दाखिल करने के लिए भेजा गया।
सुनवाई के दौरान सामने आया पूरा मामला
शिकायत में कहा गया है कि सुनवाई शुरू होने पर उन्हें अदालत के रिकॉर्ड में मौजूद जवाब देखने का अवसर मिला। रिकॉर्ड देखने के बाद उन्हें बड़ा अंतर दिखाई दिया।
महाधिवक्ता के अनुसार अदालत में मौजूद जवाब का चौथा पैराग्राफ उनके तैयार किए गए ड्राफ्ट से अलग था। उन्होंने कहा कि यह बदलाव उन्होंने नहीं किया।
साथ ही महाधिवक्ता सुदीप भार्गव ने इस बदले हुए पैराग्राफ को कभी मंजूरी भी नहीं दी। इसी वजह से उन्होंने तुरंत पूरे मामले की शिकायत दर्ज कराई।
मूल ड्राफ्ट में क्या लिखा था
उप महाधिवक्ता ने अपनी शिकायत में मूल पैराग्राफ का भी उल्लेख किया है। उनके अनुसार मूल जवाब में ट्रायल कोर्ट के फैसले का समर्थन किया गया था। उसमें कहा गया था कि ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध सबूतों का सही मूल्यांकन किया है।
साथ ही जवाब में यह भी लिखा गया था कि केवल कुछ गवाहों के मुकर जाने से पीड़िता की विश्वसनीय गवाही कमजोर नहीं होती। मेडिकल साक्ष्यों का भी उल्लेख किया गया था। कुल मिलाकर मूल ड्राफ्ट में आरोपी की दोषसिद्धि को सही ठहराने का पक्ष रखा गया था।
बदले हुए जवाब पर क्या है आरोप
शिकायत के अनुसार अदालत में दाखिल जवाब का चौथा पैराग्राफ अलग था। आरोप है कि बदले गए हिस्से में ट्रायल कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाए गए।
शिकायत में कहा गया है कि इससे ऐसा संदेश गया, जैसे राज्य सरकार खुद अपने ही मुकदमे के खिलाफ खड़ी हो। उप महाधिवक्ता का कहना है कि यह उनके तैयार किए गए जवाब का हिस्सा नहीं था। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने ऐसे किसी बदलाव की न तो अनुमति दी और न ही उसकी पुष्टि की।
क्यों माना जा रहा है गंभीर मामला
अदालत में दाखिल हर दस्तावेज कानूनी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। सरकारी जवाब के आधार पर अदालत कई बार आगे की सुनवाई तय करती है।
ऐसे में यदि किसी हस्ताक्षरित दस्तावेज में बिना जानकारी के बदलाव किया जाए, तो यह पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर सकता है।
यही कारण है कि इस शिकायत को सामान्य प्रशासनिक विवाद नहीं माना जा रहा। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो इसका असर न्यायिक प्रक्रिया पर भी पड़ सकता है।
महाधिवक्ता से क्या मांग की गई
सुदीप भार्गव ने महाधिवक्ता प्रशांत सिंह से पूरे मामले की जांच कराने का अनुरोध किया है। उन्होंने मांग की है कि यह पता लगाया जाए कि हस्ताक्षरित ड्राफ्ट में बदलाव किस स्तर पर हुआ।
साथ ही सुदीप भार्गव ने कहा कि यह भी जांच हो कि बदलाव किसके निर्देश पर किया गया। शिकायत में जिम्मेदार व्यक्ति या अधिकारियों की पहचान कर उचित कार्रवाई करने की मांग की गई है।
भार्गव ने भविष्य के लिए भी ऐसी व्यवस्था बनाने का सुझाव दिया है, जिससे किसी भी हस्ताक्षरित जवाब में बिना अनुमति बदलाव न हो सके।
कई वरिष्ठ अधिकारियों को भेजी गई शिकायत
यह शिकायत केवल महाधिवक्ता तक सीमित नहीं रखी गई है। इसकी प्रतिलिपि राज्य के विधि विभाग के अपर मुख्य सचिव को भी भेजी गई है। इसके अलावा इंदौर में पदस्थ अपर महाधिवक्ता सोनल गुप्ता, राहुल सेठी और आशीष यादव को भी इसकी कॉपी भेजी गई है।
इससे साफ है कि शिकायत को कई वरिष्ठ स्तरों तक पहुंचाया गया है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि आगे क्या कार्रवाई होती है।
जांच के बाद सामने आएगी सच्चाई
फिलहाल इस पूरे मामले में कोई आधिकारिक जांच रिपोर्ट सामने नहीं आई है। महाधिवक्ता कार्यालय की ओर से भी अभी तक कोई सार्वजनिक निष्कर्ष जारी नहीं किया गया है।
इसलिए इस समय शिकायत में लगाए गए आरोपों को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता है। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि दस्तावेज में वास्तव में अनधिकृत बदलाव हुआ था या नहीं। साथ ही यह भी सामने आएगा कि यदि बदलाव हुआ, तो उसके लिए कौन जिम्मेदार था।
अदालत की प्रक्रिया पर भरोसा बनाए रखना जरूरी
यह मामला केवल एक जवाब के बदलाव का नहीं है। यह अदालत में दाखिल होने वाले सरकारी दस्तावेजों की विश्वसनीयता से भी जुड़ा है। न्यायिक प्रक्रिया पूरी तरह रिकॉर्ड और दस्तावेजों पर आधारित होती है।
इसलिए ऐसे किसी भी आरोप की निष्पक्ष जांच जरूरी मानी जाती है। अब इस मामले में आगे होने वाली कार्रवाई पर कानूनी जगत की नजर बनी हुई है। जांच पूरी होने के बाद ही पूरे विवाद की असली तस्वीर सामने आएगी।
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